A companion of memories - Ranjan Kumar Desai - (44) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (44)

Featured Books
Categories
Share

यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई - (44)

  

                   : :  प्रकरण - 44 : :

         मेरे दिमाग़ में क्या क्या ख्याल आते थे.

         मुझे क्रिकेट खेलना अच्छा लगता था..

         स्कूल के दिनों में हमारी क्रिकेट की टीम थी. और मैं उस का कप्तान भी था.

         उस के अलावा मैं आंतर वर्गीय क्रिकेट मैच भी खेला  था.  एक मैच में मैंने 24 रन बनाये थे. उस के अलावा दो विकेट्स भी लिये थे. एक ही दाव में पांच से अधिक विकेट्स मैंने लिये थे. 

          एक ओवर में चार बिकेट्स लेने का रेकॉर्ड मेरे नाम दर्ज था.

           दो बार मैंने पचास से अधिक रन बनाये थे

           एक बार मैंने सीधे थ्रो से बेटसमेन को रन आउट किया था.. एक बार मैंने विकेट कीपर की भूमिका निभाई थी और बेटसमेन को गिरकर स्टम्प किया था. 

           उस समय एक क्रिकेट क्लब का सदस्य वहाँ मौजूद था. वह यह देखकर काफ़ी प्रभावित हुआ था.. उस ने मुझे क्लब ज्वाइन करने के लिये आमंत्रित किया था. लेकिन मेरे अपने में ही कुछ कमी थी. मैं जरूरी मेहनत नहीं कर पाया था.

        क्रिकेट के प्रति मेरा अज्ञान कारणभूत था. मुझे ऊँचा शोट्स लगाने की धुन थी.. उस में मैं जल्दी से आउट हो जाता था.  मैं बडे लोगो के साथ भी क्रिकेट खेलता था. 11 वे नंबर पर बेटिंग कर के एक बार नाबाद 19 रन बनाये थे. 1 विकेट भी ली थी, 1 कैच भी लपका था.

       ऐसा ही हाल मेरा गीत गाने के बारे में था.. मैं हर कोई गीत गा लेता था. इस बात से बिल्डिंग के लडके मुझे गीत गाने को बोलते थे. और अनन्या के घर में सब जमा होते थे. मैं ऐसा भ्रम में रहता था, मैं अच्छा गायक हूं इस लिये वह लोग मुझे बुलाते थे. हकीकत में वह लोग मेरी मजाक उड़ा देते थे

       मुझे गीत के सभी बोल मालूम नहीं थे. इस लिये कोई भी शब्द मिलाकर गीत पूरा करता था, जिस की वजह से रमुज पैदा होता था.

        मुझे फ़िल्म देखने का बड़ा शौख था. कोई भी नई फ़िल्म रिलीज़ होते ही मैं पहले ही हप्ते उसे देखने का मिजाज रखता था. लोअर स्टोल की टिकिट के लिये घंटे भर कतार में खड़ा रहता था.

        एक बार मुझे इस बारे में बुरा अनुभव हुआ था.

        फ़िल्म मुग़ले आझम रिलीज़ होने वाली थी.. उस का एडवांस बुकिंग खुल गया था. मैं पिताजी से दो रूपये की नोट लेकर टिकिट बुक करने गया था.. वहाँ बड़ी लंबी कतार लगी थी. मैं घंटे दो घंटे कतार में खड़ा था लेकिन नंबर नहीं आया था. मैं टेंशन महसूस कर रहा था. इस स्थिति में दो रूपये की नोट चबा गया था.

     मैं ओर टेंशन में आ गया था. पिताजी को क्या कहूंगा? यहाँ मुझे जुठ का सहारा लेना पड़ा था.

     फ़िल्म में पृथ्वी राज कपूर, दिलीप कुमार और मधुबाला ने काम किया था.

      इस फ़िल्म का यह गाना बड़ा मशहूर हो गया था.

       प्यार किया तो डरना कया

      प्यार किया कोई चोरी नहीं की

      छूप छुप आहे भरना क्या

       अकबर को प्यार शब्द से मानो एलेर्जी थी. उन का बेटा अनारकली से प्यार करता हैं. वह उसे रोकने की कोशिश करते हैं ज़ब कुछ नहीं होता हैं तो वह अनारकली को लोहे की जंजीर में कैद करता हैं और उसे दीवार में जिंदा दफना देते हैं. 

       यह मधुबाला की फ़िल्म का अंत था. लेकिन असली अंत अत्यंत दर्द नाक था. 

        मधुबाला किशोर कुमार की दूसरी पत्नी थी.. उन के नसीब में शायद पत्नी का सुख नहीं लिखा था. किशोर कुमार एक मल्टी टैलेंटेड इंसान थे, वह एक अभिनेता ही नहीं बल्कि एक प्ले बेक सिंगर, म्यूजिक डायरेक्टर, गीतकार, एडिटर, निर्माता और दिग्दर्शक थे

       यह सारी जिम्मेदारी अपने सिर पर उठाये उन्होंने ' दूर गगन की छाँव में फ़िल्म बनाई थी जिस में अपने बेटे अमित कुमार को एक मुक बालक का रोल दिया था.

       एक हादसे में फ़िल्म में किशोर कुमार की बीवी की मौत हो जाती हैं, उस के सदमे से लड़के की जुबान पर असर होती हैं और वह बोल नहीं पाता हैं.

       बेटे को फिर से बोलने में समर्थ करने के लिये वह जो मेहनत करते हैं वह काबिले तारीफ हैं.

        उन की कलम से लिखें गये सभी गीत लोगो को जुबानी हो गये थे :

      आ चल के तुझे मैं ले के चलू एक ऐसे गगन के तले

       जहाँ गम भी ना हो आंसू जहाँ प्यार ही प्यार मिले


         कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन


       जिन रातो की भोर नहीं हैं

       आज़ ऐसी ही रात आई हैं

        रात के तारों तुम्ही बता दो

        मेरी वो मंजिल हैं कहाँ?


        उस के बाद उन्होंने ने अपने बडे भाई अशोक कुमार को लेकर ' दूर का राही ' फ़िल्म बनाई थी.

       उस के बहुत पहले किशोर कुमार ने उस दौर में अपने दोनों भाई अशोक कुमार, अनूप कुमार और मधुबाला के साथ ' चलती का नाम गाडी ' बनाई थी जो सुपर हिट कोमेड़ी की फेहरिस्ट में शामिल थी

       किशोर कुमार अभिनय में तो माहिर थे लेकिन वह ज्यादा सफल प्ले बैक सिंगर थे. उन्होंने हर कोई अभिनेता के लिये प्ले बैक दिया था.

       उन्होंने सब से पहले देव आनंद के लिये प्ले बेक दिया था. फ़िल्म ' फंटूश ' के गीत ने उस जमाने में धूम मचाई थी.

       दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना

       जहाँ नहीं सहना वहाँ नहीं रहना

       लाख यहाँ झोली फैला दे

       कुछ नहीं देंगे यह जग वाले

       पत्थर के दिल मोम ना होंगे

       लाख तु कितना नीर बहाले

       दुनिया का नग्न सत्य इस गीत में उभर रहा था.

       उस के बाद उन्होंने ने हर कोई अभिनेता के लिये प्ले बेक दिया था जिस में राजेश खन्ना, जीतेन्द्र, धर्मेंद्र, शशि कपूर, रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, फ़िरोज़ खान, विनोद खन्ना, विनोद मेहरा इत्यादि लोगो के लिये भी गाया था. 

      उन के समकालीन प्ले बेक सिंगर्स अनेक थे :

       मुकेश, मोहम्मद रफी, मन्ना डे, महेंद्र कपूर, हेमंत कुमार, सुबीर सेन, विजय मुख़र्जी, तलत मेहमूद, नितिन मुकेश, मनहर, पंकज अवस्थी...

      पुराने ज़माने के गायक के एल साइगल, पंकज मलिक, सी एच आत्मा सब को उन्होंने ने पीछे छोड़ दिये थे.

      किशोर कुमार के बाद मुकेश और मोहम्मद रफी थे. उन्होंने ने भी सभी अभिनेताओं के लिये गीत गाया था.

      उस में खास बात यह थी.. मुकेश ने राज कपूर के सभी गीत गये थे ज़ब की किशोर कुमार ने देव आनंद के.

      उस के अलावा सचिन देव बर्मन ने फ़िल्म सुजाता, गाइड और तलाश फ़िल्म के लिये गीत गाये थे. 

                     0000000000   ( क्रमशः )