महाभारत की कहानी - भाग-२०१
भीष्म द्वारा वर्णित सुलभा और जनक की कथा
प्रस्तावना
कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।
संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।
महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।
मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।
अशोक घोष
भीष्म द्वारा वर्णित सुलभा और जनक की कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न की उत्तर में भीष्म ने सांख्य, योग, गृहस्थाश्रम, तपस्या आदि बिषय में अनेक उपदेश देकर सुलभा और जनक का यह प्राचीन इतिहास कहा - सत्ययुग में मिथिल में जनक नामक एक राजा थे, उनका दूसरा नाम धर्मध्वज था। वे संन्यासधर्म, मोक्षशास्त्र और दंडनीति में निपुण थे तथा जितेन्द्रिय होकर राज्य-शासन करते थे। सुलभा नामक एक संन्यासिनी ने राजर्षि जनक की ख्याति सुनकर उन्हें परखने का संकल्प किया और योगबल से मनोहर रूप धारण करके मिथिला की राजसभा में उपस्थित हुईं। उनकी सौंदर्य देखकर राजा विस्मित हुए और पाद्य, अर्घ्य, आसन, भोज्य आदि से सत्कार किया। उसके बाद सुलभा ने योगबल से अपनी सत्ता, बुद्धि और आँखों को जनक की सत्ता, बुद्धि और आँखों से मिला लिया।
सुलभा के अभिप्राय को समझकर जनक ने उन्हें अपने मन में ग्रहण करके हँसते हुए कहा, देवी, तुम किसका कन्या हो, कहाँ से आई हो? तुम्हारे सम्मान के लिए मैं अपने तत्त्वज्ञान प्राप्ति के विषय में कहता हूँ, सुनो। वृद्ध महात्मा पंचशिखा मेरे गुरु हैं, उनके ही पास से मैंने सांख्य, योग और राजधर्म - इन तीन प्रकार के मोक्षतत्त्व सीखा है। आसक्ति, मोह और सुख-दुख आदि हिच्किचाहट से मुक्त होकर मैंने परमबुद्धि प्राप्त की है। यदि कोई मेरे दक्षिण बाहु पर चंदन लेपन करे और दूसरा मेरे बाएँ बाहु को काटे तो दोनों को मैं समान दृष्टि से देखूँगा। नि:स्व होने से मोक्ष प्राप्ति नहीं होती, धनी होने से भी नहीं, ज्ञान से ही मोक्ष प्राप्ति होती है। संन्यासिनी, तुम्हें सुकुमारी, सुंदरी और यौवना दिख रही है, तुम योगसिद्ध हो या नहीं इस विषय में मुझे संदेह हो रहा है। किसके सहयोग से तुम मेरे राज्य और राजभवन में आई हो, किस उपाय से मेरे हृदय में प्रवेश किया? तुम ब्राह्मणी हो, मैं क्षत्रिय हूँ। तुम संन्यासिनी होकर मोक्ष की खोज कर रही हो, मैं गृहस्थाश्रम में हूँ। हमारा मिलन नहीं हो सकता। यदि तुम्हारा पति जीवित हो तो मेरे लिए तुम अगम्य परपत्नी हो। तुम मुझे पराजित करके अपनी उन्नति करना चाहती हो। स्त्री और पुरुष का यदि आपस में अनुराग हो तभी उनका मिलन अमृततुल्य होता है, अन्यथा विषतुल्य। अतएव, मुझे त्यागकर तुम संन्यासधर्म का पालन करो।
जनक के कथन से विचलित न होकर सुलभा ने कहा, महाराज, जैसे काठ के साथ लाक्षा और धूल के साथ जलबिंदु, वैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और पाँच इन्द्रियों प्राणी के साथ जुड़े रहते हैं। आँख आदि इन्द्रियों से कोई परिचय पूछता नहीं, इन्द्रियों को भी अपने विषय में ज्ञान नहीं। आँख स्वयं को नहीं देखती, कान स्वयं को नहीं सुनता, एकत्रित होकर भी एक दुसरे को नहीं जान पाते। यदि तुम स्वयं को और अन्य को समान ज्ञान करते हो तो मेरा परिचय क्यों पूछ रहे हो? यह वस्तु मेरी है, यह मेरी नहीं - इस द्वन्द्व से यदि तुम मुक्त हो तो तुम्हारा प्रश्न निरर्थक है। तुम मोक्ष के अधिकारी न होकर स्वयं को मुक्त मानते हो। कुपथ्यभोजी के लिए औषधि सेवन, समदृष्टिविहीन व्यक्ति का मोक्ष का अभिमान वैसा ही व्यर्थ है। यदि तुम जीवन्मुक्त हो तो मेरे सन्निकर्ष से तुम्हारा क्या अपकार होगा? पद्मपत्र पर जल की तरह मैं निष्पाप भाव से तुम्हारे शरीर में हूँ, यदि इससे तुम्हें स्पर्शज्ञान हो तो पंचशिखा का उपदेश व्यर्थ हो गया। मैं तुम्हारी सजाति हूँ, राजर्षियों के प्रधान वंश में मैं जन्मी हूँ, मेरा नाम सुलभा है। योग्य पति न मिलने पर मैं मोक्षधर्म की खोज में संन्यासिनी बनी, उसी धर्म को जानने के लिए तुम्हारे पास आई हूँ। नगर के मध्य में शून्य घर मिले तो भिक्षुक जैसा रात्रि यापन करता है, वैसे ही मैं तुम्हारे शरीर में एक रात्रि निवास करूँगी। मिथिला राज, तुम्हारे यहाँ मुझे सम्मान और अतिथि सत्कार मिला। तुम्हारे शरीर में एक रात्रि शयन करके कल मैं प्रस्थान करूँगी। सुलभा के तर्कसम्मत और अर्थयुक्त वचनों सुनकर जनक राजा बिना उत्तर दिए मौन रहे।
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(धीरे-धीरे)