Yaado ki Sahelgaah - 29 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (29)

Featured Books
Categories
Share

यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (29)

                      : : प्रकरण -29 : 

        ललना ने मेरी जेब से आधे से ऊपर पैसे निकाल दिये थे. यह जानकर मुझे बड़ा झटका लगा था.

         मैं तुरंत आवास में गया था. तब वहाँ का नक्शा बदला हुआ था. उस रूम में एक आदमी बैठा था. जो कोई मेहमान होने का एहसास दिला रहा था.

        और एक दूसरा व्यकित जो पुरुष था जिस ने ऊपर कुछ नहीं पहना था और उस की छाती स्त्री जैसी थी. वह उस आदमी की चाय नास्ते से खातिरदारी कर रहा था.

          मैंने उसे सवाल किया था:

          "आशावरी कहाँ हैं? "

          " कौन आशावरी? यहाँ तो कोई ऐसी लड़की नहीं हैं!! "

        " ऐसी क्या बात हैं अभी कुछ समय पहले मैं उस के पास बैठ कर दया हूं. "

         " विश्वास ना हो तो खुद जाकर देख लो. अंदर खोली में सब लड़की मौजूद हैं. "

        मैंने अंदर जाकर साब कुछ छान लिया था. लेकिन वह कहीं नजर नहीं आई थी. इस बात से मैं बहुत परेशान हो गया था. आरती को क्या जवाब दूंगा? 

         मैं हताश, मायूस सीढ़िया उतर रहा था. वहाँ एक लड़की सफ़ेद ब्लाउज और स्कर्ट में ख़डी थी और वह बीड़ी पी रही थी. उसे देखकर मैं चकित हो गया था. वह लड़की होने के बावजूद भी बीड़ी फूंक रही थी.

         मैं उस की नजदीक से गुजर रहा था. मेरा चेहरा देखकर उस ने मुझे सवाल किया था.

         " क्या हो गया बाबू जी? यहाँ से तो सब लोग ख़ुश होकर जाते हैं! और आप के चेहरे पर तोते उड़ रहे है!!

          " एक लड़की ने मेरी पाकिट से पैसे निकाल दिये!"

.          " कौन थी वह लड़की? क्या वह आशावरी तो नहीं? "

          " तुम को कैसे पता? "

          वह अभी अभी बाहर गई हैं और वह मेरी बहन हैं उसे ग्राहक की जेब खाली करने की बूरी आदत हैं. "

           " हां थी तो वही. "

        " उस को HIV एड्स का रोग लग गया हैं "

        यह सुनकर मैं बहुत गभरा सा गया.

        कहीं मेरे को लग गया तो? मेरी भीतर सवाल हुआ.

         उस ने बीड़ी को फेंककर अपनी चपल से कुचल कर मुझे जो कहां मेरे मानने में नहीं आया. 

        " मेरा नाम स्नेहा हैं. जिस का मतलब होता हैं प्यार. मैं आप को बहुत प्यार करूंगी. आप की दोस्त बनुंगी और आप का पैसा भी वापस दिलाऊँगी. मेरी दीदी ने अपनी जिंदगी तो नर्क बना दी साथ में मुझे भी कहीं नहीं छोड़ा. मैं उस वक़्त एक लडके से प्यार करती थी. उस से अलग कर के मुझे इस नर्क में ले आई है.

         वह लड़का आज भी मुझे प्यार करता हैं. मुझसे शादी करना चाहता हैं. मैं भी नर्क से निकल कर उस से शादी करना चाहता हूं लेकिन यह लोग मुझे छोड़ने के लिये बड़ी रकम मांगते हैं. "

         मैं उस की कहानी सुनकर विचलित हो गया.

          क्या कहू? कुछ समज नहीं आ रहा था.

          उस ने मुझे वादा किया था.

           " आप मुझे अपना नंबर दे दो. मैं पुरे पैसे वापस दिलाऊँगी. "

        मैंने उसे अपना मोबाइल नंबर दिया था.

        और एक हप्ते में उस ने मुझे बुलाया था.

         पुरे पैसे लौटा दिये थे. साथ में खबर दी थी.

         उस की बहन का देहांत हो गया था.

         उस ने दोबारा मुझे गुजारिश की थी.

          " मुझे यहाँ से निकालो. "

          उस वक़्त मुझे गौरव की याद आई थी. वह कराटे का प्रशिक्षण देता था. उस की बहुत बड़ी टीम थी जो काफ़ी मजबूत थी.

        मैंने गौरव की सेना की बदौलत स्नेहा को छुटकारा दिलवाया था और उस की शादी भी करवाई थी.

         और उन्होंने भाड़े का घर लिया था. वह कहाँ थे? उस के बारे में जानकारी नहीं थी.

        उस का पति एस्टेट एजेंट काम करता था. उस की बदौलत मैंने अपना खुद का घर ख़रीदा था. उस के लिये मैंने HDFC, ओफिस, दोस्त वगैरह लोगो से लोन ली थी. अपने  गहने भी गिरवी रखे थे.

         मुझे जगह दिलाने के लिये उस ने कभी दलाली का जिक्र नहीं किया था. लेकिन उस के लिये पूरा हकदार था तो मैंने सामने से उसे दलाली दी थी.

          उस समय परमेश्वर भी भाड़े के घर में रहता था. उस के पास खुद का घर खरीदने की औकात नहीं थी. उस का उसे बेहद अफ़सोस हुआ था.

           स्नेहा की शादी को मुश्किल से एक साल पूरा हुआ था. वह जीवलेवा अकस्मात का शिकार हुआ था और स्नेहा को मेरी सहारे छोड़कर चल बसा था.

          वह भले कुछ समय नर्क में रही थी. लेकिन वह एक खानदान घर की आदर्श महिला की मिशाल थी. 

         उस के पति शेखर को खुद से भी ज्यादा स्नेहा पर भरोसा था. उस ने मरते वक़्त अपनी बीवी का हाथ मेरी हाथ में रखकर कहां था.

         " स्नेहा आप की बेटी हैं इस लिये मैं यह नहीं कहूंगा की उसे आप के साथ रखिये. वह अपना नसीब लिखवा कर आई हैं. उस के साथ क्या होगा? वह तो कोई नहीं जानता. अगर वह फिर से शादी करना चाहती है तो उसे शौख से वह करने देना नहीं तो उसे महिला आश्रम में भर्ती कर देना. "

 .      मैं खुद तो उसे अपने साथ रखने को तैयार था. लेकिन आरती, ललिता पवार और समाज के डर से ऐसा कर नहीं पाया था और मैंने उसे गरिमा के NGO में भर्ती कर दिया था, जो उस के लिये सब से सलामत जगह थी. वहाँ बहुत कुछ सिखने को मिला था.

        वह NGO में थी तो उसे नियमित मिलने मैं उसे मिलने वहाँ जाता था. उस ने वहाँ रखकर  टाइपिंग भी सीख लिया था. वह सब कुछ करने को तैयार थी.. वह नौकरी करना चाहती थी तो मैंने उसे शेठ ब्रदर्स में अपने डिपार्टमेंट में काम पर रखा था.

        उस वक़्त एक नई सच्चाई बाहर आई थी.. तिजोरी वाला उसे जानता था.. वह कामाठी पूरा में कई बार उस के पास गया था. 

         उसी ने ही उसे कामाठी पूरा के नर्क में धकेला था यह जानकार मुझे बड़ा सदमा लगा था. तिजोरी वाला उन की पड़ोश में रहता था. उस के घर में टी वी और वीडियो प्लेयर था. वह उस पर गंदी पोर्न फ़िल्म देखता था और दोनों बहनों को उस की आदत लगाई थी. और दोनों गलत रह चले गये थे. 

        बड़ी बहन आशावरी तो चल बसी थी. स्नेहा का नसीब कुछ अच्छा था. उसे उजले समाज में लौटने का सदभाग्य प्राप्त हुआ था. 

        उसे एक पति के बाद एक पिता की ओथ मिली थी.

                     00000000000   ( क्रमशः )