वो ज़रा मौजुआ जमाना था,
चार आना बड़ा खजाना था ।।
टाॅफियाँ सिर्फ पाँच पैसे में,
बीस पैसे में चाट खाना था ।।
खेलना खूब मस्तियाँ करना,
घूमना और दिन बिताना था ।।
काम कुछ और कहाँ था केवल,
एक गइया जिसे चराना था ।।
और ले कर 'विजय' भरा बस्ता,
पाठशाला सहर्ष जाना था ।।
@सर्वाधिकार सुरक्षित-डाॅ.विजय प्रताप शाही