मैं और मेरे अह्सास
ख्वाहिशें
ख्वाहिशों से बाहिर निकलना चाहता हूँ l
खुली हवा में साँस लेने निकलना चाहता हूँ ll
क्या रखा है बड़ी ख्वाहिशों में इस लिए l
मुकम्मल खुद को ही बदलना चाहता हूँ ll
कल को अफसोस न रहे जाए टूटने का l
मोमबत्ती की तरह पिघलना चाहता हूँ ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह