: : प्रकरण - 42 : :
उस के बाद ऐसी धारावाहिक प्रदर्शित हो रही थी. जो सही मायने में काबिले तारीफ हैं.. उस का नाम हैं ' पुष्पा इम्पोसिबल' वह एक ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन अपनी लगन, नेकी और स्वभाव से बहुत कुछ हांसिल करती हैं. उस के दो बेटे और एक बेटी होते हैं. उस को सही शिक्षण दिया था. दोनों की अच्छे घर में शादी होती हैं.
वह छोटे बच्चों के साथ वह स्कूल में पढ़ती हैं. और अपनी मेहनत से अपने आप को वकालत के काबिल बनाती हैं.
उस का पति अतीत में उसे छोड़कर विदेश चला गया था. वहाँ उस ने काफ़ी उलटे पुलटे काम किये थे. वह काफ़ी बदनाम था, लेकिन वह फिर ठिकाने आ गया था.
और सब कुछ ठीक हो गया था. लेकिन पुष्पा कभी बैठने वाली, हारने वाली में नहीं थी. उस के लिये सब कुछ पोसिबल था.
सब कुछ ठीक था लेकिन धारावाहिक में कादमबरी का किरदार दाखिल होता हैं और वह जो हरकते करती हैं, वह हजम नहीं होती हैं.
अपनी मरी हुई बहन के पति को प्यार के नाम फसाती हैं. उस से शादी करती हैं. पुष्पा समेट हर किसी से वह साजिश करती हैं. घर में अपना स्थान क़ायम करने के लिये सगर्भा होने का नाटक करती हैं और पुष्पा की बहू के जुड़वा बच्चे में से लड़की को चुराकर अपना होने का दावा करती हैं और अस्पताल के कर्मचारी को पैसे खिलाये थे.. वह बड़ी शातिर बाई हैं वह किसी को अपनी हरकते जानने नहीं देती
फिर यहाँ वही प्रश्न खड़ा होता हैं.. वह किस के लिये ऐसा करती थी?
उस का दिमाग़ कैसे चलता था? उस के पास हर सवाल का जवाब था. किसी को कहाँ, कैसे और कब बाटली में उतारना उसे मालूम था. उस का पति जुगल था, जो पुष्पा का बचपन का दोस्त का, उस के सारे परिवार के साथ वह खेल खेलती रहती थी.
उस ने दूसरे की बेटी चुरा ली थी. जो बड़ी होकर उस के जैसी ही खैपानी हो जाती हैं.
वह लोग जो चाल में रहते थे. उस का मालिक बापोद्रा हैं. उस के घर में, 22 साल के बाद लड़का पैदा होता हैं. वह भी शैतान को शरमाता था. वह मा बाप को उन के नाम से बुलाता था
अभी ऐसी औलादो से लोग क्या शिखेंगे?
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सुंदर ने अपनी नकारात्मक सोच की वजह से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी. इतना बस नहीं था तो उसे शेयर मार्किट का चस्का लग गया था. उस ने बड़ा नुकसान किया था. फिर भी उसे छोड़ने को तैयार नहीं था. वह उस के पीछे लग गया था.
गरिमा के कहने पर मैंने उस की शादी करवा दी थी. उस के बाद उस की जिंदगी में कुछ बदलाव आया था लेकिन उस के सिर से शेयर बाजार का भूत उतरा नहीं था. ईश्वर ने भी उस के साथ कमाल किया था. आँखों की रोशनी के लिये उसे मोहताज रखा था लेकिन शेयर बाजार के बारे में उस की गजब की सोच थी. वह पूरा दिन टी वी के सामने बैठा रहता था. उस वजह से उसे सारे शेयर की जानकारी मिलती रहती थी. वह कभी की कोई शेयर खरीद लेता था. और उस पर कड़ी निगरानी रखता था. भाव बढ़ते ही उसे बेच देता था.
शेयर मार्किट में दाखिल होने के पहले उसे मेरी तरह कहानी, लेख लिखने का मेरी तरह शौख था. क्रिकेट उस का प्रिय विषय था. उस पर उस ने न जाने कितने तुलनात्मक लेख लिखें थे, जो प्रकाशित भी हुए थे, लेकिन बदले में कोई रॉयल्टी या वेतन नहीं मिलता था तो उस ने लिखना बंद कर दिया था.
मैं उसे कहानी के सिलसिले में श्री बी आर चोपडा के पास भी ले गया था. लेकिन उस के भाग्य का सितारा बुझ गया था जो कभी चमका नहीं था. क्यों की उस ने कोई कोशिश नहीं की थी.
मैंने उसे कई बार समजाया था. कोशिश मत छोड़ो. लेकिन उस ने मेरी बात पर कोई दयान नहीं दिया था.
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती.
मशहूर लेखक जावेद अख्तर भी टी वी माध्यम से अक्सर यहीं बात दोहराते रहते थे. लेकिन उस ने किसी चीज पर दयान देना जरूरी नहीं था.
स्नेहा अपने पति को हर तरह की मदद करना चाहती थी. उस ने श्री गणेश की तरह सुंदर के लिये लहिये की भूमिका निभाई थी लेकिन उसे अपने आप पर कोई भरोसा नहीं था.
ज़ब वह ब्लाइंड इंस्टिट्यूट में था तो उस की काबिलियत देखकर वहाँ के प्रिंसिपल ने उसे फिजियोथेरेपी के लिये चुना था लेकिन उस ने मना कर दिया था. वह काफ़ी समय वहाँ रहा था. उस ने क्या सिखा था? वह तो याद नहीं लेकिन दूसरे लड़के की सोबत में गालिया बोलना सीख लिया था. वह अपनी मा को गंदी गालिया देता था.
उस को इंस्टिट्यूट की तरफ से सफ़ेद और लाल कलर की छड़ी दी थी जिस के सहारे वह बाहर निकल सकता था. लेकिन उस ने छडी का कभी इस्तेमाल नहीं किया था. उस ने छड़ी को ना जाने कहाँ छिपा दिया था जिस के बारे me उसे कुछ पता नहीं था. वह हर छोटी बातों को बराबर याद रखता था लेकिन छड़ी के बारे में उसे कुछ मालूमात नहीं थी.
वह दिल से हार गया था. उस ने सोच लिया था. अब उसे कुछ काम नहीं करना हैं. ऐसी स्थिति में भला क्या मदद कर सकता है?
उस की सोच ही उस की बर्बादी की वजह बनी थी.
इंस्टिट्यूट में उसे कुछ चीजे बनाना सिखाया गया था. वह उसे बनाता था.. लेकिन उसे बेचने के लिये घर से बाहर नहीं निकलता था. उसे बेचने मुझे जाना पड़ता था. मैंने सभी रिश्तेदार, दोस्तों, परिचितो और पड़ोसियों के दरवाजे खटखटा कर सामान बेचा था उस में सुंदर ने मेरी कोई मदद नहीं की थी.वह तन से तो अपाहिज हो गया था लेकिन उस की नकारात्मक सोच ने उसे मन से भी अपाहिज कर दिया था. अब उसे कौन मदद कर सकता था.
वह कुछ नहीं कर सकता था. फिर भी बड़ी बड़ी बातें करता था.
" मैं टेलीविज़न और अन्य माध्यम से बहुत कुछ सिखा हूं. "
लेकिन उस का क्या फायदा था?
उस ने कुछ नहीं किया था.
फिर भी अपनी टांगे ऊपर रखकर चलता था.
और कहाँ से उस के दिमाग़ में शेयर बाजार घूस गया था.
0000000000 ( क्रमशः)