"श्री हनुमंत प्रकाश" से -
वंदउँ बारम्बार, गुरु पद पारस मनहिं मन ।
करहिं जगत उजियार, हे सत साधक सहज बढ़ि ।।
वंदउँ बारम्बार, श्री गणेश विघ्नेश अब ।
करहिं नमन् स्वीकार, आदि पूज्य प्रथमेश पुनि ।।
वंदउँ बारम्बार, विमला विद्या महाश्रया ।
विपुल ज्ञान भण्डार, जिन कर पावहिं मूढ़मति ।।
वंदउँ बारम्बार, गौरी शंकर सरस मुख ।
आदि शक्ति ओंकार, सकल सृष्टि आधार जेहि ।।
वंदउँ बारम्बार, अतुल युगल छवि धारि हिय ।
सत्य धर्म अवतार, सियाराम सुख धाम जेहि ।।
बंदउ बारंबार अब, चतुर सुवीर सुजान ।
पवन पुत्र अंजनी सुत, रामदूत हनुमान ।। (01)
हे हनुमंत बीर बलवंता ।
दानव दलन संत रिपुहंता ।।
मंगल मूर्ति महा बलवाना ।
संकट मोचन कृपानिधाना ।।
अंजनि पुत्र केसरी लाला ।
शंकर सुअन शुभंकर बाला ।।
महावीर बजरंगी वीरा ।
वायुपुत्र कपि शैल शरीरा ।।
हे रुद्रांश लोक हितकारी ।
राम सहाय धर्म ध्वज धारी ।।
रामदूत सियसुत कपिनायक ।
धर्म धुरंधर धर्म सहायक ।।
हे दुखभंजन हे जगबंदन ।
हे कपिचंदन मारुतिनंदन ।।
हे रणबीरा हे मतिधीरा ।
हरहुँ नाथ जन जन की पीरा ।।
करहुँ निवेदन नाथ पुनि, चंदन चरण पखारि ।
धरहिं विराजहिं पवन सुत, पुनः धर्म ध्वज धारि ।। (02)
स्वरचित
@ सर्वाधिकार सुरक्षित – डाॅ.विजय प्रताप शाही