A companion of memories - Ranjan Kumar Desai - (48) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई -( 48)

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई -( 48)

  

              : : प्रकरण  - 48 : :

         मैं अगले इतवार को बिभूति को छोड़ने कुर्ला टर्मिनस पहुंच गया था. उस का टिकिट बुक था और बोगी नंबर मेरे पास थे. इस वजह से उसे ढूंढने में कोई दीक्क़त नहीं हुई थी.

        मैंने रेलवे स्टेशन से उस के लिये नास्ते के पैकेटस ख़रीदे. सफर लंबा था. उस की मौसी ने भी उसे टिफिन भर के दिया था.

        उस पर बिभूति ने मुझे अपनी बेटी की तरह डांट दिया था.

         " बडे पापा! यह सब करने की क्या जरूरत थी?मै यात्रा में भला कितना खा पाऊँगी. "

          " जितना खा सको उतना खाओ. मैं समझूंगा. यह साब मैंने खाया हैं. यह समजकर मैं खुश हूंगा. "

           " बडे पापा! चंद दिनों में आप तो मेरे पापा से भी आगे निकल गये हो. मुझे इतनी खुशी मत दो जो मुझे पागल कर दे. "

       करीब करीब आधा घंटा हमें बात करने का मौका मिला था.

        तब सिटी बजी थी. गाड़ी छूट रही थी.

        मैंने उस के सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिये थे.

        " बडे पापा! बाय बाय!! "

        कहते हुए उस की आँखों से गंगा जमनी बहने लगे थे.. उसे देखकर  मेरी आंखे भी नम हो गई थी. हम लोग क्या मिले थे? और कया अलग हो गये थे. दोबारा मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी.

           उस की यात्रा के दौरान प्रति दो घंटे व्हाट्सप्प पर बात की थी. उस का हालचाल पूछा था. ट्रैन में उसे कुछ अच्छे सह यात्री मिल गये थे.

        वह ज़ब तक गौहाटी नहीं पहुंची मैंने उस का हालचाल पूछा था. घर पहुँचने के बाद उस ने मुझे व्हाट्सप्प  किया था.

        " बडे पापा! मैं सुख रूप अपने घर पहुंच गई हूं." 

        " बेटा हम लोग तो कभी मिल पायेंगे उस का पता नहीं. " 

         " बडे पापा! ऐसी बात क्यों कर रहे हो? मेरी शादी बडे पापा के बिना कैसे हो सकती हैं? मैं आप को और स्नेहा दीदी को शादी में आमंत्रित करूंगी, इतना हीं नहीं तुम्हारे दोनों के लिये रिटर्न टिकिट भी भेजूंगी. "

          " बेटा! मेरी तबियत का कोई भरोसा नहीं. और स्नेहा भी मेरे बेटे को छोड़कर नहीं आ पायेगी.. तो ऐसा कुछ मत करना. "

         " ठीक हैं शादी के पहले मैं आप को फोन करूंगी. परिस्थिति देखूंगी.. फिर क्या करना हैं वह तय करूंगी. "

         उस के बाद वॉट्सअप के जरिये हमारा बातचीत का सिलसिला जारी था.

         और छह महिने में उस की शादी हो गई थी.. उस ने शादी में आने का न्योता भी दिया था.. उस ने स्नेहा को मेरा हाल चाल पूछा था.. उस वक़्त मेरी तबियत ठीक नहीं थी. मेरा हरण्या का ओपरेशन हुआ था.. और मैं घर से बाहर निकलने की स्थिति में भी नहीं था.

      मैं उस की शादी में नहीं जा पाया था. उस का बिभूति को बड़ा अफ़सोस हुआ था.

       उस ने फोन पर मुझ से बात की थी. तब उस की आँखों में आंसू का मानो सैलाब उमट रहा था.

       ना जाने पिछले जन्म में वह मेरी क्या थी?

       कुछ समझ नहीं आ रहा था.

       उस ने अपनी जिंदगी का बड़ा राज मेरे सामने खोला था.

       वह क्षिप्रा का बेटे से वह प्यार करती थी. उस का बेटा भी बिभूति को चाहता था.. वह दूसरी बिरादरी से थी. इस लिये क्षिप्रा ने शादी के लिये मना किया था.. फिर भी दिल पर पत्थर रखकर एक दोस्त बनकर अपने प्रेमी की शादी में हाजिर हो गई थी.

      उस वक़्त उस के दिलों दिमाग़ में फ़िल्म नजराना का गीत गूंज रहा था.

       मैंने अपनी शमा बुझाकर teri शमा जला दी है

       कहूं हुआ हैं अरमानो का फिर भी तुझे दुआ दी हैं

        वह मेरे बारे में सब कुछ जानती थी. मेरा बेटा किसी भी चीज के लायक नहीं था.. उस समय मुझे तो यह भी पता नहीं था. उस की शादी का कोई चान्स नहीं दिख रहा था. शादी के डेढ़ साल बाद उस ने मुझे खूश खबरी दी थी.

        " बडे पापा! भगवान बड़ा महान हैं. उस ने मेरी गोद एक नहीं बल्कि दो बेटों से भर दी हैं..

         वह तो मुझे एक बच्चा देने को तैयार हो गई थी. लेकिन मैंने उस को मना किया था. तब उस ने मुझे कहां था..

         " बडे पापा! यह मेरी इच्छा नहीं है. यह भगवान की मरजी है. इसी लिये तो उस ने मेरी गोद दो बच्चों से भर दी हैं. आप ज़ब चाहे तब मैं आप को एक बच्चा सुप्रत कर दूंगी. "

       उस की ऐसी दिलेरी का भगवान ने उसे बड़ा उपहार दिया था

         और तीन महिने के भीतर उस ने खुद आकर एक बच्चा हमें दे दिया था. उस से स्नेहा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा था. 

          मैंने सदैव औरत जात का सन्मान किया था. उसी वजह से मेरी जिन्दगी में कई लड़कियां आई थी जिस ने मुझे एक पिता से बढ़कर इज्जत प्रदान कई थी, एक भाई का दर्जा दिया था.

      भाई का दर्जा मुझे  कीसी ने दिया था.

       दो लड़कियो को मैं चाहता था उसे मैंने बहन बनाया था. और संगीता और बिभूति ने मुझे पिता का स्थान दिया था.

       मुझ से बड़ा भाग्यवान इस दुनिया में कौन हो सकता था? 

         संगीत या ने म्यूजिक, संगीता या ने म्युझिका. मैंने उसे यह नाम दिया था.. इस बात से वह बेहद ख़ुश थी.

         उस ने शादी के बाद, दूर होते हुए भी यह रिश्ता निभाया था. इतना हीं नहीं उस की बेटी रिधिमा को मैंने कभी देखा नहीं था. उस ने अपनी मा से मेरे बारे में सुना था उस ने मुझे 'दादू' होने का सन्मान दिया था.

         वॉट्सअप पर मैंने उस का फोटो देखा था.. ढेर सारी बातें की थी. हमारे बीच गजब का ट्यूनिंग हो गया था.

          वह लोग तो बंगलुरु में सेटल थे. लेकिन रिधिमा  लिटरेचर में Ph. D करने ऑस्ट्रेलिया में रहती थी. 

           उस को अपनी मा ने बताया था. मैं एक लेखक हूं और कहानिया और उपन्यास लिखता हूं. यह जानकर उस ने मुझे सामने से फ़ोन किया था.

         " दादू! मम्मी ने मुझे बताया हैं की आप बडे लेखक हो. लेकिन भारत में उस की कोई कद्र नहीं इस लिये लिखने का मन नहीं कर रहा. "

        " हा बेटा! साहित्य के बारे में यहाँ कंगालीयत हैं.. पढ़ने, लिखने के लिये कोई पैसे खर्चा करने को तैयार नहीं है. न्यूझ पेपर्स भी लोग अड़ोश पड़ोश से मांगकर पढ़ते है. कहानी, उपन्यास पढ़ने के लिये कोई खर्चा करने को तैयार नहीं, लाइब्रेरी में जाकर पढ़ते हैं. "

      " दादू ! मैं साब कुछ जानती  हूं.. इसी लिये यहाँ आई हूं. आप लिखना चाहते हो तो मैं आप की मदद कर सकती हूं. "

      " लेकिन मैं तो गुजराती या हिंदी में लिखता हूं.. "

       " उस की फ़िक्र मत करो मैं उन का अंग्रेजी में अनुवाद कर लूंगी. उस से आप को काफ़ी पैसे  मिल जायेंगे और लोग आप के फैन्स बन जायेंगे. "

        यह सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई थी.

        मुझे अपनी मंज़िल सामने दिखाई दे रही थी,

                       0000000000000 ( क्रमशः)

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