Hindi Quote in Poem by prachi Gurjar

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"कलकोठरी"

मेरे भीतर एक बच्चा रहता है  
मेरी उम्र से सदियों छोटा  
उसे दुनिया के दस्तूर नहीं आते  
उसे बस उड़ना आता है ।

वो हर बार कहता है ….."मुझे खुला आसमान दो"  
और मैं हर बार कहती हूँ ….."यहाँ आसमान नीलाम हो चुके हैं"

वो रूठ जाता है  
मैं उसे गोद में उठा लेती हूँ  
माथा चूमती हूँ  
और झूठी लोरी सुनाकर सुला देती हूँ

एक रात मैंने उसे कहानी सुनाई  
त्याग की, समझदारी की, "बड़े होने" की  
वो कहानी सुनते-सुनते सो गया  
सुबह उठा तो पहले से ज़्यादा जिद्दी था

बोला…. "तुमने मुझे डरना सिखा दिया  
पर जीना नहीं सिखाया"

उस दिन मैं थक गई  
अपनी उम्र का बोझ,  
लोगों की बातों का बोझ,  
"क्या कहेंगे" का बोझ  
सब उठाकर उसके नन्हे कंधों पर रख दिया

फिर अपने ही हाथों से  
उसे उठाकर अपने भीतर की कलकोठरी में बंद कर दिया

अब रोज़ रात को आवाज़ आती है  
दीवारों से टकराती हुई  
सिसकियों की, सवालों की

"मुझे बाहर निकालो...  
मेरी साँस घुट रही है"

और मैं ……मैं ,
दरवाज़े पर पहरा देती  हूँ  
बड़ी बनकर….
समझदार बनकर….
मजबूत बनकर….

लोग तारीफ करते हैं 
"कितनी सुलझी हुई हो तुम"

उन्हें क्या पता
इस सुलझाव के पीछे  
एक बच्चा रोज़ मेरे भीतर मरता है…..
प्राची गुर्जर …..

Hindi Poem by prachi Gurjar : 112029780
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