: : प्रकरण : : 32
एक दिन मैं चर्नी रोड स्टेशन के ब्रिज से गुजर रहा था. तब किसी जानी पहचानी आवाज सुनकर मेरे पैरों को ब्रेक लग गई थी. मैंने मुड़कर पीछे देखा तो चौंक सा गया.
क्षिप्रा किसी आदमी को पूछ रही थी.
" चलना हैं? "
बिल्कुल उसी अंदाज में वह आते जाते लोगो को पूछ रही थी, बिल्कुल आशावरी की तरह.
मैं कुछ बोलूं या करुं उस के पहले घराक को लेकर ब्रिज उतर गई और स्टेशन से बाहर निकलकर चौपाटी की तरह बढ़ गई.
किसी गलत आदमी से रिश्ता बनाना उस के लिये ख़तरनाक साबित हुआ था.
कुछ भी हो उस के प्रति मेरी दिल में कुछ लगाव था. मैं उसे सुधारना चाहता था, लेकिन बात काफ़ी बिगड चुकी थी.
वह कहाँ होती थी? उस का मुझे पता लग गया था.
मैं दूसरे दिन उसे खास मिलने दोबारा क्षिप्रा को मिलने चर्नी रोड पहुंच गया था.
उस के बारे में मैंने आरती को भी बताया था.
सुनकर उसे आघात लगा था.
उस की ऐसी हालत के पीछे अपनी मा और कुछ हद तक खुद सुहानी भी जिम्मेदार थी.
उस का करुण अंजाम हुआ था. वह शादी के पहले अनिश से प्रेग्नेंट हुई थी, जिस का उस ने निकाल कर दिया था. शादी के बाद उस को बच्चा पैदा नहीं हुआ था. वह पुरी तरह से खतम हो गई थी.. सासु मा ने भी वाँझ बहू को बहुत तकलीफ दी थी. उसे पुरी तरह से खाना भी नहीं देती थी. उस को नौकरानी बनकर रखा था. और उस ने अपने आप को मार दिया था.
उस ने कुए में गिरकर अपने आप को खतम कर दिया था. अनिकेत उस का पति था. उसे इस बात से बहुत बड़ा सदमा लगा था. सगी मा ने भी उस से सौतेली मा से बदतर व्यवहार किया था.
उस की आर्थिक परिस्थिति ठीक नहीं थी.. इस लिये वह अलग ऱह नहीं सकता था. कुछ भी हो वह अपनी मा थी उसे वह छोड़ नहीं सकता था. दुविधा ने उस की जिंदगी को बेकार कर दिया था.
मुझे क्षिप्रा मिली थी. मैं उसे वापस उजली बस्ती में ले जाना चाहता था. सब ने उस के साथ गलत किया था. फिर भी उस की शादी हुई थी. उस के सास ससुर अच्छे थे. उन का बेटा पुरुष में नहीं था. इस बात से अनजान थे और वारिस की धुन में उस की शादी करवा दी थी. अपना लड़का तो उन की ख्वाहिश पुरी ना कर सका तो उस के दोस्त ने उन्हें वारिस दिया, जिसे भगवान की भेंट समजकर स्वीकार लिया.
फिर भी बाबू खुदगर्ज साबित हुआ. वह उस के ससुराल के सारे पैसे और गहने और साथ में क्षिप्रा को लेकर फरार हो गया और उसे बड़ी रकम ऐंठकर वेश्या दलाल के हाथों बेच दिया.
उस ने गलती तो की थी. उस ने राजेश जैसे लडके से शादी ना कर के बहुत बड़ी भूल की थी. उस की बहुत बड़ी सजा भुगती थी. मुझे उस बात का अफ़सोस हो रहा था. ललिता पवार ने अपनी दो लड़कियो को गलत सजा दी थी, जिस के करना उन दोनों की अधोगति हुई थी.
मैं क्षिप्रा को मिला था. उस से सारी बातें हुई थी.
उस समय मुझे एक बात याद आई थी.
अनिकेत सुहानी को देखने आया था. उस वक़्त क्षिप्रा की खूबसूरती उस की आँखों में बस गई थी. लेकिन उस वक़्त वह छोटी थी तो उस के साथ शादी का सोचना बेकार था. उस के पहले घर में दो बहने थी.
अनिकेत दूसरी शादी करना चाहता था. यह बात याद आते ही मेरे दिमाग़ में दोनों को एक करने का ख्याल जागा था. ललिता पवार तो उसे घर में रखने को तैयार नहीं थी.
अगर दोनों man जाये तो बहुत कुछ सही हो सकता हैं.
मैं सब से पहले क्षिप्रा को उस के ससुराल ले गया. वहाँ उस का बच्चा दादा दादी की निगरानी में पल रहा था. उन को अपने बेटे की असलियत का पता चल गया था. बेचारी बहू का कोई दोष नहीं था. उन्होंने क्षिप्रा का बेटी के रूप में स्वीकार कर लिया और वह उजली बस्ती में आ गई.
बाद में मैंने अनिकेत से भी बात की, वह फ़ौरन क्षिप्रा को अपनाने को तैयार हो गया लेकिन उस के पास अपना घर नहीं था, यह एक समस्या थी जिस का क्षिप्रा के ससुर जी ने हल निकाला. उन्होंने ने अनिकेत को घर जमाई बना लिया.
और सब कुछ ठीक हो गया था.
उस समय मुझे सुहानी याद आ गई थी.
हर साल की तरह सुहानी और अनिकेत दिवाली विश करने के लिये मेरे घर आये थे. सुहानी ने हमें भाऊ बीज के लिये अपने घर बुलाया था.
उस की हालत देखकर मुझे तरस आया था. उस के शरीर में कुछ नहीं बचा था. वह हाडपिंजर, कंकाल बन कर ऱह गई थी.
वह दूसरा बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी और लोग उसे ' बांझ ' होने का ताना मारते थे. यह बात वह झेल नहीं पा रही थी.
नये साल के दिन वह पड़ोश में पानी लेने गई थी तब घर की बूढी औरत ने उसे ताना मारा था.
" हम लोग शुभ दिन पर बांझ का मुंह नहीं देखते."
यह बात वह सह नहीं पाई थी और नये साल के शुभ अवसर पर उस ने इस दुनिया से नाता तोड़ दिया था.
रात को तीन बजे उस की ननद का फ़ोन आया था.
" सुहानी भाभी ईझ नो मोर! "
यह सुनकर मानो भूचाल सा आ गया था.
मेरी पिताजी को भी बहुत दुःख हुआ था.
हम लोग सुहानी के घर जाने को निकल रहे थे. तब वह भी साथ आने को रोक लिया था.
मैं उसे बहन मानता था. उस बात का वह हमेशा लिहाज करते थे.
मैं और आरती रिक्शा में उस के घर की ओर चल पड़े थे. रस्ते में मुझे सुहानी की सब बातें मुझे याद आ रही थी.
" दीदी! दुनिया कुछ भी कहे. हमारे कुछ भी हुआ हो लेकिन वह सदैव बनकर मेरे साथ रहे हैं. उन को कुछ तकलीफ हुई हैं उस के लिये मैं और हसमुख जिम्मेदार है उसीने मेरे बडे भाई को मुझ से छिन लिया था. वह हमेशा मुझे अपनी छोटी बहन मानते हुए आये हैं. वह तो मुझ से राखी भी बंधवाना चाहते थे. लेकिन अपनी मा ने उसे स्वीकारा नहीं.
" रिश्ते बदलने नहीं चाहिये ऐसा संभाषण देकर उन को तकलीफ दी हैं. "
" उस ने भाई बहन के रिश्ते का घोर अपमान किया हैं, वह क्या समझेगी? "
आरती ने उस वक़्त यह सवाल किया था.
0000000000 ( क्रमशः)