Yaado ki Sahelgaah - 26 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (26).

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (26).

   

                : : प्रकरण - 26 : :

         ' कीसी '  के जाने के बाद काजल मेरे करीब आ गई थी. हम लोग भी शाम को साथ ही निकलते थे.

         मेरा पगार तो नहीं बढ़ा था. लेकिन मैं बोंड्या के लेवल का था. उसे फर्स्ट क्लास का पास मिलता था, तो मैंने भी फर्स्ट क्लास के पास की डिमांड की थी  जिसे मंजूरी मिल गई थी.

         काजल अच्छे परिवार से थी. वह अपने पैसे से फर्स्ट क्लास में ट्रेवल करती थी. हम दोनों साथ में ट्रावेल करते थे. मैं एक बार उस के घर भी गया था.. वह एक जाने माने लेखक और न्यूझ पेपर के तंत्री की भतीजी थी.

        वह भी कीसी लडके से प्यार करती थी.

        कुछ समय बाद उस की शादी हो गई थी. और उस का ससुराल हमारी बाजु में ही था. हम दोनों अक्सर ऐसे ही मिल जाते थे.

         शादी के दूसरे साल उस ने एक बेटी को जन्म दिया था, उसी दौरान मेरे घर मे कृष्णा ने जन्म लिया था.

          आगे जाकर दोनों एक ही नर्सिंरी स्कूल में भर्ती हुए थे, जूनियर KG और सीनियर KG में भी दोनों साथ में थी.

         शेठ ब्रदर्स छोड़ने के बाद मेरी मुलाक़ात एक जाने माने वरिष्ठ लेखक सुबोध पुजारी से हुई थी. वह छोटे पैमाने पर एक सामायिक चला रहे थे.

         उन्होंने मुझे लिखने मैं प्रोत्साहित किया था. मेरी कहानियां एवम लेखो को अपने सामायिक में प्रकाशित किया था. वह गांधीजी के अनुयायी थे उस की ही राह चलते थे.

         मैंने अपने अनुभवों को लेकर व्यापारी लोगो की पोल खोलते हुए एक लेख लिखा थी.

          खाजगी कंपनी की बलिहारी. उस के जरिये मैंने प्रेम सन और शेठ ब्रदर्स की पोल खोली थी.. वहां जो कुछ गलत हो रहा था  उस का चितार पेश किया था. जिसे पढ़कर अजय कुमार और उस के भाई के पैरों तले से जमीन निकल गई थी. 

       उन्ही दिनों आरती ने पड़ोश की महिला से सुनी कहानी बताई थी.

        एक युगल रात को बारह बजे अपने छोटे बच्चे के साथ फ़िल्म देखकर घर लौट रहा था. वह लोग टैक्सी तलाश  रहते थे. बड़ी मुश्किल से उन्हें टेक्सी मिल गई थी. वह लोग टेक्सी में बैठ गये थे. उस वक़्त महिला को देखकर टेक्सी वाले की नियत ख़राब हो गई थी. वह टेक्सी को अलग रास्ते ले गया था. फिर चाकू दिखाकर पुरुष को बच्चे को लेकर उतरने को बोला था और वह मारे डर के बच्चे को लेकर उतर गया था. और टेक्सी वाला महिला को अपने साथ ले गया था.

         बाप बेटे अकेले घर लौटे थे. यह देखकर उस के मात पिता ने सवाल किया था :

        पुरुष कुछ जवाब देने की स्थिति में नहीं था.

        सुबह बहू घर लौटी थी. वह रात भर कीसी पराये मर्द के साथ थी तो घरवालों ने उसे घर में आने नहीं दिया तो उस ने अपने आप को जलाकर खतम कर दिया.

        उस वक़्त छोटे बच्चे ने रोते हुए कहां :

        " मम्मी चप्पू से बची तो दियासली से गई. "

         इस सुनी हुई घटना के आधार पर मैंने ' नामर्द कहानी लिखी थी.

          उस के साथ और दो लेखक ने भी ऐसी कहानी लिखी थी.

        इस बात को लेकर पुलिस और पत्रकार के बीच जंग छिड़ गई थी.. पुलिस का कहना था ऐसा कुछ हुआ नहीं था ज़ब की पत्रकार, मिडिया का कहना था. ऐसा कुछ हुआ हैं.. और उस में मैं फ़स गया था.

       सच क्या था? यह जानने के लिये एक पत्रकार मेरे घर आया था. जिस का एक मित्र था वो उसे मेरे पास ले आया था.

      उस ने मुझे कहां था : स के पहले की पुलिस तुम्हारे पास आये, मैं तुम्हारे पास आया हूं. तुम्हे उन के चुंगल में फसने से रोकने के लिये. सच सच बताओ. आखिर क्या हुआ था?

       " जनाब! मैं एक लेखक हूं. छोटी सी बात में कल्पना के रंग भर कर कहानी लिखता हूं. उस में वास्तविकता ढूंढने का कोई मतलब नहीं हैं और असली बात यह हैं की मेरी कहानी में कोई बलात्कार नहीं होता. फिर मेरी कहानी को लेकर इतना हंगामा, शोर मचाने का क्या मतलब हैं? "

      " उस के पहले ऐसी कहानी फ़िल्म और रेडिओ नाटिका में आ चुकी हैं. "

      और सब से बड़ी बात मेरा कोई दावा नहीं हैं के कहीं ऐसा कुछ हुआ हैं.

       मेरे खुलासे से इस प्रकरण का अंत आ गया था.

        लेकिन मैं बहुत गभरा गया था. मेरे घर वाले भी डर गये थे. उस वक़्त मेरा कहानी संग्रह अमदावाद में तैयार हो रहा था. मेरा एक मित्र, रिश्तेदार मेरी मदद कर रहा था. मैं अपने लिये कोई मुसीबत ख़डी करना नहीं चाहता था इस लिये मैंने उन्हें सूचना दी थी.

         " नामर्द कहानी को पुस्तक में शामिल न करे.. "

         लेकिन उन्होंने सब से पहले उसी कहानी को स्थान दिया था और मुझे नैतिक बढ़ावा दिया था.

        " तुम्हे तो खुश होना चाहिये तुम्हे पब्लिसिटी मिल रही हैं. "

      . ' नामर्द' कहानी विवादास्पद साबित हुई थी.

         उस के बाद मेरी दूसरी कहानी, ' प्रलोभन' प्रकाशित हुई थी. उस में मैंने जो कुछ लिखा था, वह संपूर्ण रूप से काल्पनिक था. लेकिन कहानी में जो कुछ लिखा था वैसा किस्सा एक लेखक के साथ हुआ था जिस ने उन्हें चिंतित कर दिया था.

        मेरे एक मित्र ने उस के बारे में मुझे आगाह किया था.

         राज हंस के कारण मैंने सामायिक का जोब छोड़ा था. उस वक़्त मेरे चाचाजी के लड़के ने मुझे अपनी ओफिस में बुलाया था. उन का भी एक्सपोर्ट इम्पोर्ट का धंधा था. उस ने मुझे बताया था.

         " मेरे पिताजी ने अंतिम समय मुझे बताया था.

          " संभव कुमार को अपनी कंपनी में भर्ती कर लेना. उन को इस लाइन का काफ़ी अनुभव हैं. तो आप हमारे साथ काम करोंगे? "

         मेरे पास कोई जोब नहीं था. मुझे उस की सख्त जरूरत थी. मैं तुरंत तैयार हो गया था. 

         उस का धंधा अच्छा चल रहा था जो उस के पिता की महेनत का नतीजा था. उस में धंधाकीय कोई ज्ञान नहीं था. वह फालतू चीजों में विशेष दयान देता था. उस वजह से उस का धंधा गिरता जा रहा था. और उस का फुफेरा भाई मेहनत से आगे बढ़ गया था और फैक्ट्री का मालिक बन गया था.

       मुझे उस की modus operandi समझ नहीं आती थी.

       लेकिन ओफिस में एक लड़की थी. जिस के साथ मुझे लगाव था. और मैं काम करता रहा था.

                       00000000000   ( क्रमशः)


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