Nehru Files - 110 in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-110

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नेहरू फाइल्स - भूल-110

भूल-110 
अभिमानी, दंभी और घमंड से भरे हुए 

नेहरू खुद को एक महान् अकादमिक एवं बुद्धिजीवी, एक अत्यधिक जानकार व्यक्ति, एक अंतरराष्ट्रीयवादी एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, ‘वैज्ञानिक’ स्वभाव तथा सोचवाले एक उदारवादी, आधुनिकतावादी, समझदार और ऐसा व्यक्ति, जिसे यह पता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए क्या अच्छा है—निश्चित ही भारतीय राजतंत्र और जनता के लिए भी—मानते थे। इतना ही नहीं, वे इस हद तक अभिमानी थे कि उन्हें अधिकतर लोग अपने आगे बहुत कमतर दिखते थे। वे उन्हें अपमानजनक रूप से देखते थे और उनके कथनों एवं सोच को ‘बचकाने’, ‘किशोर वय’ इत्यादि कहते थे। विडंबना यह है कि अगर कोई विभिन्न क्षेत्रों में नेहरू के कार्यों और उन कार्यों के कुल परिणामों का गहराई से अध्ययन करता है तो पता चलता है कि नेहरू के काम वास्तव में बेहद औसत, माफी माँगने लायक थे; और अभिमानी होने लायक तो बिल्कुल भी नहीं थे; हालाँकि, राज-काज में उनका अनाड़ीपना अद्भुत था—इस पुस्‍तक में दरशाई गई भूलें अपना बखान खुद करती हैं। 
कई लोग ताज्जुब करते हैं कि वह क्या था, जिसने नेहरू को इतना अक्‍खड़ बनाया? निश्चित ही, ऐसा उनकी अकादमिक उपलब्धियों या फिर उनकी पुस्तकों की कमाई के आधार पर नहीं था। अगर वे अच्छी अंग्रेजी जानते थे तो कई और लोग भी जानते थे। अगर वे इंग्लैंड में पढ़े थे तो कई और भी पढ़े थे। अगर वे पश्चिमी थे तो कई और भी थे। अगर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था तो अन्य हजारों ने भी लिया था और वास्तव में उनसे कहीं अधिक बलिदान भी किया था। अगर उन्हें लगता था कि वे असाधारण रूप से बुद्धिमान, ज्ञानी और एक महान् नेता थे तो फिर उन्होंने इतनी बड़ी गलतियाँ कैसे कीं—सभी बेहद गंभीर, देश पर जिनके काफी दीर्घकालिक गंभीर परिणाम हुए। वास्तव में, नेहरू सिर्फ इसलिए हावी होने में कामयाब रहे, क्योंकि जब वे राजनीति में थे, तभी उनके लगभग सभी बराबरीवाले, बेहतर और संभावित प्रतिद्वंद्वी गुजर गए—सुभाषचंद्र बोस, गांधी, पटेल, आंबेडकर। 

उनका अहंकार दूसरों के द्वारा उनके सामने खुलकर अपनी राय रखने में आड़े आया। दूसरे उनके गुस्से से डरते थे। इसके चलते वे दूसरों की समझदारी भरी सलाह और चीजों के गड़बड़ होने पर सुधार के कदम उठाने से दूर रहे। वे एक के बाद एक गलती करते रहे और कोई भी उन्हें सलाह देने की हिमाकत नहीं कर पाया। 

इंग्लैंड में रहते हुए जवाहरलाल नेहरू ने जुलाई 1910 में अपने पिता मोतीलाल को लिखा— 
“मेरी अ‍ॉक्सफोर्ड जाने की इच्छा का सबसे बड़ा कारण यह है कि कैंब्रिज अब भारतीयों से भरता जा रहा है!” एक पुलिसकर्मी, गंगाधर नेहरू, के पोते की ऐसी अकड़! (वोल्प2/23) नेहरू की गोरी त्वचा, ईटन और कैंब्रिज में उनकी शिक्षा, उनकी पश्चिमी परवरिश और अंग्रेजी रीति-रिवाजों के प्रति उनकी पहचान के चलते शायद वे यह सोचने को मजबूर हो गए कि वे भी उनकी तरह अभिमानी हो सकते हैं और स्वदेशी भारतीयों के प्रति वैसे ही तिरस्कारपूर्ण भी।

 सन् 1955 में एशियाई-अफ्रीकी देशों के एक सम्मेलन में श्रीलंका के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर जॉन कोटेलावला ने साम्यवाद और सोवियत उपनिवेशवाद पर कुछ टिप्पणियाँ कीं। बाद में नेहरू ने उन्हें टोका और व्यंग्यात्मक लहजे में उनसे पूछा कि उन्होंने अपना भाषण उन्हें पहले क्यों नहीं दिखाया? जॉन कोटेलावला ने बिना समय गँवाए नेहरू को जवाब दिया, “मैं ऐसा क्यों करूँ? क्या आप बोलने से पहले अपना भाषण मुझे दिखाते हैं?” (सीटी) (मैक/191) 

शंकर घोष अपनी पुस्तक ‘जवाहरलाल नेहरू : ए बायोग्राफी’ में नेहरू की मौत के पाँच महीने बाद, अक्तूबर 1964, का झोऊ एनलाई का एक बयान उद्‍धृत करते हैं—“मैं दुनिया के कई नेताओं से मिला हूँ, ख्रुश्चेव से भी। मैंने चियांग काई से मुलाकात की, मैं अमेरिकी जनरलों से भी मिला, लेकिन मुझे नेहरू जितना घमंडी व्यक्ति नहीं मिला। मुझे यह कहते हुए खेद है, लेकिन यह सच है।” (एस.जी./304) 

मजाक में यह बात भी कही जाती है कि वास्तव में झोऊ एनलाई नेहरू के दूसरों को नीचा दिखानेवाले व्यवहार से इतने खिन्न थे कि उन्होंने उसका बदला लेने के लिए भारत-चीन युद्ध शुरू किया। हेनरी किसिंजर (अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) के साथ अपनी बातचीत के दौरान उन्होंने तथाकथित तौर पर यह कहा था कि नेहरू इतने अधिक अहंकारी हो गए थे कि वे उनके अहंकार को मिट्टी में मिलाना चाहते थे। 

नेहरू सन् 1961 में अमेरिका के दौरे पर गए थे। कुलदीप नैयर ने लिखा—“केनेडी ने नेहरू और अमेरिका के शीर्ष अर्थशास्त्रियों तथा विदेश नीति विशेषज्ञों के बीच नाश्तेपर एक बैठक आयोजित की। नेहरू बैठक में देर से पहुँचे और उनकी प्रतिक्रियाएँ अधिकांश सिर्फ ‘हाँ’ या ‘न’ में ही रहीं। नाश्ता सिर्फ 20 मिनट में ही समाप्त हो गया। उनमें से कुछ ने यह बात केनेडी के संज्ञान में डाली, जिन्होंने अपने सहयोगियों की मौजूदगी में कहा कि ‘नेहरू काफी लंबे समय तक जी चुके हैं’।” (के.एन.) 

दलाई लामा अपनी आत्मकथा ‘फ्रीडम इन एक्साइल’ में लिखते हैं—
 “फिर मैंने (दलाई लामा) उन्हें (नेहरू को) बताया कि मैं मूल रूप से भारत का आतिथ्य नहीं चाहता था (नेहरू के रवैए से खिन्न होकर), बल्कि मैं लुंतसे दुजोंग में अपनी सरकार बनाना चाहता था। सिर्फ ल्हासा से आई सूचना ने मेरा मन बदल दिया। उस समय वे (नेहरू) और अधिक चिढ़ गए। वे बोले, ‘अगर ऐसा हुआ भी होता तो भारत सरकार ने उसे मान्यता नहीं दी होती।’ मुझे ऐसा लगने लगा कि नेहरू मुझे एक ऐसे युवा के रूप में देख रहे थे, जिसे समय-समय पर डाँटने की जरूरत है। बातचीत के अन्य हिस्सों के दौरान वे मेज थपथपाते रहे। उन्होंने एक या दो बार गुस्से से पूछा, ‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ हालाँकि, मैं यह जानते हुए भी आगे बढ़ा कि वे थोड़ी- बहुत दादागिरी कर सकते हैं।” (डी.एल./160-1) 

कई अंग्रेजों को भी नेहरू व्यर्थ और अतिरेकपूर्ण लगे। वायसराय लिनलिथगो और लॉर्ड वेवेल ने उन्हें जरा भी महत्त्व नहीं दिया। भारतीय स्वतंत्रता के बाद अमेरिकियों को भी नेहरू का व्यवहार अहंकार से भरा लगा।

 एम.जे. अकबर अपनी पुस्‍तक ‘नेहरू : द मेकिंग अ‍ॉफ इंडिया’ में आजादी से पहले के एक किस्से का वर्णन करते हुए लिखते हैं, जिसमें इलाहाबाद के पास के गाँवों के कई गरीब ग्रामीणों ने उनकी अत्यंत दयनीय हालत के सत्यापन के लिए उनसे संपर्क किया था। नेहरू उस काम को हाथ में लेने के प्रति जरा भी गंभीर नहीं थे, विशेषकर भयंकर गरमी के मौसम में। हालाँकि, “जब उन्हें इस बात का पता चला कि उन बेचारे फटेहाल ग्रामीणों ने रातोरात एक सड़क तैयार की है, ताकि उनकी कार आसानी से अंदरूनी ग्रामीण इलाके तक पहुँच सके, तो वे भावुक हो गए और उन्होंने उनकी उस उत्सुकता को भी देखा, जब उनकी कार के मिट्टी में फँस जाने पर ग्रामीणों ने उसे अपने हाथों से उठाकर बाहर निकाला। आखिरकार, वे अभी भी टोप और रेशमी जाँघिया पहनने वाले एक भारतीय साहब थे।” (अकब./129)