strange silence in Hindi Short Stories by Nandini Sharma books and stories PDF | अजीब ख़ामोशी

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अजीब ख़ामोशी


शहर के बीचोंबीच खड़ा वह पुराना हवेलीनुमा मकान हमेशा लोगों के लिए रहस्य बना रहा था। उसकी टूटी हुई खिड़कियाँ और जंग लगे गेट देखने वालों को भीतर झाँकने का मन तो करातीं, पर एक अनजाना डर हर बार रोक देता। लोग कहते थे, उस मकान में कोई नहीं रहता, फिर भी रात के सन्नाटे में वहाँ से अजीब आवाज़ें आती हैं।

रवि, जो हाल ही में पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करके लौटा था, ऐसी कहानियों पर यकीन नहीं करता था। उसके लिए ये सब अंधविश्वास था। उसने तय किया कि वह इस हवेली के रहस्य को उजागर करेगा। एक कैमरा और टॉर्च लेकर वह एक शाम हवेली की ओर निकल पड़ा।

सूरज ढल चुका था। हवेली के सामने खड़ा होकर रवि ने गहरी साँस ली। चारों ओर खामोशी इतनी गहरी थी कि अपने दिल की धड़कन भी साफ़ सुनाई दे रही थी। उसने धीरे-धीरे गेट खोला। गेट की चरमराहट ने उस खामोशी को तोड़ा, लेकिन कुछ पल बाद फिर वही अजीब सन्नाटा लौट आया।

हवेली के अंदर कदम रखते ही रवि को लगा जैसे समय यहाँ थम गया हो। धूल की मोटी परत हर चीज़ पर जमी थी, टूटी कुर्सियाँ, फटे परदे और दीवारों पर उखड़ा हुआ रंग। मगर जो बात सबसे अजीब थी, वह थी वातावरण की गहरी ख़ामोशी। ऐसा लग रहा था मानो हवेली साँस भी नहीं ले रही।

रवि ने कैमरा ऑन किया और रिकॉर्डिंग शुरू की। उसने पहली मंज़िल की ओर कदम बढ़ाए। हर सीढ़ी पर चढ़ते हुए आवाज़ गूंजती, लेकिन अगले ही पल फिर सब खामोश। ऊपर पहुँचकर उसने एक कमरे का दरवाज़ा खोला। कमरा पूरी तरह खाली था, सिर्फ़ एक कोने में पुराना आईना रखा था। रवि ने टॉर्च की रोशनी आईने पर डाली। अचानक उसकी साँसें थम गईं।

आईने में उसकी परछाईं नहीं थी!

रवि ने घबराकर पीछे देखा—वह वहीं था, लेकिन आईने में कुछ नहीं। उसने हाथ बढ़ाकर आईने को छुआ। तभी एक ठंडी हवा का झोंका कमरे में आया और दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। रवि का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, पर वह हिल भी नहीं रहा था।

तभी पीछे से एक धीमी आवाज़ आई—"इतनी देर लगा दी आने में..."

रवि ने डर से पलटकर देखा। कमरे में कोई नहीं था। आवाज़ मानो दीवारों से निकल रही थी। उसका शरीर पसीने से भीग गया। कैमरा अब भी रिकॉर्ड कर रहा था, और स्क्रीन पर धुंधले अक्षरों में एक वाक्य दिखा—"खामोशी कभी खाली नहीं होती।"

रवि के हाथ काँपने लगे। उसने कैमरा बंद करना चाहा, पर बटन काम नहीं कर रहा था। आवाज़ फिर आई—"अब तुम्हें भी खामोशी का हिस्सा बनना होगा।"

अचानक आईने में एक चेहरा उभरने लगा। वह चेहरा ठीक रवि जैसा था, लेकिन उसकी आँखें बिल्कुल काली और खाली। रवि पीछे हटने लगा, लेकिन उसके पैर ज़मीन से जैसे चिपक गए हों। धीरे-धीरे वह परछाईं आईने से बाहर आने लगी।

अगली सुबह लोग हवेली के बाहर भीड़ लगाए खड़े थे। पुलिस को सूचना मिली थी कि अंदर से किसी की चीख सुनाई दी। जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो कमरा खाली था। सिर्फ़ फर्श पर एक कैमरा पड़ा था, जिसमें आखिरी वीडियो में रवि का डर से भरा चेहरा और उसके पीछे वही काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

हवेली फिर से खामोश हो गई, पर अब उस खामोशी में रवि की मौजूदगी भी थी।

सिखावन: हर खामोशी खाली नहीं होती, कुछ खामोशियाँ सदियों तक चीख़ती रहती हैं—बस सुनने वाले कान चाहिए।