Nehru Files - 100-101 in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-100-101

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नेहरू फाइल्स - भूल-100-101

भूल-100 
प्रधानमंत्री के कार्यकाल को सीमित न करना 

अगर नेहरू वास्तव में एक सच्‍चेलोकतंत्रवादी थे तो उन्हें अमेरिकी संविधान से भी प्रेरणा लेनी चाहिए थी। वे प्रधानमंत्री के कार्यकाल को सिर्फ दो कार्यकालों के लिए सीमित कर सकते थे, बिल्कुल अमेरिका के राष्ट्रपति की तरह। सिर्फ इतना ही नहीं, दो कार्यकाल पूरे कर लेने के बाद अपने परिजनों को सौंप देने पर भी पाबंदी लगाई जानी चाहिए थी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राजवंश राजनीति पर हावी न हो पाएँ। राजवंशों का जारी रहना देश की कीमत पर निहित स्वार्थ है। इसके अलावा, राजवंश द्वारा किए हुए सभी गलत कामों पर परदा डालने में भी उनकी रुचि निहित होती है। 

आपको नेहरू के पदचिह्न‍ों पर चलनेवाले लोगों का एक अजीब ही दृश्य-विधान दिखाई देता है (चाहे वे युवा हों या बुजुर्ग और चाहे वे किसी राजनीतिक पद पर हों या नौकरशाही की स्थिति में अथवा किसी खेल संघ में)—कभी न छोड़ने को तैयार। जहाँ पर विस्तार की संभावना न हो, नौकरशाह सेवानिवृत्ति के बाद के लिए इधर-उधर कोई पद तलाशते हैं। 

अब उपर्युक्त की तुलना अमेरिका के सह-संस्थापक जॉर्ज वाशिंगटन के साथ करें। उन्हें ‘देश का पिता’ घोषित किया गया था और सन् 1789 में अमेरिका का पहला राष्ट्रपति चुना गया था, वह भी बिना किसी विपक्ष के। वाशिंगटन सन् 1797 में सेवानिवृत्त हुए, वह भी आठ साल (दो कार्यकाल) से अधिक तक सेवारत रहने से दृढ़ता से मना करते हुए, पद पर बने रहने के अनुरोधों के बावजूद। अमेरिका का निर्माण करने और स्थापित करने के बावजूद उन्होंने अपरिहार्यता की स्व-सेवा धारणाओं का दोहन या प्रचार नहीं किया। राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो कार्यकाल निर्धारित करनेवाला अमेरिकी संविधान का 22वाँ संशोधन सन् 1947 में ही आया था। इससे पूर्व तक इसे एक शताब्दी से भी अधिक समय तक एक अच्छी प्रथा माना गया। 

थॉमस जेफरसन, अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति और देश के संस्थापक सदस्यों में से एक, अपनी कई उपलब्धियों के लिए और मूल रूप से सन् 1776 की अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा का मसौदा तैयार करने के लिए प्रसिद्ध, से भी सन् 1808 में दो कार्यकाल पूरे होने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए राष्ट्रपति पद पर बने रहने के लिए दबाव डाला गया, प्रार्थना की गई। हालाँकि डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन आदर्शों का हवाला देते हुए जेफरसन से ऐसा करने से इनकार कर दिया; हालाँकि, ऐसा करने पर कोई कानूनी रोक नहीं थी और जनता को भी उनका जारी रखना पसंद आता। 

अगर उपर्युक्त ‘अधिकतम 8 साल’ वाला नियम भारत में भी लागू किया गया होता तो नेहरू राज सन् 1955 में ही खत्म हो गया होता। अगर ऐसा हुआ होता तो भारत नेहरू के गरीबी को बढ़ानेवाले समाजवाद, भारत-चीन युद्ध की पराजय, कमजोर होते नेहरू के राजवंश के शासन और इस पुस्‍तक में दी गई गलतियों की बहुतायत से बच गया होता। 
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भूल-101 
उत्तराधिकारी घोषित न करना, जानते-बूझते

 पेरी एंडरसन ने लिखा—“शेष संघ के लिए नेहरू के शासन का स्थायी प्रभाव उनके द्वारा छोड़ी गई वंशवादी परंपरा है। उन्होंने किसी भी वंशवादी सिद्धांत को खारिज करने का दावा किया, लेकिन उनकी स्वयं को धोखा देने की क्षमता शायद इतनी अधिक थी कि उन्हें यह यकीन था कि वे ऐसा ही कर रहे हैं। लेकिन उत्तराधिकारी के रूप में अपने किसी भी सहयोगी को न चुनना और अपनी उस बेटी को कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर आगे बढ़ाने की उनकी मजबूरी (जिसकी इकलौती विशेषता यह थी कि वह इस पद के लिए ही पैदा हुई थीं), जिस पर कभी गांधी ने उन्हें सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए बिठाया था, खुद को साबित करते हैं।” (यू.आर.एल.8) 

नेहरू ने किसी वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री या एक उप-प्रधानमंत्री को उनकी अनुपस्थिति में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया (सरदार पटेल की मतृ्यु के बाद), जब वे विदेश दौरों पर जाते थे। एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री ने ऐसा किया होता तो ‘नेहरू के बाद कौन?’ वाली सभी अटकलों पर विराम लगा दिया होता। वास्तव में, जैसेकि पिछली भूल में जोर दिया गया था—एक जिम्मेदार और देशभक्त राजनेता ने आठ साल (वर्ष 1947-1955) तक पद पर बने रहने के बाद खुद ही प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया होता और पद को किसी दूसरे सक्षम नेता को सौंप दिया होता व वहाँ पर ऐसे कई सक्षम लोग मौजूद थे, जिन्होंने उस पोर्टफोलियो को कहीं अधिक बेहतर तरीके से सँभाला होता। लकिे न नेहरू ने जान-बूझकर ऐसा नहीं किया, क्योंकि एक तो वे दुनिया को दिखाना चाहते थे कि वे कितने अपरिहार्यव स्थिर हैं और दूसरे, अपनी बेटी के लिए रास्ता बनाने हेतु। ऐसा करते हुए नेहरू ने अपने व्यक्तिगत वंशवादी हितों के लिए राष्ट्रीय हितों की बलि दे दी। 

वाल्टर क्रॉकर ने लिखा—“यह बात जरा भी अजीब नहीं है कि नेहरू इतने लंबे समय तक पद से चिपके रहे। अगर उन्होंने पद से हटने का फैसला कर लिया होता तो यह भारतीय संसदीय लोकतंत्र की भावना के पूरी तरह से अनुकूल होता। कमाल अतातुर्क ने भी बिल्कुल यही किया था। एक बात तो तय है कि उनके लंबे शासन ने विपक्ष को खत्म कर दिया; विपक्ष संसदीय लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है।” (क्रॉक/55) 

इतने लंबे समय तक शासन करने के बाद नेहरू ने कभी भी इस बात पर विचार नहीं किया कि अपनी जिम्मेदारी को किसी और को सौंपा जाए, भले ही ऐसा नहीं था कि देश उनके शासनकाल में कोई बहुत अच्छा कर रहा हो और न ही ऐसा था कि उनके न रहने से देश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा होता। इसके विपरीत, हो सकता है कि उनके न रहने पर चीजें सुधर जातीं, बशर्ते उनके बाद जिम्मेदारी उनकी बेटी के हाथों में नहीं सौंपी जाती! 

अब नेहरू की तुलना सरदार पटेल के साथ करें, जिन्होंने अपने बेटे और पोते से यह कहा था, जब वे उनसे मिलने दिल्ली आए थे, जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, “जब तक मैं इस कुरसी पर हूँ, तब तक दिल्ली मत आना; जब तक मैं बहुत अधिक बीमार न हूँ और आप लोगों का मुझसे मिलना जरूरी न हो। सभी प्रकार के लोग आपसे संपर्क साधेंगे। ध्यान रखना।” (आर.जी./473)