AsurVidya - 2 in Hindi Adventure Stories by OLD KING books and stories PDF | असुरविद्या - 2

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असुरविद्या - 2

अध्याय 2 - यक्षिणी चित्रा 


क्षण भर के लिए सब कुछ ठहर गया. जैसे ही खून कागज के रेशों में समाया, कमरे की हवा ठंडी होकर जमने लगी. किताब के भीतर से एक ऐसी फुसफुसाहट उभरी, मानो हजारों आत्माएं पाताल की गहराइयों से एक साथ विलाप कर रही हों. विहान झटके से पीछे हटा, किताब फर्श पर गिरी, पर बंद नहीं हुई. वह धडकने लगी— धक. धक. धक. जैसे उसके भीतर कोई प्राचीन हृदय फिर से धडक उठा हो.

पन्नों से एक अलौकिक नीली रोशनी फूटी, जो धीरे- धीरे धुएँ की तरह काली पडने लगी. कमरे का इकलौता बल्ब एक तीखी आवाज के साथ चटख कर टूट गया. घोर अंधकार छा गया, लेकिन उस अंधेरे में भी विहान को कुछ दिखाई दे रहा था—कमरे के बीचों- बीच धुएँ का एक विशाल बवंडर उठ रहा था.
उस धुएँ के केंद्र से एक ऐसी आकृति उभरी, जिसे देखकर विहान की चीख उसके गले में ही घुट गई.
यक्षिणी का आगमन
वह कोई प्रेत नहीं थी, वह साक्षात एक साम्राज्ञी थी. धुएँ के छंटते ही विहान की फटी आँखों के सामने एक स्त्री खडी थी, जिसका सौंदर्य और वैभव किसी भी नश्वर की कल्पना से परे था. वह फर्श से कुछ इंच ऊपर हवा में तैर रही थी. उसकी त्वचा संगमरमर की तरह सफेद और शीतल थी, जिस पर कमरे की हल्की लाल रोशनी किसी कीमती रत्न की तरह चमक रही थी.
उसके वस्त्र प्राचीन भारतीय राजसी ठाठ के थे—बारीक रेशम और सोने के तारों से बुनी गई एक ऐसी पोशाक जो हवा न होने पर भी लहरों की तरह लहरा रही थी. उसके गले में नौलखा हार, बाहों में जडाऊ बाजूबंद और माथे पर एक चमकता हुआ स्वर्ण- टीका था. उसके बाल घुटनों तक लंबे और काले नागों की तरह जीवंत लग रहे थे, जो हवा में अपने आप तैर रहे थे. लेकिन सबसे खौफनाक और सम्मोहक थीं उसकी आँखें—वे पिघलते हुए शुद्ध सोने की तरह धधक रही थीं, जिनमें हजारों सालों का एकांत और शक्ति छिपी थी.
विहान थर- थर कांपते हुए घुटनों के बल गिर पडा. नहीं. यह सच नहीं है. मैं मर चुका हूँ. यह यमदूत है. उसने अपना चेहरा हाथों से ढंक लिया.
यक्षिणी ने पहले अपने कोमल, अलौकिक हाथों को देखा. उसने गहरी सांस ली, मानो सदियों बाद इस दुनिया की हवा को महसूस कर रही हो. फिर उसकी सुनहरी आँखें विहान पर टिकीं.
एक नश्वर? उसकी आवाज विहान के कानों में नहीं, सीधे उसके मस्तिष्क की शिराओं में गूँजी. वह आवाज शहद की तरह मीठी थी, पर उसमें लोहे जैसी कठोरता भी थी.
वह धीरे से नीचे उतरी, उसके पैर फर्श को नहीं छू रहे थे. वह विहान के इतने करीब आई कि उसकी बर्फीली ठंडक विहान के रोम- रोम को चुभने लगी. विहान ने अपनी उंगलियों के बीच से उसे देखा. वह सुन्न था. तुम. तुम क्या हो? कोई चुडैल?
यक्षिणी के चेहरे पर एक तिरस्कारपूर्ण मुस्कान आई. मैं वह हूँ जिसे पुकारने का साहस सदियों से किसी ने नहीं किया. मैं इस ग्रंथ की रक्षक एक यक्षिण चित्रा हूँ और तू? उसने अपनी गर्दन टेढी की और विहान का विश्लेषण करने लगी.
उम्र बाईस वर्ष. हड्डियाँ टूटी हुई, शरीर जर्जर, और आत्मा? आत्मा तो अपमान और क्रोध की आग में झुलसकर राख हो चुकी है. उसने विहान की आँखों में झांका. तुझमें वह काले बादल दिख रहे हैं जिन्हें दुनिया' प्रतिशोध' कहती है. तू तो महज एक हारा हुआ मांस का लोथडा है, नश्वर. तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरा रक्त- बंधन खोलने की?
उसने अपना हाथ हवा में लहराया. विहान को लगा जैसे किसी अदृश्य फंदे ने उसका गला दबोच लिया हो. वह हवा में चार फीट ऊपर उठ गया. उसका दम घुटने लगा, फेफडे हवा के लिए तडपने लगे. मौत को इतना करीब देखकर विहान के अंदर डर की जगह एक उन्मादी गुस्सा भडक उठा.
मार. मार डाल मुझे! विहान ने अपनी पूरी ताकत लगाकर गला फाड कर कहा. वैसे भी. अपनों ने, इस समाज ने, उस मंत्री के बेटे ने. सब ने मुझे मार ही दिया है. तू भी खेल खत्म कर दे!
यक्षिणी रुकी. उसकी आँखों की सुनहरी चमक थोडी गहरी हुई. उसने विहान की आँखों में उस दहकती आग को देखा जो मौत से नहीं डरती थी. उसने धीरे से अपना हाथ नीचे किया और विहान फर्श पर गिरकर खाँसने लगा.
तूने मुझे क्यों छोडा? विहान ने हाँफते हुए पूछा.
यक्षिणी ने उसे गौर से देखा. क्योंकि तूने जीवन की भीख नहीं मांगी, बल्कि मौत को ललकारा है. और जो मरने से नहीं डरता, वही इस' असुरविद्या' के अंधेरे मार्ग पर मेरा स्वामी बनने योग्य है.
उसने झुककर विहान के चेहरे को अपनी रेशमी उंगलियों से छुआ. जहाँ उसका स्पर्श हुआ, उसका चेहरा वहाँ के सारे घाव और चोट के निशान पल भर में ऐसे गायब हो गया जैसे कभी था ही नहीं. विहान हक्का- बक्का रह गया.
यह सिर्फ एक झाँकी है, स्वामी, उसने' स्वामी' शब्द को एक कटाक्ष के साथ कहा. तूने अनजाने में मेरा बंधन तोडा है. अब मेरी शक्तियाँ तेरे रक्त से जुड चुकी हैं. तू जो चाहेगा, वह होगा. लेकिन याद रखना.
कमरे की दीवारें अचानक कांपने लगीं, जैसे कोई छोटा भूकंप आया हो. यक्षिणी की आवाज भारी और गंभीर हो गई. ब्रह्मांड का नियम है—बिना कुछ खोए, तू कुछ पा नहीं सकेगा. हर वरदान के बदले तुझे' बलिदान' देना होगा.
कैसा बलिदान? विहान ने पत्थर की तरह सख्त आवाज में पूछा.
यक्षिणी की आँखों में एक डरावनी चमक आई. कभी किसी मासूम की हंसी. कभी तेरी कोई प्यारी याद. या कभी तेरी आत्मा का एक हिस्सा. जैसी तेरी इच्छा, वैसा बलिदान.
उसने हवा में हाथ लहराया. विहान के सामने हवा में सुनहरे अक्षर तैरने लगे. बोल नश्वर! क्या चाहिए तुझे? अपार धन? दुनिया पर राज? या फिर मुझसे वह काली शक्तियाँ सीखना चाहता है जिनसे तू अपने दुश्मनों को राख कर सके?
विहान ने उन विकल्पों को देखा, फिर अपने टूटे हुए शरीर और उस अपमान को याद किया जो उसे हर रात सोने नहीं देता था. वह सब बाद में. पहले मुझे स्वस्थ करो.
यक्षिणी ने उसके सिर्फ चेहरे के ही घाव को ठीक किया था उसके शहरी के बाकी के घाव अभी भी बचे हुए थे.
मेरी ये टूटी हड्डियाँ, यह जानलेवा बुखार. मुझे पहले जैसा कर दो.
यक्षिणी मुस्कुराई. मंजूर है. पर मेरा तरीका थोडा. अलग है.
इससे पहले कि विहान कुछ समझ पाता, यक्षिणी बिजली की गति से उसके पास आई और उसके चेहरे को अपने ठंडे हाथों में जकड लिया. विहान ने विरोध करना चाहा, पर उसकी आँखों की सम्मोहक लाली ने उसे स्थिर कर दिया. अगले ही पल, यक्षिणी ने अपने ठंडे होंठ विहान के जख्मी होंठों पर रख दिए.
यह कोई मानवीय चुंबन नहीं था. विहान को लगा जैसे हजारों वोल्ट का करंट उसके शरीर के हर कोष में दौड गया हो. एक बर्फीली लहर उसके गले से होती हुई फेफडों और हड्डियों तक पहुँची. उसे अपनी हड्डियों के जुडने की' चटक- चटक' आवाज साफ सुनाई दी. पल भर में उसका बुखार उड गया, और शरीर में ऐसी ऊर्जा भर गई जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी.

जब यक्षिणी के होंठ विहान के होंठों से अलग हुए, तो कमरे का तापमान सामान्य होने लगा, लेकिन विहान के भीतर एक ज्वालामुखी फूट पडा था. विहान ने एक लंबी, गहरी सांस ली—ऐसी सांस जिसमें दर्द की कोई जगह नहीं थी.
उसने धीरे से अपनी मुट्ठी खोली, फिर बंद की. उसकी उंगलियों में अब वह कंपन नहीं था. वह झटके से खडा हुआ. उसका बायां पैर, जो अब तक बेजान लकडी की तरह घिसटता था, अब लोहे के खंभे की तरह मजबूत महसूस हो रहा था.
यह. यह सच है? विहान की आवाज में एक अजीब सी खुशी और हैरानी थी. उसने कमरे के बीचों- बीच एक ऊँची छलांग लगाई और फर्श पर इतनी मजबूती से उतरा कि पुरानी इमारत की जमीन थरथरा गई. उसने अपनी पसलियों को छुआ, अपनी सूजी हुई आँख को सहलाया—सब कुछ सामान्य था. वह पागलपन की हद तक खुश होकर कमरे में दौडने लगा, मानो एक पिंजरे से छूटा हुआ पंछी हो.
मैं ठीक हूँ! मैं पूरी तरह ठीक हूँ! वह चिल्लाया, उसके चेहरे पर एक उन्मादी मुस्कान थी.
तभी यक्षिणी की खिलखिलाहट गूँजी. वह अब भी हवा में तैर रही थी, उसकी सुनहरी आँखें विहान की हर हरकत का आनंद ले रही थीं. शांत हो जाओ, नश्वर. यह तो बस शुरुआत है.
उसने अपनी नाजुक हथेली खोली. उसके बीचों- बीच एक काला, पारभासी पत्थर उभरा, जिसके भीतर से एक धीमी रक्त- रंग की रोशनी फूट रही थी.
यह पारस है, उसने पत्थर विहान की ओर बढाया. लेकिन यह आम कहानियों वाला पत्थर नहीं जो लोहे को सोना बना दे. यह' असुर- पारस' है.
विहान ने कांपते हाथों से उस पत्थर को लिया. वह पत्थर बर्फीला ठंडा था, पर उसे छूते ही विहान के दिमाग में हजारों छवियों का सैलाब आ गया.
इसका इस्तेमाल कैसे करना है? विहान ने जिज्ञासा से पूछा.
यक्षिणी उसके और करीब आई, उसकी खुशबू किसी पुराने गुलाब और गंधक के मिश्रण जैसी थी. इसे जिस भी धातु या वस्तु से स्पर्श कराओगे, वह तुम्हारी प्रबल इच्छा के अनुसार अपना रूप बदल लेगी. अगर तू इसे लोहे के टुकडे से छुएगा और मन में धन की तीव्र इच्छा करेगा, तो वह शुद्ध स्वर्ण में बदल जाएगा. लेकिन याद रख स्वामी.
इसे जिस भी निर्जीव वस्तु से स्पर्श कराओगे, वह तुम्हारी प्रबल इच्छा के अनुसार अपना रूप बदल लेगी, यक्षिणी ने फुसफुसाते हुए कहा. उसकी आवाज में एक अजीब सी चेतावनी छिपी थी.
विहान ने उत्साहित होकर मेज पर पडे एक लोहे के पुराने तले को देखा. तो क्या मैं इसे अभी सोना बना सकता हूँ?
यक्षिणी के होंठों पर एक क्रूर मुस्कान आई. उसने अपना हाथ विहान के हाथ पर रखा. बना सकते हो स्वामी. लेकिन एक समस्या है. यह साधारण पारस नहीं, असुर- पारस' है. और असुरों की दुनिया में' सृजन' (Creation) बिना' बलिदान' के संभव नहीं है.
विहान की भौहें तन गईं. कैसा बलिदान?
यक्षिणी ने उस काले पत्थर की ओर इशारा किया, जो अब और भी गहरा लाल चमकने लगा था. यह पत्थर मृत है. इसे जगाने के लिए ईंधन चाहिए. और इसका ईंधन है— रक्त. तुम इस पत्थर से जितनी बडी वस्तु का रूप बदलोगे, इसे उतना ही अधिक मानव- रक्त चाहिए होगा.
विहान का जोश अचानक ठण्डा पड गया. उसने पत्थर को गौर से देखा. मतलब. अगर मुझे सोना चाहिए, तो मुझे अपना खून देना होगा?
सिर्फ तुम्हारा ही नहीं, किसी का भी, यक्षिणी ने अपनी सुनहरी आँखों को सिकोडते हुए कहा. जितना शुद्ध रक्त, उतनी प्रबल शक्ति. बिना खून के यह महज एक काला पत्थर है. अब बोलो स्वामी. क्या अभी भी तुम अपनी गरीबी को सोने में बदलना चाहते हो? याद रहे, तुम जितना सोना बनाओगे, तुम्हारा शरीर उतना ही कमजोर होता जाएगा, जब तक कि तुम किसी और के रक्त का प्रबंध न कर लो.