अध्याय 7: तीन दरवाजे और ख़ज़ाना
तहखाने की उस बर्फीली शांति में अविन की तेज़ होती धड़कनें अब धीरे-धीरे अपनी लय में लौट रही थीं। सामने खड़ा 15 फीट ऊँचा हड्डियों का वह दानव, 'गजराज', जो कुछ पल पहले साक्षात् काल बनकर झपटा था, अब एक पालतू जानवर की तरह अपना भारी-भरकम मस्तक अविन के चरणों में झुकाए खड़ा था। अविन के हाथ में वह 'सांपों वाली चाबी' किसी दिव्य मशाल की तरह नीली आभा बिखेर रही थी, जो अंधेरे को चीरती हुई दीवारों पर नाच रही थी।
"देखा? इसे कहते हैं असली 'रॉयल स्वैग'!" अविन ने अपनी धूल भरी जैकेट के कॉलर्स झाड़ते हुए ऊपर की ओर देखा। उसकी आवाज़ उस विशाल कक्ष की दीवारों से टकराकर गूँजी। ऊपर बालकनी पर वीरभद्र और रघुवन अभी भी बुत बने खड़े थे। "ओए ऊपर वाले भूतों! अब नीचे आओ और मुझे रास्ता दिखाओ, वरना मैं इस कंकाल-हाथी को तुम पर ही छोड़ दूँगा! बहुत डराया है न मुझे? अब मेरा हाथी बोलेगा!"
सेनापति वीरभद्र, जिसकी सात फीट की काया किसी अभेद्य चट्टान जैसी थी, ने अपनी विशाल तलवार 'शत्रु-नाशिनी' को म्यान में डाला और अपना पैर आगे किया पल भर में ही वो हवा में गायब हो गया, अविन के ठीक सामने आ गया । उसके चेहरे पर अब खुशी थी, और एक योद्धा का अटूट सम्मान था। वह अविन के सामने एक घुटने के बल बैठ गया।
"क्षमा करें महाराज," वीरभद्र की भारी आवाज़ गूँजी। "गजराज ने आपको स्वीकार कर लिया है। यह चाबी केवल एक पुरातन धातु का टुकड़ा नहीं, इस हवेली की मर्यादा और आत्मा है। आप ही इसके योग्य थे।"
तभी, मंत्री रघुवन सीढ़ियों के ऊपर उड़ते हुए अंधेरे से बाहर निकले। वे अपनी पुरानी पोथियों को सीने से लगाए हुए थे, उनकी आँखों के पीछे सदियों की कूटनीति चमक रही थी। "वीरभद्र सही कह रहे हैं महाराज। गजराज 300 साल से उसी की प्रतीक्षा कर रहा था जिसके हाथ में 'नाग-पाश' चाबी चमके। अब यही गजराज आपको उन तीन द्वारों तक ले जाएगा जहाँ आपका भाग्य... या आपकी मृत्यु... आपका इंतज़ार कर रही है।"
अविन की 'रॉयल स्वैग' वाली हंसी रघुवन की 'मृत्यु' वाली बात सुनकर थोड़ी फीकी पड़ गई।
अविन: "अभी तो माहौल सेट हुआ था और आपने फिर से 'डेथ वारंट' की बात शुरू कर दी?
गजराज ने अपनी हड्डियों वाली लंबी सूँड धीरे से नीचे झुकाई, मानो वह अपने नए स्वामी को चढ़ने का न्योता दे रहा हो। अविन हिचकिचाते हुए आगे बढ़ा, पर उसका मन अब भी कह रहा था कि 'बेटा अविन, अगर इसने छींक मार दी तो तू मंगल ग्रह पर जा गिरेगा।'
"चलो भाई, अब जब यहाँ तक आ ही गए हैं तो सवारी भी कर लेते हैं," अविन ने खुद को हिम्मत दी और गजराज की सूखी पसलियों के सहारे चढ़कर उसकी रीढ़ की हड्डी पर जा बैठा। जैसे ही वह बैठा, उसकी आँखों के सामने तारे नाच गए। "अबे! इसकी पीठ पर तो मखमल भी नहीं है? ये तो ऐसी है जैसे किसी ने कंटीली झाड़ियों पर बिठा दिया हो! हड्डियाँ चुभ रही हैं भाई! अगले जन्म में जब हाथी बनना, तो थोड़ा कैल्शियम और मांस भी साथ लाना, बहुत डिस्कम्फर्टेबल है ये।"
गजराज एक झटके से उठा। अविन का संतुलन बिगड़ा और वह हाथी की गर्दन पकड़ने की कोशिश करने लगा। रघुवन ने एक हल्की मुस्कान के साथ इशारा किया, "महाराज, अपनी पकड़ मज़बूत रखिये। गजराज को तेज़ी पसंद है।"
गजराज एक भयानक चिंघाड़ के साथ उस अंधेरी सुरंग की ओर बढ़ा। हर कदम पर हड्डियों के टकराने की 'खड़-खड़' आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी। वीरभद्र और रघुवन मशालें लेकर उसके पीछे-पीछे साये की तरह हवा में उड़ते हुए आगे बढ़ रहे थे।
सुरंग के अंत में तीन विशाल पत्थर के दरवाज़े थे, जिन पर अजीबोगरीब आकृतियाँ बनी थीं। जैसे ही गजराज वहाँ रुका, तीनों दरवाज़ों से एक साथ आवाज़ें आने लगीं।
वीरभद्र ने अपनी तलवार बाहर निकाली और सतर्क हो गया। "सावधान महाराज! यहाँ से केवल आपकी बुद्धि ही आपको बचा सकती है।"
अविन के सामने अब तीन विशाल द्वार थे, जो किसी प्राचीन अभिशाप की तरह अपनी जगह जमे हुए थे। गजराज की हड्डियों वाली पीठ पर बैठा अविन नीचे झाँक रहा था, जहाँ वीरभद्र और रघुवन की परछाइयाँ मशाल की रोशनी में लंबी और डरावनी दिख रही थीं।
1. दाहिना द्वार: 'माया का जाल'
यह द्वार शुद्ध सोने का बना प्रतीत हो रहा था। इसकी दरारों से तप्त कुंदन जैसी पीली रोशनी फूट रही थी।
* विवरण: दरवाज़े पर कुबेर की आकृतियाँ बनी थीं, जिनकी आँखों में लाल माणिक जड़े थे। भीतर से हज़ारों सोने के सिक्कों के आपस में टकराने की 'छन-छन' की आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई खज़ाने का समुद्र हिलोरे ले रहा हो।
* अविन की पुतलियाँ फैल गईं। लालच की एक हल्की लहर उसके दिमाग में उठी। उसने बुदबुदाया, "भाई साहब! अगर इसका 1% भी मिल गया तो अगला आईफोन क्या, पूरी कंपनी अपनी होगी।" पर तभी उसे उन सिक्कों की खनक में किसी के दाँत किटकिटाने की आवाज़ सुनाई दी, जिसने उसे सचेत कर दिया।
2. बायाँ द्वार: 'वासना का भ्रम'
इस द्वार से निकलती नीली और गुलाबी धुंध पूरे फर्श पर रेंग रही थी। इसकी नक्काशी में झूमती हुई अप्सराएँ और खिलते हुए कमल थे।
* विवरण: हवा में चमेली और कस्तूरी की इतनी गाढ़ी महक थी कि अविन का सिर चकराने लगा। भीतर से आती सुरीली आवाज़ किसी ठंडी छुरी की तरह कानों में उतर रही थी— "राजा रे... ।" अविन का हाथ अनजाने में उस ओर बढ़ा, उसके चेहरे पर एक मदहोश मुस्कान तैरने लगी। पर जैसे ही उसने गौर से देखा, उसे धुंध के पीछे सफेद सफेद हड्डियाँ और सड़ते हुए मांस की गंध महसूस हुई। उसका 'रॉयल स्वैग' एक पल में पसीने में बदल गया।
3. बीच का द्वार: 'शून्य का काल'
यह कोई दरवाज़ा नहीं, बल्कि पत्थर के सीने में किया गया एक गहरा काला ज़ख्म लग रहा था। यहाँ न सोना था, न इत्र—बस एक आदिम सन्नाटा।
* विवरण: द्वार के किनारों पर काले पत्थरों से लिपटे हुए विशालकाय नागों की मूर्तियाँ थीं, जो इतनी जीवंत थीं कि लगता था अभी फुफकारेंगी। उस अंधेरे से एक ऐसी ठंडी हवा आ रही थी जो फेफड़ों को जमा दे। बीच-बीच में 'हिसssss' की एक ऐसी आवाज़ गूँजती, जैसे कोई पहाड़ जैसा सांप करवट बदल रहा हो।
* अविन के रोंगटे खड़े हो गए। उसकी धड़कनें उसके कान के पर्दे फाड़ने लगीं— धक-धक, धक-धक। उसने अपनी 'नाग-पाश' चाबी को देखा, जो बीच वाले द्वार की दिशा में सबसे तेज़ नीली आग उगल रही थी।
अविन ने अपनी जैकेट का गला ढीला किया और हकलाते हुए बोला, "ये... ये तो 'कौन बनेगा करोड़पति' का लाइफलाइन वाला सीन हो गया। पर फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ गलत जवाब दिया तो सीधा यमराज के साथ डिनर फिक्स है!"
अविन ने एक गहरी सांस ली। उसकी नज़रें उन तीनों दरवाजों के बीच झूल रही थीं। एक तरफ बेशुमार दौलत की खनक थी, दूसरी तरफ जन्नत जैसा सुकून देने वाला भ्रम, और बीच में... बीच में था सिर्फ साक्षात् काल जैसा अंधेरा।
अविन ने अपनी हथेली में दबी उस 'नाग-पाश' चाबी को देखा। वह अब केवल नीली रोशनी नहीं दे रही थी, बल्कि अविन की नब्ज के साथ धड़क रही थी। चाबी से निकलती नीली किरणें किसी कंपास की सुई की तरह बार-बार बीच वाले काले द्वार की ओर इशारा कर रही थीं।
"लालच और अय्याशी... ये दोनों चीजें तो कहीं भी मिल जाती हैं," अविन ने खुद से फुसफुसाते हुए कहा, उसके चेहरे पर एक फीकी लेकिन दृढ़ मुस्कान आई। "पर ये जो सन्नाटा है ना... ये कुछ असली लग रहा है।"
उसने वीरभद्र और रघुवन की ओर देखा। वीरभद्र की तलवार अभी भी तनी हुई थी और रघुवन की आँखें अविन के फैसले को तौल रही थीं।
अविन: (ऊँची आवाज़ में) "सुनो तुम दोनों! अगर मैं वापस न आऊं, तो मेरी अलमारी के पीछे वाले जूते के डिब्बे में रखे दस हज़ार रुपये गरीबों में बाँट देना... और मेरा फोन फॉर्मेट कर देना! क्योंकि मैं इस 'बीच दरवाजे' को खोलने जा रहा हूँ।"
रघुवन के चेहरे पर एक संतोषजनक चमक आई। "सही चुनाव महाराज। साहस और सत्य का मार्ग हमेशा कठिन और अंधकारमय ही दिखता है।"
अविन ने गजराज के मस्तक पर एक थपकी दी। "चलो मेरे कैल्शियम के डिब्बे! सीधा उस काल के मुँह में। अगर आज मरना ही है, तो कम से कम 'रॉयल स्टाइल' में मरेंगे!"
गजराज ने एक भयानक चिंघाड़ मारी, जिससे हवेली की छत से धूल झड़ने लगी। उसने अपने भारी कदम बीच वाले द्वार की ओर बढ़ाए। जैसे ही वे द्वार की दहलीज के करीब पहुँचे, वह 'हिसssss' की आवाज़ तेज़ हो गई।
अचानक घटित हुआ:
द्वार के किनारों पर बनी पत्थर की नाग-मूर्तियाँ सजीव होने लगीं। उनकी पत्थर जैसी खाल अब काले चमकीले शल्कों (scales) में बदलने लगी। उन विशाल नागों ने अपनी लाल-तप्त आँखें खोलीं और अविन की ओर अपना फन फैलाया।
अविन: "अरे! ये तो पत्थर के थे ना? चीटिंग है ये! वीरभद्र भाई, कुछ करो!"
वीरभद्र ने अपनी तलवार हवा में घुमाई, "महाराज, ये रक्षक हैं। इनसे अपना रास्ता स्वयं मांगना होगा!"
अविन ने अपनी कांपती हुई मुट्ठी को ऊपर उठाया जिसमें 'नाग-पाश' चाबी थी। जैसे ही चाबी की नीली रोशनी उन नागों पर पड़ी, वे हिंसक होने के बजाय धीरे-धीरे झुकने लगे। सन्नाटा और गहरा हो गया, और वह काला द्वार धीरे-धीरे किसी विशाल प्राचीन गुफा की तरह खुलने लगा ।
जैसे ही वह काला पत्थर वाला द्वार पूरी तरह खुला, अविन की आँखों के सामने जो नज़ारा था, उसने उसके दिमाग के परखच्चे उड़ा दिए। यह कोई साधारण कमरा नहीं, बल्कि एक विशाल भूमिगत गुंबद था, जो किसी फुटबॉल स्टेडियम जितना बड़ा था।
खजाने का दिव्य दृश्य
कमरे की छत पर हज़ारों नीलम (Sapphires) जड़े थे, जो कृत्रिम तारों की तरह टिमटिमा रहे थे। फर्श पूरी तरह से सफेद संगमरमर का था, जिस पर सोने की नक्काशी की गई थी।
* सिक्कों के पहाड़: पूरे कमरे में यहाँ-वहाँ सोने के सिक्कों के 20-20 फीट ऊँचे ढेर लगे थे, जो किसी पिरामिड की तरह लग रहे थे।
* प्राचीन अस्त्र-शस्त्र: दीवारों पर ऐसी तलवारें और ढालें टंगी थीं, जो शुद्ध चांदी और हीरों से जड़ी थीं। उनकी धार अब भी इतनी तेज़ थी कि हवा को काट दें।
* कलाकृतियाँ: बीच-बीच में हाथी के दांत की बनी मूर्तियाँ और बड़े-बड़े मिट्टी के बर्तनों में बेशकीमती लाल माणिक (Rubies) और पन्ने (Emeralds) ऐसे भरे थे जैसे कोई अनाज भरा हो।
अविन के चेहरे पर इस वक्त कोई 'स्वैग' नहीं था, बल्कि उसका मुँह पूरी तरह खुला हुआ था और आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं आ रहा था।
"नहीं... ये कोई सपना है। पक्का! मैं शायद ऊपर हवेली में सो रहा हूँ और ये सब लुसिड ड्रीमिंग है," अविन ने बुदबुदाते हुए अपने हाथ पर ज़ोर से चिकोटी काटी।
"आउच! दर्द हुआ... मतलब ये असली है?"
उसने डरते-डरते एक कदम आगे बढ़ाया। उसने नीचे झुककर सोने का एक भारी सिक्का उठाया। सिक्के पर एक अजीब से 'नाग' का चिन्ह बना था। उसने सिक्के को अपने दाँतों से दबाकर चेक किया—दाँत में हल्का दर्द हुआ और सिक्के पर कोई निशान नहीं पड़ा।
"असली सोना है! कसम से, अगर इसे मुंबई की मार्केट में ले गया तो बवाल मच जाएगा!"
उसने एक बड़े मटके में हाथ डाला जो पन्नों (Emeralds) से भरा था। जब उसने अपना हाथ बाहर निकाला, तो उसके हाथ में हरे रंग की अद्भुत चमक थी। उसके चेहरे पर पसीना था, लेकिन आँखों में एक पागलपन भरा रोमांच। वह कभी एक मुकुट को देखता, तो कभी सोने की ईंटों को छूता।
तभी, अचानक उस ठंडे सन्नाटे को चीरते हुए वही रहस्यमई गूँजती हुई आवाज़ अविन के कानों में (या सीधे उसके दिमाग में) गूँजी:
> "चेतावनी: उत्तराधिकारी की पहचान पुष्ट हो रही है..."
> "सिस्टम लॉगिन: 90% पूरा हुआ।"
> "उपलब्धि: 'सत्य का चुनाव' सफ़ल।"
> "इनाम: 500 घोस्ट कॉइन्स (Ghost Coins) आपके खाते में जमा कर दिए गए हैं।"
>
अविन की आँखों में चमक और मन में लालच का सैलाब उमड़ रहा था। वह हज़ारों करोड़ की संपत्ति के बीच खड़ा था।
रघुवन और वीरभद्र के चेहरों पर एक अलौकिक संतोष था। अपने स्वामी को अपनी विरासत को इस तरह मंत्रमुग्ध होकर निहारते देख, उन दोनों की रूहानी आँखों में खुशी के आँसू जैसे झलक आए थे। वीरभद्र ने गर्व से अपनी छाती चौड़ी की, जबकि रघुवन ने अपनी पोथियों को सीने से लगाकर एक धीमी मुस्कान दी।
अविन: (सिक्कों के ढेर को सहलाते हुए) "रघुवन जी, ये सब... ये हवेली, ये तहखाना... ये सब आखिर था क्या? मुझे इस खजाने के बारे में सब जानना है!"
रघुवन धीरे से हवा में तैरते हुए अविन के करीब आए। उनकी आवाज़ में सदियों पुरानी यादों की गूँज थी।
"महाराज, यह हवेली महान राजा राज राजेश चौहान की 'गुप्त शरणस्थली' थी। जब हम जीवित थे, तब भी यहाँ बहुत कम आने की अनुमति थी। हमारी यादें अब धुंधली पड़ चुकी हैं, महाराज... पुरानी आत्माओं के पास अक्सर पूरा सच नहीं होता। बस इतना याद है कि उन दो द्वारों में, जिन्हें आपने नहीं चुना, इस हवेली के सबसे भयानक रहस्य बंद हैं। महाराज, मेरी एक विनती है... उन द्वारों को खोलने की हिम्मत कभी मत करना, वरना जो तबाही आएगी उसे हम भी नहीं रोक पाएंगे।"
अविन ने उन बंद द्वारों की ओर एक तिरछी नज़र डाली और फिर वापस खजाने को देखा।
'रहस्य-वहस्य तो ठीक है, पर पहले ये तो पता चले कि इस गल्ले में माल कितना है!'
तभी, वह रहस्यमयी यांत्रिक आवाज़ फिर से पूरे गुंबद में गूँजी:
> "आंकलन पूर्ण हुआ: इस खजाने का वर्तमान बाजार मूल्य करीब 5,000 करोड़ रुपये से भी अधिक है। ये 300 साल पुरानी दुर्लभ वस्तुएं हैं, जिनकी ऐतिहासिक कीमत अनमोल है।"
>
"पाँच... हज़ार... करोड़!" अविन के पैर लड़खड़ाए और वह सोने के सिक्कों के ढेर पर ही बैठ गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सा 'लालच' भरा रोमांच था। उसकी आँखों में चमकते हुए डॉलर के साइन (Signs) दिख रहे थे। "भाई साहब! पाँच हज़ार करोड़! अब तो मैं प्राइवेट जेट में घूमूँगा, बुर्ज खलीफा खरीद लूँगा... दुनिया का सबसे बड़ा 'रॉयल स्वैग' मेरा होगा!"
अविन ने पागलों की तरह खजाने की ओर हाथ बढ़ाया। उसने एक भारी हीरे जड़ा हार उठाना चाहा ताकि उसे अपनी जेब में रख सके।
तभी, वह आवाज़ बिजली की कड़कड़ाहट की तरह गूँजी:
> "चेतावनी! आप अभी इस खजाने को स्पर्श कर सकते हैं, पर यहाँ से बाहर नहीं ले जा सकते। जब तक आप इस हवेली के अंतिम रहस्य को पूर्णतः नहीं जान लेते, यह संपत्ति इसी तहखाने की कैद में रहेगी।"
>
अविन को लगा जैसे किसी ने उसे बर्फीले पानी में डुबो दिया हो। उसका चेहरा उतर गया और वह हक्का-बक्का होकर हवा में हाथ हिलाने लगा।
अविन: "अरे! ये क्या बात हुई? ये तो गलत बात है बॉस! थोड़ी तो सेटिंग कर लो... कम से कम एक किलो सोना? चलो आधा किलो? अरे यार, कम से कम ये एक छोटा सा हीरा ही ले जाने दो, बस एक आइटम! प्लीज, भाई समझ के!"
अविन हाथ जोड़कर उस अदृश्य आवाज़ के सामने गिड़गिड़ाने लगा। उसे अपनी आँखों के सामने पाँच हज़ार करोड़ हाथ से फिसलते दिख रहे थे।
> "अस्वीकृत (Denied)। नियम अटल हैं।"
>
अविन के आंखों में इस वक्त केवल एक ही चीज थी—"ख़ज़ाना, ख़ज़ाना और सिर्फ ख़ज़ाना!" 'पाँच हजार करोड़' की बात सुनकर उसकी बुद्धि पर जैसे लालच का परदा पड़ गया था। उसे न तो उस रहस्यमई आवाज़ की चेतावनी सुनाई दी और न ही वीरभद्र का सचेत करता चेहरा।
"रहस्य? अरे रहस्य गया तेल लेने! इस खजाने के साथ तो मैं खुद एक चलता-फिरता रहस्य बन जाऊँगा!" अविन ने अपनी जैकेट की चेन खोली और पागलों की तरह उसमें सोने की सिक्कों और हीरों के हार ठूंसने लगा। वजन इतना हो गया था कि उसकी पैंट नीचे खिसकने लगी थी, लेकिन उसे परवाह नहीं थी।
एक बड़ा सा हीरे का हार उसने गले में लपेटा और एक छोटा सा सोने का कलश अपनी बगल में दबा लिया। उसका हुलिया ऐसा लग रहा था जैसे कोई चोर म्यूज़ियम से भागने की फिराक में हो।
अविन: "रघुवन चाचा, रहस्य बाद में देखेंगे, पहले ज़रा मार्केट रेट चेक कर लूँ! वीरभद्र, रास्ता साफ करो, तुम्हारा महाराज अब 'मिस्टर इंडिया' का बाप बनने जा रहा है!"
उसने एक आखिरी बार खजाने के ढेर को देखा और अपनी पूरी ताकत बटोरकर दरवाज़े की ओर दौड़ लगा दी।
अविन: "चलो बेटा अविन, अब सीधे बैंक चलेंगे! गजराज, रास्ता छोड़ो! हट जाओ!"
अविन किसी ओलंपिक एथलीट की तरह सरपट भागा। उसकी आँखों में चमक थी और चेहरे पर एक पागलपन भरी मुस्कान। उसे लग रहा था कि वह बस उस चौखट को पार कर लेगा और फिर... आज़ादी!
लेकिन तभी वह हुआ जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।
जैसे ही वह दरवाज़े की दहलीज के ठीक ऊपर पहुँचा, हवा में एक ऐसी अदृश्य, जादुई और फौलादी परत उभरी जो पानी की सतह की तरह पतली थी लेकिन किसी पहाड़ जितनी मजबूत। वह परत किसी शक्तिशाली चुंबकीय ढाल (Magnetic Shield) की तरह थी, जो खजाने की एक-एक रत्ती की रक्षा कर रही थी।
अविन की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि वह चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाया।
"धड़ाम!"
एक ज़ोरदार टक्कर हुई। अविन का चेहरा उस अदृश्य दीवार से ऐसे टकराया जैसे कोई कार किसी कंक्रीट की दीवार से जा भिड़ी हो। उसका नाक और माथा उस 'अदृश्य शीशे' पर बुरी तरह पिचके, और एक पल के लिए वह वहीं हवा में चिपका रहा।
"चटssss!" की एक आवाज़ आई, जैसे किसी ने उसे हजारों वोल्ट का बिजली का झटका दिया हो। उस दीवार से निकली नीली ऊर्जा ने उसे पीछे की ओर ऐसे फेंका जैसे कोई फुटबॉल हो।
उसकी जेबों में भरे हुए सोने के सिक्के और ईंटें किसी झरने की तरह हवा में उछले और जादुई तरीके से वापस अपने-अपने ढेरों में जाकर सज गए। अविन हवा में कलाबाजी खाते हुए वापस खजाने के बीचों-बीच जा गिरा।
उसकी आँखों के सामने अब पाँच हजार करोड़ नहीं, बल्कि हजारों नाचते हुए तारे थे।
अविन: (हकलाते हुए, बेहोशी की हालत में) "खाज... ख़ज़ाना... मेरा... ख़ज़ाना..."