A companion of memories - Ranjan Kumar Desai, (51) in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई, ( 51)

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई, ( 51)


                       : : प्रकरण -51 : :

        मुझे रिधिमा ने बताया था. वह साहित्य में पी एच डी कर रही थी. उस ले सिडनी में काफ़ी लोगो के साथ उठना बैठना था. वह मुझे मदद कर सकती थी, मेरी छोटी कहानिया और उपन्यास प्रकाशित करने में मेरी मदद कर सकती हैं. मेरी कहानिया और उपन्यास गुजराती हिंदी में था उस का मुझे टेंशन था

       यह सुनकर उस ने मुझे सुझाव दिया था.

       " आप चाहे तो गूगल ट्रांसलेट एप्लीकेशम के जरिये उसे जिस भाषा में अनुवाद कर सकते हो. "

       मैं अपनी उपन्यास यादों की सहेलगाह हिंदी  में लिख रहा हूं. मैं उसे अंग्रेजी में भी प्रकाशित करना चाहता था. यह सुनकर उस ने खुशी व्यक्त की थी.:

       मेरी उस के पहले ढेर सारी लघुकथा प्रकाशित हुई थी. लेकिन उस का कोई वेतन नहीं मिला था. उस ने मुझे डिप्रेस्ड कर दिया था. आरती  भी इस स्थिति मुझ से नाराज थी.

        बेकार में क्यों कहानी भेजनी चाहिए? उस ने सवाल उठा था. लिखने की जगह कोई दूसरा काम करूंगा तो कुछ पैसे घर में आयेंगे..

        उस की दलील सही थी.

         रिधिमा के कहने पर मैंने उपन्यास की समरी भेजी थी. उसे बढ़कर वह काफ़ी प्रभावित हुई थी.

         और मैंने गूगल ट्रांसलेट एप्लीकेशन के जरिये उस का अनुवाद कर के भेजना चालू कर दिया था.

          पब्लिशर ने मुझे अग्रिम राशि भेजकर मुझे नैतिक सहयोग दिया था. 

          और मैंने गूगल ट्रांसलेट की मदद से पूरा उपन्यास रिधिमा को भेज दिया था. तीन महिने के अंदर मेरी उपन्यास किताब बनकर  पब्लिश हुई थी. उस की 20 प्रत और बाकी के पैसे भी भेजे गये थे.

        यह मेरी अप्रतिम सफलता थी. मेरा सपना था जो पूरा हुआ था. आरती मेरी लेखन प्रवृत्ति से सख्त नाराज थी. मैंने उसे चैलेंज दिया था. मैं एक दिन प्रतिष्ठित लेखकों की जमात में शामिल हूंगा. वह दिन आ गया था. लेकिन आरती उसे देखने के लिये हयात नहीं थी. मुझे उस बात का रंज होता था.

       पिछ्ली उम्र में उस में काफ़ी बदलाव आ गया था. मुझे उस में ललिता पवार नजर आ रही थी. वह अपनी मा के नक्शे कदम पर चल रही थी.

       अपनी मा की तरह उसे हर कोई कामकी, बिना काम की चीजों को जमा करने की आदत लग गई थी. खाने की चीजों को लंबे समय तक बचा कर रखना उस का मुख्य काम ऱह गया था

        उस में सुंदर ने भी अहम भूमिका निभाई थी. वह घर का चौकीदार बनकर आरती की हर बात पर कड़ी नजर रखता था. बात बात में आलोचना करता था.

       समय का चुस्त पाबंदी होने का दावा करता था.. हर चीज को समय देखकर मांगता था. उस के लिये वह एक मिनिट का भी इंतज़ार नहीं कर पाता था.

       शेयर बाजार का रोग उस की नस नस में समा गया था. दिन रात उसे ओर कुछ नहीं दिखता था.

       उस के लिये वह घर में सब को तंग करता था..

       जरा सा भी विलम्ब होने पर चिल्लाता था, कुछ ना कुछ बबड़ता रहता था.

       अपनी मा को भाव जानने के लिये हर घड़ी परेशान करता था और खाने में जरा सी देर होती थी वह बर्दास्त नहीं करता था.

       जरा सा कुछ काम के लिये वह किचन से होल में या बेड रूम में जाती थी तब हीं वह चिल्लाता था.. बबडाट करता था. सवाल करता था.

     " कहाँ हो? क्या करती हो?? "

      उस का आवाज पहाड़ी था. वह धीरे से बोल नहीं पाता था.  यह आदत उसे विरासत में मिली थी. उस की नानी ओर मामा की तरह वह हमेशा ऊँची आवाज में हीं बात करता था.

       मेरी तो उसे कोई गिनती हीं नहीं थी. मेरा घर में कोई स्थान मा बेटे ने रखा था. मेरा काम करना बंद हो गया था तो वह मेरे साथ एक नौकर  जैसा व्यवहार करते थे.

        उन्ही की वजह से मुझे अस्पताल में दाखिल होने की नौबत आई थी. लेकिन मा बेटे यह मानने को तैयार नहीं थे. बस दोनों एक हीं गाना गाते थे.

        मेरा ओपरेशन हुआ था. उस में करीब करीब एक लाख का खर्चा हो गया था. उस के बारे में दोनों ने कितनी बार मुझे ताने मारे थे. दस दिन अस्पताल में रहने के बाद मुझे अनाथालय की अस्पताल में भर्ती किया था. वहाँ दाखिल होते समय मुझे झूठ बताया गया था.

       " यहाँ सब फ्री हैं. " मैंने यह बात बात मान भी ली थी. मुझे वहाँ 25 दिन रखा था. और 1000 प्रति दिन के हिसाब 25000 रुपया चुकाना पड़ा था. अगर मुझे मालूम होता तो कभी अस्पताल में नहीं रहता था.

       ओपरेशन हुआ उस दौरान मेरी हालत बहुत हीं ख़राब थी उस वक़्त मैंने अपने निजी रिश्तेदार को बहुत कुछ डांटा था. बाद में मैंने उस की माफ़ी मांगी थी.

        मेरा बुरा हाल था. मैं कठिनाई के दौर से गुजर रहा था. उस वक़्त मुझे ' मानु घर' के डोक्टर और उस की बीवी की दोस्त बहुत याद आती थी.

        भले अस्पताल में मेरे साथ जो भी हुआ था.

        लेकिन उस डोक्टर और लड़की ने मेरा ख्याल रखा था. हर रोज मेरी खबर पूछते थे.

        शुरू में मैंने उस की बात मान ली थी फिर अपने अतीत को याद करने की कोशिश की थी. लेकिन मुझे कुछ याद नहीं रहा था. क्यों? 

         यह एक सफ़ेद झूठ था. मेरे सामने सच्चाई आ गई थी. मैंने उस लड़की की बर्थ डे बारे में पूछपाछ की तो मुझे चला था. हम दोनों के बीच 22 साल का अंतर था. इस स्थिति में हम कोलेज में साथ कैसे हो सकते थे?

       अब उस ने ऐसा क्यों किया था. यह तो बेहतर वही बता सकती थी.

       उस का तो कोई जवाब नहीं मिला था.

       लेकिन इतना तो मानना पड़ा था. यह उस अस्पताल की ' modus operandi ' - कार्य प्रणाली थी. वह लोग हर पेशंट के साथ ऐसा हीं व्यवहार करते थे, उन का दिल जितने की कोशिश करते थे.

        अस्पताल का एक कर्मचारी था. जिस से मेरी जमती नहीं थी. दो तीन बार मेरी उस से मच मच भी हो गई थी. मैंने उस के बारे में डोक्टर और उस लड़की से शिकायत भी की थी.

       एक दिन मेरे पैर पर गरम चाय गीरी थी. मैंने उस के उपचार के लिये बात कहीं थी. लेकिन उस ने दयान नहीं दिया था. मैंने उस लड़की को बताया था. उस ने खुद मेरे पैरों पर दवाई लगाई थी. और उस को बूरी तरह से डांटा था.

      अस्पताल का एक महिने का चार्ज डाइपर के साथ 20000 था., मैं उधर 25000 दिन रहा था. उस वक़्त मुझे मालूम नहीं था.. मैं 25 दिन की जगह महिना ऱह लेता तो मेरे पांच हजार रूपये बच जाते. मुझे किसी ने भी महिना पूरा करने की बात नहीं की थी.

                      O000000090    ( क्रमशः)