Nehru Files - 105 in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-105

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नेहरू फाइल्स - भूल-105

भूल-105 
अक्षम लोगों और चापलूसों को आगे बढ़ाना 

“दासता व्यक्ति को इतना नीचे गिरा देती है कि वह उसे पसंद करने लगता है।” 
—ल्यूक डी. क्लैपियर 

नेहरू को खुद पर इतना घमंड था कि वे सोचते थे कि वे सबसे बुद्धिमान व्यक्ति हैं, जिसे सबसे अधिक ज्ञान है। इसलिए उन्हें ‘हाँ में हाँ मिलानेवालों’ की तलाश रहती थी। वे, जो उनका हुकुम बजाएँ, उनकी आज्ञा का पालन करें, यहाँ तक कि उनकी पसंद व नापसंद का भी अनुमान लगाने में सक्षम हों और उसी हिसाब से काम करें। 

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“कांग्रेस में आपस में मिलने वाले लोगों के दिमाग में सिर्फ यह बात चल रही होती है कि यह पता लगाएँ कि नेहरू के मस्तिष्क में क्या चल रहा है और उसका अंदाजा लगाएँ। असंतोष का एक छोटा सा प्रयास भी काफी नापसंद किया जाता है और उसे सिर उठाते ही कुचल दिया जाता है।” 
—राजाजी (आर.जी.3/373) 
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एम.ओ. मथाई ने लिखा—“अगर कुछ अपवादों को छोड़ दें तो सरदार पटेल की मृत्यु के बाद तो नेहरू के सहयोगी ऐसे लोग नहीं थे, जो उनकी मौजूदगी में खुलकर अपनी बात रख सकें। उनके सामने कइयों की जुबान पर ताला पड़ जाता था। कुछ उन्हें नाराज न करने को लेकर चौकन्ना रहते थे और कुछ तो पहले से ही यह पता लगाने के प्रयास करते थे कि वे किस चीज से प्रसन्न हो सकते हैं। लगभग सभी उनसे खौफ खाते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि उनके सहयोगी कभी अच्छा काम नहीं कर पाए।” (मैक2/एल-5751) 

इसमें कोई शक नहीं कि स्पष्टवादी, निष्कपट और सक्षम लोगों को दरकिनार कर दिया गया था। यह बात नेहरू और कृष्‍णा मेनन द्वारा सेना में अपने पसंदीदा लोगों को भरने, नियुक्ति और पदोन्नति के राजनीतिकरण तथा ऐसे लोगों को शीर्षपदों पर बैठाने, जिन्होंने आखिरकार सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की नाक कटवाई, से और अधिक स्पष्ट हो गई। (कृपया भूल#38 देखें।) 

वर्ष 1952 के पहले आम चुनावों में स्थिति यह थी कि कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़नेवाले लगभग हर प्रत्याशी की जीत तय थी। ऐसा कहा जाता था कि अगर बिजली के खंभे को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में खड़ा कर दिया जाए तो वह भी जीत जाएगा। नेहरू का सपना था कि आजादी के बाद देश की सेवा करने को तत्पर विभिन्न क्षेत्रों के ईमानदार, सक्षम और योग्य व्यक्तियों को कांग्रेस में शामिल किया जाए। वर्ष 1952 ऐसे व्यक्तियों की पहचान करने और उन्हें शामिल करने का एक सुनहरा अवसर था; लेकिन क्या नेहरू ने ऐसा किया? नहीं। उनके पास पूरी आजादी थी। वे जितने अधिक वफादारों और चाटुकारों को इकट्ठा कर सकते थे, उन्होंने किया। 

मौलाना आजाद ने कहा, “हम अभी भी सामंती हैं; उन्होंने लेकिन जो बात मुझे सबसे अधिक चिंता में डालती है, वह यह है कि कई अच्छे व्यक्तियों को भी टिकट से सिर्फ इसलिए वंचित कर दिया गया, क्योंकि विश्वसनीय दरबारियों ने उन्हें नेहरू विरोधी के रूप में पेश किया था।” (आजाद) 

नेहरू ने यह तक तय किया कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर (उन सब में सबसे अधिक विद्वान् और सक्षम) भी हार जाएँ! जैसाकि अपेक्षित था, वर्ष 1952 के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस विधायकों और सांसदों का एक ऐसा बड़ा समूह तैयार कर दिया, जो दरबारी, चाटुकार और पिछलग्गू थे। 

लुइस फिशर ने लिखा—“अगर खुली आलोचना और शक्तिशाली विपक्ष न हो तो लोकतंत्र मर जाता है। राजनीतिक आलोचना और विरोध के बिना एक राष्ट्र की बुद्धि, संस्कृति और सार्वजनिक नैतिकता गतिहीन हो जाती है; बड़े लोगों को निकाल दिया जाता है तथा छोटे लोग और अधिक झुक जाते हैं। नेता लोग खुद को कायरों, चाटुकारों और गिड़गिड़ाते हुए ‘हाँ में हाँ मिलानेवालों’ से घेर लेते हैं, जिनके द्वारा स्वतः दी जानेवाली स्वीकृति को महानता के रूप में मान लिया जाता है।” 

ब्रिटिश प्रधानमंत्री, डेविड लॉयड जॉर्ज ने वर्ष 1916-22 के दौरान विंस्टन चर्चिल को सलाह दी थी, “प्रधानमंत्री के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वे ऐसे लोगों से घिरे हों, जो एक बार नहीं, बल्कि तीन बार ‘नहीं’ कहने में सक्षम हों।” कोई भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि वह नेहरू की घमंडी व तानाशाही मानसिकता, हद से ज्यादा अहंकार या हीनता की भावना थी, जिसके चलते उन्हें पटेल और आंबेडकर जैसे दिग्गजों को छोड़कर चाटुकारों और पिछलग्गुओं को गले लगाना पड़ा। 

जिस किसी ने भी नेहरू का विरोध किया, उसे अपमानित किया गया, उस पर गैर-धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक या अमीर-हितैषी अथवा फासीवादी होने का ठप्पा लगाया गया और निकाल बाहर किया गया। नेहरू के चारों ओर धीरे-धीरे ऐसे दोषपूर्णछद्म धर्मनिरपेक्ष, हिंदू-विरोधी, गरीबी बढ़ानेवाले समाजवादी लोगों का दबदबा कायम हो गया और उन सभी लोगों को किनारे लगा दिया गया, जिन्होंने नेहरू की बात को मानने से इनकार कर दिया। मतभेद रखनेवाले नेता बाहर हो गए और जो नेता बचे, वे वैयक्तिकता और नए विचारों से परे, तोते बन गए। डी.पी. मिश्रा ने कहा, “गांधीजी ने मिट्टी से नेता बना दिए; लेकिन पं. नेहरू के नेतृत्व में उन्हें मुर्दों में बदला जा रहा है।” 

नेहरू के हद से ज्यादा घमंडी चेले 
नेहरू ने किस प्रकार के व्यक्ति चुने, यह उसका एक उदाहरण है। 
कृष्णा मेनन, तत्कालीन रक्षा मंत्री, नेहरू के हद से ज्यादा घमंडी चेले थे। वे भारत के लिए बदनामी लाए और भारतीय सेना का अपमान किया। वे दुर्भाग्यपूर्ण भारत-चीन युद्ध में करोड़ों भारतीयों के अपमान के लिए जिम्मेदार प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। 

आजादी के तुरंत बाद कृष्णा मेनन को ब्रिटेन में उच्‍चायुक्त नियुक्त किया गया था और वे वर्ष 1952 तक उस पद पर बने रहे। वे सन् 1956 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में बिना पोर्टफोलियो वाले मंत्री के रूप में शामिल हुए और 1957 में रक्षा मंत्री बने। 

उन्होंने अपनी तमाम उपलब्धियों को नेहरू और सिर्फ नेहरू के नाम कर रखा था। चाहे कांग्रेस पार्टी हो या विपक्ष, चाहे नौकरशाही हो या सेना, कोई भी उन्हें न तो पसंद करता था और न ही उनकी इज्जत करता था। उनके पूरे कॅरियर में कोई सार्थक उपलब्धि उनके नाम पर नहीं थी, जिस पर वे गर्व कर सकें; लेकिन इसके बावजूद उनका अहंकार (निश्चित ही थोथा) असहनीय था। वे बेहद अभिमानी, अस्वाभाविक रूप से असहिष्णु थे और बेहद कड़वा बोलते थे। वे ऐसे व्यक्ति थे, जैसा किसी ने उनका वर्णन किया था, जो यह मानते थे कि ‘घृणा प्रेम से अधिक मजबूत होती है।’ उन्हें देखकर ही ऐसा लगता था कि वे जो तय कर लेते हैं, उसे पाकर ही रहते हैं और उनकी नाक गिद्ध की चोंच जैसी दिखती थी। 

विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मामलों में भी अपना हाथ आजमाया—नेहरू के समर्थन की बदौलत। विदशी मामलों में उनके अनुग्रह में अमेरिका के खिलाफ बोलना भी शामिल था। कहा जाता है कि नेहरू तो आजादी के बाद ही मेनन को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहते थे, लेकिन गांधी ने इसका कड़ा विरोध किया। इसके बाद उन्हें लंदन में उच्‍चायुक्त नियुक्त किया गया। 

लंदन में भारतीय उच्‍चायोग में मेनन के नेतृत्व में काम करनेवाले खुशवंत सिंह अपनी आत्मकथा ‘ट्रूथ, लव ऐंड ए लिटिल मेलिस’ में उनके बारे में कहते हैं—
 “मैं अपने कॉलेज के दिनों में कृष्णा मेनन से मिला था; लकिे न मुझे उनमें प्रतिभा (जैसाकि कुछ लोगों द्वारा दावा किया जाता है) के कोई लक्षण नहीं दिखाई दिए थे। वे बिना मुकदमोंवाले एक गुस्सैल वकील थे, जिसने अपनी सारी ऊर्जा ‘इंडिया लीग’ को तैयार करने और पं. नेहरू की चापलूसी करने में लगा दी। उच्‍चायुक्त के रूप में उनकी नियुक्ति को भारत और इंग्लैंड में रह रहे भारतीय समुदाय द्वारा पक्षपात के घिनौने उदाहरण के रूप में ली गई थी।” (के.एस./118) 

“ ...उन्होंने अपनी ‘इंडिया लीग’ के कई आनुषंगिक संगठनों को भी खड़ा कर दिया था तथा दान के रूप में अमीर भारतीयों एवं अपने अंग्रेज मित्रों से मोटी धनराशि प्राप्त की थी और बदले में उन्हें भारत में हथियारों की आपूर्ति के अनुबंध प्रदान किए। उन्हें व्यापारिक मामलों में कोई हिचक नहीं थी। वे एक जन्मजात झूठे भी थे और मानते थे कि सच सामान्य लोगों के लिए ही बेहतर है और झूठ बोलना सबसे अच्छी दिमागी कसरत है।” (के.एस./143) 

“ ...पं. नेहरू के चेले के रूप में मेनन ने जो पाया, उसके पीछे का कारण पता नहीं चल सका है और शायद ही कभी पता चले।” (के.एस./152)

 जनरल शिव वर्मा ने उनके बारे में बिल्कुल ठीक कहा था, “मेनन एक कुँआरे हैं, बिल्कुल अपने पिता की तरह।” (के.एस./153) 

एम.ओ. मथाई ने लिखा— 
“संसद् में कृष्णा मेनन की बखिया निरंतर उधेड़ी जा रही थी। इस बीच राजकुमारी अमृत कौर सहित इंग्लैंड से लौटनेवाले लोगों ने खबर दी कि ‘इंडिया हाउस’ में काम बिल्कुल ठप हो गया है।” (मैक/164) 

“मैं सबसे पहले (लंदन में) डॉ. हॉड से मिला, जो कृष्णा मेनन के पुराने दोस्त और समर्थक थे। उन्होंने मुझे बताया कि कृष्णा मेनन बीमार हैं और एक हद तक पागल हो गए हैं। वे मामूली सी बात होने पर ही ल्युमिनोल और दूसरी गोलियाँ लेने लगते हैं। उन्होंने साथियों से भी कहा कि अभी भी प्रधानमंत्री उन्हें उच्‍चायुक्त बनाए हुए हैं, यह बड़े आश्चर्य की बात है।” (मैक/165) 

लंदन में भारतीय उच्‍चायुक्त के पद पर कार्यरत हुए कृष्णा मेनन सरकार के लिए कई संदिग्ध सौदों में शामिल रहे। सन् 1948 का जीप घोटाला उन्हीं घोटालों में से एक था (विस्तृत जानकारी के लिए भूल#73 देखें)। 

लंदन में उच्‍चायुक्त के रूप में तैनाती के दौरान कुछ भी सार्थक योगदान न होने के बावजूद कृष्‍णा मेनन नेहरू की बदौलत भी कैबिनेट मंत्री का पद पाने में सफल रहे। ‘चमचा’ होना एक बेहद उपयोगी गुण है। लोगों को काबिलियत के मुकाबले चमचागीरी ज्यादा पसंद आती है। और अगर आप बिल्कुल समान विचारधारा (वामपंथ, साम्यवाद, अमेरिका-विरोध) रखते हैं तो सोने पर सुहागा! 

इंदर मल्होत्रा ने 6 मार्च, 2007 को ‘‌दि इंडियन एक्सप्रेस’ (आई.एम.3) में ‘लेफ्ट आउट बाय हिस्टरी’ में कृष्णा मेनन के बारे में यह कहा था—“...(अति गोपनीय) फाइल में सिर्फ दो दस्तावेज और उनके जनक थे, एम.आई.5, ब्रिटेन की आंतरिक खुफिया और प्रति गुप्तचर एजेंसी। एक था इंडिया हाउस में पी.आर.ओ., सुधीर घोष और नई दिल्ली में सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच की टेलीफोनिक बातचीत का एक प्रतिलेख। चूँकि घोष के सहायक के रूप में खुशवंत सिंह ने एक से अधिक बार रिकॉर्ड कर लिया था, इसलिए पटेल ने गृह एवं सूचना मंत्री के रूप में घोष को मेनन की ‘जासूसी’ के लिए लंदन में तैनात किया था। दूसरा दस्तावेज एक संक्षिप्त, लेकिन बेहद संवेदनशील संवाद की एक प्रति था, जो मेनन ने सोवियत विदेश मंत्री वी.एम. मोलोतोव को भेजा था। उस संदेश को ‘भयावह’ के रूप में वर्णित करते हुए एम.आई. ने जोड़ा था कि उन्होंने एक अत्यंत गोपनीय कागज हासिल किया है—‘अपने सामान्य तरीके से’। प्रतिष्ठित सरदार पटेल ने मेनन से संबंधित एम.आई.5 के दृष्टिकोण को निश्चित ही साझा किया होगा। अगर उनके हाथ में होता तो वे उच्‍चायुक्त के रूप में मेनन की नियुक्ति होने ही नहीं देते। एक पूर्ण यथार्थवादी होने के चलते वे जानते थे कि नेहरू के साथ मेनन की मित्रता के चलते ऐसा होना संभव नहीं है। इसलिए, उन्होंने दूसरा काम किया और उच्‍चायोग में एक जासूस को नियुक्त कर दिया। 

“ ...नेहरू का निर्णय, इसके तुरंत बाद मेनन को रक्षा मंत्री नियुक्त करना ठीक नहीं था। उनकी तुनकमिजाजी, बदमाशी और षड्‍यंत्रों में लिप्त रहने की आदत परेशानियों की वजह थी। उन्होंने अ‍ॉफिसर कॉर्प्स को राजनीति के भँवर में घसीटा और खुद शीर्ष के राजनीतीकरण में उलझकर रह गए। जनरल के.एस. थिमय्या, शानदार पेशेवर और सैनिकों के बीच बेहद लोकप्रिय, के साथ उनकी क्लासिक झड़प चलती रही। उसके परिणाम बेहद भयावह थे। मेनन ने जब तक चाहा तब तक अपने पद पर बने रहे, क्योंकि उनके पीछे नेहरू का पूरा समर्थन था।” (आई.एम.3) 

सत्य कल्पना से भी अधिक अद्भुत होता है। कृष्णा मेनन ने तथाकथित तौर पर हथियारों का निर्माण करनेवाले कई कारखानों को प्रेशर कुकर, कॉफी बनानेवाली मशीनों एवं हेयर पिन की उत्पादन सुविधाओं में तब्दील कर दिया—और उन्हें इस पर गर्व था! शीर्ष सैन्य अधिकारियों द्वारा बार-बार चेतावनी दिए जाने कि भारतीय सेना चीनी खतरे का सामना करने के लिए जरा भी तैयार नहीं है और धन तथा हथियारों की उनकी निरंतर माँग अनसुनी ही रही। 

कृष्‍णा मेनन ने जनरल थापर के बारे में बेहद अपमानजनक टिप्पणी भी की थी, “वह बिना दाँतों वाली बुढ़िया; उसे यह भी नहीं पता कि युद्ध लड़ा कैसे जाता है।” 

कृष्णा मेनन असल में नेहरू के कृपापात्र से अधिक कुछ नहीं थे। उनकी अपनी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी। वे कांग्रेस पार्टी में कुछ भी नहीं थे। अपने आप में वे देश के लिए किसी भी तरह से मायने नहीं रखते थे। फिर भी अधिकांश लोग पराजय के लिए सिर्फ कृष्णा मेनन को कसूरवार मानते हैं, बिना यह स्वीकार किए कि इस राष्ट्रीय त्रासदी के असल शिल्पकार खुद नेहरू थे। 

दुर्गा दास ने लिखा—“महत्त्वपूर्ण बात यह है कि नेहरू ने इस पूरे मामले में (मेनन के इस्तीफे में) अंतरात्मा की आवाज महसूस की! उन्हें पता था कि इस त्रासदी (भारत-चीन युद्ध) के असली गुनाहगार वे स्वयं अपने वफादार मित्र से कहीं अधिक हैं।” (डी.डी./366)