भाग 6: विद्रोह
अब तक अंजली और आरव का रिश्ता समाज की नज़रों में एक "गलती" बन चुका था।
घरवालों की बेरुख़ी, मोहल्ले की बातें और कॉलेज के ताने… सब कुछ रोज़ उन पर पत्थर की तरह गिर रहा था।
लेकिन दोनों ने तय कर लिया था कि अब वो पीछे नहीं हटेंगे।
आरव ने कहा था —
"अगर समाज हमें स्वीकार नहीं करता, तो हम अपनी दुनिया खुद बनाएँगे।"
🏠 नई शुरुआत
कुछ दिनों की मशक्कत के बाद, दोनों को कॉलेज के पास ही एक छोटा सा मकान किराए पर मिल गया।
दो कमरे, टूटी खिड़कियाँ, दीवारों पर सीलन और एक बल्ब की पीली रोशनी — यही था उनका नया घर।
पहली रात, अंजली ने टूटी चारपाई पर बैठकर कहा —
"यहाँ से तो हमारे सपनों का महल भी शुरू हो सकता है, आरव।"
आरव मुस्कुराया,
"हाँ… और मैं वादा करता हूँ, इसे ऐसा घर बनाऊँगा जिसमें तुम्हें कभी कैद महसूस न हो।"
उस रात दोनों ने चाय और बिस्कुट से डिनर किया। बाहर बारिश थी, भीतर उम्मीद।
💼 ज़िंदगी की असली परीक्षा
लेकिन ज़िंदगी सिर्फ़ प्यार से नहीं चलती।
किराया, खाने-पीने का खर्च, पढ़ाई… ये सब बोझ बनते जा रहे थे।
आरव को पार्ट-टाइम नौकरी करनी पड़ी — लाइब्रेरी में किताबें सजाने और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने की।
अंजली ने भी लड़कियों को कोचिंग देना शुरू किया।
छोटी-छोटी लड़कियाँ उसके पास आतीं और कहतीं —
"दीदी, आप जैसी बनना है।"
उनकी मुस्कान अंजली की थकान मिटा देती थी।
लेकिन शाम को जब दोनों थके-हारे मिलते, तो अक्सर बहस भी हो जाती।
"तुम देर से क्यों आई?"
"तुमने फोन क्यों नहीं उठाया?"
"हम ऐसे कब तक जी पाएँगे?"
प्यार में मिठास थी, पर अब उसमें जिम्मेदारियों का नमक भी घुल चुका था।
👥 समाज की नज़रें
पड़ोस वाले मकान में रहने वाली आंटी ने मकान मालिक से शिकायत की —
"ये तो शादीशुदा भी नहीं हैं… और साथ रह रहे हैं!"
धीरे-धीरे ये बातें मोहल्ले में फैलने लगीं।
किरायेदार बदलने का दबाव बढ़ा, पर आरव ने साफ़ कह दिया —
"हम कहीं नहीं जाएँगे। ये घर हमारा है।"
💔 अंजली की कमजोरी
एक दिन, अंजली को माँ का फोन आया।
"बेटी, तेरे पापा बीमार हैं। हर वक़्त तेरा नाम लेते हैं। क्या तू एक बार नहीं आ सकती?"
अंजली के दिल में तूफ़ान मच गया।
वो जानती थी कि अगर वो घर गई, तो समाज फिर उसे उसी बंधन में खींच लेगा।
लेकिन माँ की आवाज़…
"बेटा, तेरे बिना घर सुनसान है…"
उस रात अंजली बहुत रोई।
आरव ने उसे सीने से लगाया और कहा,
"अगर जाना चाहो तो जाओ, अंजली। लेकिन याद रखना — जो भी फैसला लो, वो तुम्हारा होना चाहिए, समाज का नहीं।"
✊ विद्रोह का ऐलान
अगले दिन अंजली ने कॉलेज में खड़े होकर कहा —
"मैं किसी से छुपकर नहीं जीऊँगी।
हाँ, मैं आरव के साथ रहती हूँ।
हाँ, हम शादीशुदा नहीं हैं।
पर क्या यही गुनाह है?
अगर प्यार गुनाह है, तो मैं बार-बार ये गुनाह करूँगी।"
उसकी आवाज़ बिजली की तरह गूँजी।
कुछ छात्रों ने तालियाँ बजाईं, कुछ ने ताने मारे।
लेकिन अब अंजली टूटने वाली नहीं थी।
आरव ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
"आज तुमने सचमुच विद्रोह किया है, अंजली। और मैं इस लड़ाई में तुम्हारे साथ हूँ।"
उस शाम, दोनों घर लौटे तो सीलन भरी दीवारें भी उन्हें ताक़त देती लग रही थीं।
शायद ये विद्रोह सिर्फ़ उनका नहीं था… बल्कि उन सबका था, जो समाज से हार मान चुके थे।
-VAGHASIYA