A place of memories - Ranjan Kumar Desai (39) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 39)

Featured Books
Categories
Share

यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई ( 39)


                       : : प्रकरण -39 : :

         उस रात को पार्टी के बाद कहते हुए भी दोनों पुलिस वहाँ से बाहर निकले थे. एक छोटी खोली में हनीमून कैसे मनाना? वह समस्या थी. शकीला ने उन्हें घर से बाहर जाने को कहां था. लेकिन वह माने नहीं थे. उन्होंने ने दूल्हे पर वार किया था और उस की उपस्थिति में शकीला पर बलात्कार किया था. यह देखकर उस के पति अनवर ने उन का सामना करने की कोशिश में शकीला को शादी की रात बेवा कर दिया था. 

        यह बहुत शर्मनाक हकीकत थी, जिस ने शकीला के गुस्से को ज्वाला मुखी था. उस ने बदले की आग में सुलह कर के दोनों के साथ रहने का वादा किया था और उन्हें खाने पर बुलाया था और खाने में जहर देकर उन को खतम कर दिया था.

        लाश का पोस्ट मॉर्टम हुआ था और दोनों के पेट से जहर निकला था. इस घटना में केवल शकीला शंकास्पद थी. उसे तुरंत हिरासत में लिया गया था. उस के लिये जीने का मकसद नहीं बचा था, इस लिये उस के साथ जो घिनौनी हरकत की गई थी उस का ब्यौरा देकर अपना गुनाह कबूल कर दिया था.

       मै कुछ दिनों बाद शकीला को मिलने दादर स्टेशन गया था, तब मुझे सारी हकीकत का पता चला था. मैं तुरंत उसे मिलने जैल गया था. 

        वह मुझे देखकर चकित हो गई थी. उस ने मेरे गले लिपटकर मुझे बताया था. उस के पिताजी का देहांत हो गया था.

        इतना कहकर उस ने मुझे कहां था :

        " बाबा मैं मर जाना चाहती हूं, क़ानून की सजा पाकर मरने से तो ख़ुदकुशी कर के मर जाना अच्छा है. " 

        तब मैंने उसे समजाया था. " तुमने अपराध जरूर किया हैं लेकिन उस के लिये हालात और क़ानून के संरक्षक जिम्मेदार हैं. तुम्हे  सजा जरूर मिलेगी लेकिन मौत की सजा नहीं. तुमने पूर्व योजित प्लान से उन को नहीं मारा हैं बल्कि उन के अपराध की सजा दी हैं जो शायद क़ानून भी नहीं दे सकता था. 

        उसे आश्वस्त कर के उस के सिर पर हाथ रखकर मैंने उसे आशीर्वाद देते हुए ईश्वर से तहेदिल से प्रार्थना की थी. 

         " मेरी बेटी को सलामत रखना. "

                    0000000000000

       मेरी जिंदगी में कई लड़कियां आई थी लेकिन किसी ने मुझे गलत नहीं समजा था. लेकिन ऐसी लड़की थी जिस ने मेरी शराफत को चुनौती दी थी.

       वह ज्यादा कुछ ज्यादा जानती, समझती नहीं थी उस ने केवल अपने स्वार्थ के लिये मेरे साथ रिश्ता था, मैंने उस में ' कीसी' को देखने की कोशिश थी. उसे उस की जगह पर रखा था. मैंने उसे पैसे भी मदद की थी. और कीसी के साथ के रिश्ते के बारे में बताया था. हम लोग साथ आते जाते थे. यह भी बताया था. तभी तो उस ने कुछ बोला नहीं था, लेकिन उस ने यूनियन के सामने मेरी शिकायत करते हुए टकोर की थी.

       " कोई तुम्हारे साथ आये, खरीदी में हाथ बटाये उस से मुझे क्या लेना देना? "

        उस ने मेरी नियत पर संदेह किया था. उस की सास आकर आरती से शिकायत कर गई थी.. जिस की वजह से वह मुझ पर भड़क गई थी. मैंने उस के पिताजी को बताया था उस का गलत मतलब निकाला था.

          मैं उन्हें होटल में ले गया था. उन्हें खाना खिलाया था. और अपील की थी..

       " उसे समजाओ. उस ने बिना सोचे समझे यूनियन ज्वाइन कर लिया हैं. कंपनी तो उसे बर्खास्त करने वाली थी. मेरी कारण वह बच्च गई हैं. "

        मैंने उस से दूर रहना हीं मेरी सलामती समझा.

         ' कीसी' की तरह मेरी कहने पर वह मेरे को खरीदी में मदद करने मेरे साथ आई थी. उस के लिये भी उस ने क्या क्या कहां था? 

         हम लोग का एक हीं रास्ता था. तो मैंने साथ चलने की गुजारिश की थी. उस का भी मंदिरा ने गलत मतलब निकाला था.

       यूनियन के सामने मेरी छबी ख़राब करने का प्रयास किया था..

        आखिर में यूनियन ने मेरी सच्चाई को स्वीकारा था, जिस के लिये ओफिस का पियून को श्रेय जाता था उसी ने मंदिरा की सच्चाई उन के सामने रखी थी. उस के लिये मैंने उस का शुक्रिया अदा किया था.

      वह प्रेग्नेंट थी. उस वक़्त उस की जनेता ने उस का गर्भ गिरा दिया था. उस के बाद वह कभी मा नहीं बन पाई थी.

      मा बाप ने भी उसे कुछ सही नहीं सिखाया था. उस का पति तो उस के पीछे दिवाना हो गया था. अपनी बीवी का मानो गुलाम था. वह उसे कुछ नहीं कहता था.

      उस के पति ने मुझे भाड़े पर जगह दिलाई थी.. उस को मैंने पैसे की मदद भी की थी. फिर भी उस ने मुझ से दलाली वसूल की थी.

      और मैंने सदा के लिये किनारा कर लिया था.

                        0000000000

       मेरी मौसेरी बहन का लड़का 13 साल का था. एक बार हम लोग उसे मिलने बड़ोदा गये थे. उस वक़्त जिद कर के मुंबई आया था.

       वह आठ दस दिन हमारे साथ रहा था. मैं उसे मुंबई के सभी स्थल देखने ले लगाया था. वह मेरी सभी मित्रो से धूल मिल गया था. मेरी तरह वह सब को अपना मामा कहकर बुलाता था. मेरी दोस्त लोग भी उसे प्यार करते थे, उस का ख्याल करते थे.

       उस की स्कूल खुलने वाली थी तो मैंने किसी के  संग बड़ोदा भेज दिया था.

       और कुछ हीं दिनों में बीमार पड़ गया था.. उसे टाइफाइड हो गया था. और एक महिने के भीतर वह भगवान को प्यारा हो गया था. उस की मौत से मेरी मौसेरी बहन पागल हो गई थी. कीसी ने उस के मन में यह बात डाल दी थी.

      " किसी ने मुंबई में उस के साथ जादू टोना किया था, उस वजह से उस कि मौत हो गई हैं. यह बात उस के दिमाग़ में घर कर गई थी, जिसे निकालना नामुमकिन सा हो गया था.

        उस ने घर की दीवारों पर अपने बेटे के ढेर सारे फोटोस लगाकर रखे था जो उसे बेटे की याद हर पल दिलाते रहते थे. 

        उस वक़्त मेरी मुलाक़ात सुखलाल से हुई थी जो मुंबई सेंट्रल में कुली का काम करता था. उस का इकलौता बेटा छोटी उम्र में गुजर गया था. वह भी बड़ोदा का रहने वाला था. वह मुझे अकस्मात दो अलग जगह पर मुझे मिला था.

      उस ने अपने बेटे का दुःख भूला दिया था. उस का एक हीं जीवन मंत्र था.

       जीवन चलने का नाम

       चलते रहो सुबह शाम

                   0000000000        ( क्रमशः )