पैहरगढ़ में कई दिनों बाद फिर से रौनक लौट आई थी। मंदिर की घंटियाँ, घरों में दीपक, और हर चेहरे पर सुकून था। अदिति छत पर खड़ी चाँद को देख रही थी। हवा में अजीब-सी हलचल थी… जैसे कुछ अनकहा पुकार रहा हो। तभी विवेक पीछे से आता है। “क्या सोच रही हो?” अदिति हल्की मुस्कान के साथ कहती है— “पता नहीं क्यों… सब ठीक होने के बाद भी मन शांत नहीं है।”
मेरी हो तुम - 1
पैहरगढ़ में कई दिनों बाद फिर से रौनक लौट आई थी।मंदिर की घंटियाँ, घरों में दीपक, और हर चेहरे सुकून था।अदिति छत पर खड़ी चाँद को देख रही थी।हवा में अजीब-सी हलचल थी… जैसे कुछ अनकहा पुकार रहा हो।तभी विवेक पीछे से आता है।“क्या सोच रही हो?”अदिति हल्की मुस्कान के साथ कहती है—“पता नहीं क्यों… सब ठीक होने के बाद भी मन शांत नहीं है।”उसी पल दूर जंगलों की ओर से काली ऊर्जा की एक लहर उठती है।पेड़ झुक जाते हैं… पक्षी उड़ जाते हैं।वहीं दूसरी ओर—अंधकार में डूबा एक विशाल कक्ष।आग जैसी आँखों वाला वह रहस्यमयी साया ज़मीन ...Read More
मेरी हो तुम - 2
आदित्य – चेताक्क्षी | सोलफुल रिश्तामंदिर में धूप और अगरबत्ती की खुशबू फैली थी।चेताक्क्षी दीपक जला रही थी।आदित्य उसे से देख रहा था—शांत, मजबूत, और बेहद सुकून देने वाली।“तुम्हें डर नहीं लगा?”आदित्य ने पूछा।चेताक्क्षी मुस्कुराई।“डर था… लेकिन विश्वास ज़्यादा था।”“किस पर?”“तुम पर… और किस्मत पर।”आदित्य कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—“मेरी ज़िंदगी में बहुत फैसले दूसरों ने लिए…पहली बार है जब कोई फैसला सही लग रहा है।”चेताक्क्षी ने उसकी तरफ देखा—“तो फिर साथ निभाओगे?”आदित्य ने बिना देर किए कहा—“जब तक साँस है।”दोनों की नज़रें मंदिर की घंटी के साथ एक हो गईं।उसी रात…चारों पैहरगढ़ से दूर, पहाड़ों के पीछे—काली ...Read More
मेरी हो तुम - 3
विवेक – अदिति | गहरा रिश्तारात का सन्नाटा चारों ओर फैला था।घर सो चुका था… लेकिन अदिति की आँखों नींद नहीं थी।छत पर बैठी वो आसमान देख रही थी।तारों के बीच कहीं उसे अपना डर भी दिख रहा था।तभी पीछे से परिचित-सी आवाज़ आई—“अब से छत पर अकेले नहीं बैठा करो।”अदिति ने बिना पलटे कहा—“जानती थी… तुम आओगे।”विवेक पास आकर बैठ गया।दोनों के बीच बस एक हाथ का फासला था।“तुम्हें पता है,”विवेक ने धीरे से कहा,“जब तुम्हें उस दिन बेहोश देखा था…मुझे लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया रुक गई हो।”अदिति ने पहली बार अपनी कमजोरी जाहिर की—“और मुझे ...Read More