असुरविद्या

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मुंबई की उस रात में उमस नहीं, एक दम घोटने वाली खामोशी थी. उपनगर की एक तंग गली के आखिरी छोर पर स्थित उस जर्जर इमारत का कमरा नंबर सत्रह, किसी जिंदा कब्र जैसा लग रहा था. घडी की सुइयां नौ: तिरेपन पर रेंग रही थीं, मानो विहान के दर्द को और लंबा खींचना चाहती हों. विहान फर्श पर पडा था. उसका बायां पैर एक अजीब कोण पर मुडा हुआ था, जो दो महीने पहले लगी चोटों की गवाही दे रहा था. वह आज भी लंगडा कर चलता था. उसकी पसलियों का दर्द हर सांस के साथ उसे याद दिलाता था कि वह' गोल्ड मेडलिस्ट विहान' से' मुजरिम विहान' कैसे बना.

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असुरविद्या - 1

अध्याय एक: अपराधीमुंबई की उस रात में उमस नहीं, एक दम घोटने वाली खामोशी थी. उपनगर की एक तंग के आखिरी छोर पर स्थित उस जर्जर इमारत का कमरा नंबर सत्रह, किसी जिंदा कब्र जैसा लग रहा था. घडी की सुइयां नौ: तिरेपन पर रेंग रही थीं, मानो विहान के दर्द को और लंबा खींचना चाहती हों.विहान फर्श पर पडा था. उसका बायां पैर एक अजीब कोण पर मुडा हुआ था, जो दो महीने पहले लगी चोटों की गवाही दे रहा था. वह आज भी लंगडा कर चलता था. उसकी पसलियों का दर्द हर सांस के साथ उसे याद ...Read More

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असुरविद्या - 2

अध्याय 2 - यक्षिणी चित्राक्षण भर के लिए सब कुछ ठहर गया. जैसे ही खून कागज के रेशों में कमरे की हवा ठंडी होकर जमने लगी. किताब के भीतर से एक ऐसी फुसफुसाहट उभरी, मानो हजारों आत्माएं पाताल की गहराइयों से एक साथ विलाप कर रही हों. विहान झटके से पीछे हटा, किताब फर्श पर गिरी, पर बंद नहीं हुई. वह धडकने लगी— धक. धक. धक. जैसे उसके भीतर कोई प्राचीन हृदय फिर से धडक उठा हो.पन्नों से एक अलौकिक नीली रोशनी फूटी, जो धीरे- धीरे धुएँ की तरह काली पडने लगी. कमरे का इकलौता बल्ब एक तीखी आवाज ...Read More

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असुरविद्या - 3

अध्याय - 3 पारस पत्थरविहान के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान उभरी जिसने यक्षिणी को भी पल भर के खामोश कर दिया. वह मुस्कान किसी मासूम इंसान की नहीं थी, बल्कि उस' विलेन' की थी जो अब अपनी नियति को खुद लिखने के लिए तैयार था.विहान धीरे- धीरे हँसने लगा—एक कडवी, खतरनाक और रहस्यमयी हंसी.खून? विहान ने अपनी खोखली आँखों से यक्षिणी को देखा. तुमने अभी मेरा शरीर देखा है? दो महीने अस्पताल में सडकर लौटा हूँ. मेरी रगों में तो इतना खून भी नहीं बचा कि यह पत्थर अपनी प्यास बुझा सके. अगर मैंने अपना खून दिया, तो ...Read More