1966 में गोण्डा मुख्यालय में डिग्री कालेज खुल गया। थोड़े दिनों के लिए श्याम जी साहब उसके प्राचार्य का काम देखते रहे। डिग्री कॉलेज अभी नया था। टॉमसन कालेज के पीछे के चार कमरों में ही चलता था। टामसन कालेज और डिग्री कॉलेज दोनों की प्रबन्ध समिति में कई सदस्य कामन थे और जिलाधिकारी ही दोनों का अध्यक्ष होता है। वर्तमान में जिस भवन में डिग्री कॉलेज का कार्यालय है वह बिल्डिंग टामसन कालेज द्वारा ही प्रदत्त की गयी थी। एक बार डिग्री कॉलेज के कुछ बच्चों ने किसी बात पर विद्रोह कर दिया। उस समय श्याम जी साहब ही डिग्री कॉलेज का काम देख रहे थे। कॉलेज से शाम को मैं निकला तो विद्रोही बच्चे मुझे मिल गए। बात करते करते वे प्राचार्य जी से मिलने पर सहमत हुए। मैं उस बच्चे को लेकर प्राचार्य जी के आवास पर गया। प्राचार्य जी से मिलकर बच्चे सन्तुष्ट हुए और कालेज में शांतिपूर्वक काम करने लगे। डिग्री कालेज को खुलवाने में तत्कालीन डीएम राजेन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने बड़ी मेहनत की थी। वे कहते थे कि गोण्डा में डिग्री कालेज होना ही चाहिए। उन्होंने कालेज के नाम कुछ ज़मीन भी उपलब्ध कराई।
मान्यता की शर्तो को पूरा कराकर मान्यता ली गई। उस समय डिग्री कालेज में हिन्दी, अंग्रेजी, इतिहास, राजनीति शास्त्र और संस्कृत की ही कक्षाएँ चलती थीं। टॉमसन कॉलेज में काम करते हुए यदा-कदा डिग्री कॉलेज में भी सहयोग करना पड़ता । 1965 में मंहगाई भत्ते के प्रकरण को लेकर माध्यमिक शिक्षकों ने परीक्षा का बहिष्कार किया था। सरकार ने बाद में मंहगाई भत्ते की धनराशि निर्धारित की थी। 1969 में माध्यमिक शिक्षक संघ ने हड़ताल का आवाहन किया। उस समय महेश्वर पाण्डेय उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष थे। हड़ताल दिसम्बर महीने में की गई थी। उसमें कुछ दिनों के बाद जेल भरो का नारा दिया गया। हर जिले से काफी संख्या में अध्यापक जेल गए। गाँधी विद्या मन्दिर के प्राचार्य श्री त्रिपुरारी पाण्डेय जी हड़ताल में शामिल हो गए। टामसन कालेज में भी अध्यापकों की संक्षिप्त बैठक हुई जिसमें शिक्षकों ने स्पष्ट किया कि यह हड़ताल शासन से कुछ अपनी बात मनवाने के लिए है।
यह हड़ताल किसी भी प्राचार्य के विपक्ष में नहीं है। मैं प्राचार्य जी के विश्वासपात्रों में था, उनका शिष्य भी था। सभी साथी चाहते थे कि मै हड़ताल में आगे आऊँ। एक दिन त्रिपुरारी पाण्डेय ने गेट पर आकर सांकेतिक धरना भी दिया। उनके साथ और भी हड़ताली शिक्षक थे। टामसन कालेज में भी हड़ताल हो गई। मुझे जिले की संघर्ष समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उस समय तक मनकापुर और कर्नलगंज के अध्यापक हड़ताल में शामिल नहीं हुए थे। यह योजना बनी कि मनकापुर चलकर अध्यापकों से बात की जाए। प्राचार्य त्रिपुरारी पाण्डेय भी हम लोगों के साथ मनकापुर गए। मनकापुर इण्टर कालेज में एसडी सिंह प्रधानाचार्य थे। हम लोगों के पहुँचने पर छात्रों की छुट्टी कर दी। सभी अध्यापक एक कक्ष में इकट्ठा हुए। हड़ताल के उद्देश्यों पर चर्चा की गई और अध्यापक संघ की इकाई का गठन भी।
कालेज राजा मनकापुर का था जिनके दबाव के कारण अध्यापक खुलकर सामने नहीं आ पा रहे थे। हम लोग वहाँ से लौटे। कर्नलगंज में अध्यापकों से बात करने का जिम्मा मैंने लिया। मैं वहाँ दो वर्ष तक काम कर चुका था। प्राचार्य से लेकर सभी अध्यापकों से घनिष्ठता थी। वहाँ के अध्यापक प्रतीक्षा ही कर रहे थे कि जनपद मुख्यालय से कोई आये और हम लोग भी हड़ताल में शामिल हो जाएँ। मेरे पहुँचने पर प्राचार्य केदारनाथ पाण्डेय ने बच्चों की छुटटी कर दी। अध्यापकों से चर्चा हुई और वे सभी हड़ताल में शामिल हो गए। उस समय तक माध्यमिक शिक्षक संघ एक ही था। बाद में संघ कई गुटों में बँट गया। पाण्डेय गुट, शर्मा गुट, ठकुराई गुट में बँटते ही संघ में वह ताकत नहीं रही जो पहले थी।
अध्यापक संघ अध्यापकों की माँगों पर काम करे यह बात तो समझ में आती है पर उसे अध्यापकों के उत्तरदायित्व पर भी काम करना चाहिए। अध्यापक संघ प्रायः इस काम से बचते रहे हैं। माध्यमिक शिक्षकों के दबाव से कालेज का पैनल निरीक्षण खत्म कर दिया गया। यह कदम किसी तरह से उचित नहीं था। पैनल निरीक्षण के कई सकारात्मक पक्ष थे जिसे भुला दिया गया। अध्यापक संघों को अध्यापक हितों की बात करनी चाहिए पर दायित्व यह भी बनता है कि वे शिक्षा की गुणवत्ता पर काम करें। अध्यापकों को उत्तरदायित्व विहीन न होने दें।
जीतेशकान्त पाण्डेय - 1962 से 1970 तक आप टॉमसन कालेज में अध्यापक रहे। फिर आप प्रधानाचार्य होकर जनता उ0 मा0 विद्यालय कौड़िया बाजार में चले गये। आप वहाँ तीन वर्ष सैतालिस दिन प्राचार्य रहे। इसके बाद आप लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कालेज में आ गए। यह सब कैसे हुआ?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- रेकार्ड के हिसाब से 25 फरवरी 1970 को मैं तीस साल का हो गया यद्यपि वास्तविक उम्र बत्तीस की हो गई थी। माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्य के लिए तीस वर्ष की उम्र होनी चाहिए। इसलिए 30 वर्ष पूरा होते ही कई संस्थाओं के लोगों ने मुझसे प्रघानाचार्य पद के लिए प्रार्थना पत्र ले लिया। उसी में कौड़िया के लोग भी मेरे पास आये। मुझसे मिलने से पहले टामसन कॉलेज के कुछ बच्चों से बात की। बच्चों ने मेरा नाम सुझाया। प्रबन्ध समिति के लोग मेरे पास आये और कहा कि प्रधानाचार्य का पद मेरे विद्यालय में रिक्त है। आप आवेदन कर दीजिए। उनके आग्रह पर मैंने आवेदन कर दिया। जनता विद्यालय की प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष जिला अधिकारी होते हैं। उस समय तक अध्यापक और प्रधानाचार्य की नियुक्ति के लिए एडहाक कमेटियाँ बनती थीं जिसमें विभाग किसी विशेषज्ञ को नामित करता था। जनता विद्यालय के प्रधानाचार्य की नियुक्ति के लिए जो प्रबन्ध समिति बनी, उनमें जिलाधिकारी गोण्डा, एक विशेषज्ञ और कॉलेज के प्रबन्धक शामिल हुए।
जिलाधिकारी के आवास पर ही समिति की बैठक बुलाई गई थी। अन्य अभ्यर्थियों के सहित मैंने भी साक्षात्कार दिया। इसी बैठक में मेरा चयन हो गया। चयन तो हो गया था पर मैं पदभार ग्रहण करने के लिए बहुत इच्छुक नहीं हो रहा था। टॉमसन कॉलेज में अध्यापन करते हुए मैंने घर की खेती को अच्छी तरह सँभाल लिया था। इसलिए बाहर जाने से कतरा रहा था। मेरे गाँव में प्रतापगढ़ के एक ग्राम सेवक कार्यरत थे। उन्हें पता चला तो वे मेरे पास आए और कहा कि लोग नियुक्ति पाने का प्रयास करते हैं और आपका चयन हो गया है फिर भी आप जाना नहीं चाहते। यह अच्छी बात नहीं है, आप अपना कार्यभार ग्रहण कीजिए। रही खेती तो उसका भी काम चलता रहेगा। प्रबन्ध समिति के लोग भी दबाव डाल रहे थे कि शीघ्रातिशीघ्र कार्यभार ग्रहण कर लीजिए।
इन्हीं परिस्थितियों में मैंने 2 सितम्बर 1970 को जनता विद्यालय कौड़िया के प्रधानाचार्य का पद-भार ग्रहण किया। इस विद्यालय में कुछ कक्षाएँ छप्पर के नीचे लगती थीं और अध्यापकों का स्थायीकरण नहीं हो पाया था। सबसे पहले मैंने कौड़िया में ही रहने का मन बनाया। भावना यह थी पूरा समय देकर विद्यालय को ठीक ढंग से चलाया जाये। मैं स्वयं पूरे समय तक विद्यालय में रहता था और पढ़ाई के बाद कुछ खेलकूद भी कराने को सोचता था।
बच्चों की कांपियाँ मँगा कर देखता था और उन पर एक अलग रिपोर्ट भी तैयार करता था। इससे अध्यापकों ने लिखित कार्य को सतर्क होकर जाँचना शुरू किया। मेरे समयनिष्ठ होने पर अध्यापक भी समय का पूरा ध्यान रखते और विद्यालय सुचारु रूप से चलने लगा। इससे समाज में एक अच्छा संदेश गया और बच्चे भी अनुशासन में रहकर पढ़ाई करने लगे। जो भी साधन उपलब्ध थे उनका उपयोग किया जाता रहा। विद्यालय की कैशबुक वगैरह कुछ अधूरी थी उन्हें पूरा कराने में कुछ समय लगा। पर उसके बाद प्रतिदिन अवशेष का पासबुक से मिलान कर लिया जाता। यह व्यवस्था पूरे तीन वर्ष निर्बाध गति से चलती रही। विद्यालय के पास एक बिल्डिंग थी। मैंने उसमें सीढ़ी बनवा कर किनारे किनारे दीवाल खड़ी कर छत पर भी कक्षाएं चलाने की व्यवस्था करायी। संसाधन सीमित थे पर उससे ही निरन्तर कुछ न कुछ काम होता रहा।
1972 में ही उत्तर प्रदेश शासन ने माध्यमिक शिक्षकों के लिए घाटा अनुदान की व्यवस्था कर वेतन का भुगतान बैंक से कराना प्रारम्भ कर दिया। इसके लिए शिक्षा विभाग ने सभी नियमित अध्यापकों का वेतन निर्धारित किया और उसी के अनुरूप वेतन भुगतान प्रारम्भ हुआ। इससे अध्यापकों के रिकार्डस दुरुस्त हो गए जो अध्यापक अर्हता नहीं पूरी करते थे उनके वेतन का निर्धारण नहीं हुआ। इसलिए उन्हें विद्यालय छोड़ कर जाना पड़ा। हमारे विद्यालय में भी दो ऐसे अध्यापक थे जिनका वेतन निर्धारण नहीं हो सका। अब एक ही काम बाकी रह गया था। अध्यापकों का स्थायीकरण। मैंने प्रबन्ध समिति में प्रस्ताव रखा और काफी वाद विवाद के बाद अध्यापकों का स्थायीकरण हो गया। विद्यालय की परीक्षा को भी चुस्त किया और जो बच्चे सभी विषयों में अनुत्तीर्ण थे उन्हें अगली कक्षा में प्रवेश नहीं दिया गया। मेरे पहले किसी को भी अनुत्तीर्ण नहीं किया जाता था।
इसलिए जब मैंने यह व्यवस्था शुरू की तो गर्मी की छुट्टियों में कई अभिभावक कक्षोन्नति के लिए दौड़ते रहे पर जब कक्षोन्नति नहीं दी गई तो एक परम्परा-सी बन गई और फिर अभिभावकों ने आगे के वर्षों में सिफारिश करने की कोशिश नहीं की। यह बात जरूर अच्छी हुई कि मेरे तीन वर्ष 47 दिन के कार्यकाल में प्रबन्ध तन्त्र ने किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया। अध्यापक की रुचियाँ एवं क्षमताएँ भिन्न भिन्न होती हैं। उसको ध्यान में रखते हूए उनसे काम लिया जा सकता है। अध्यापकों ने भी अपनी क्षमता के अनुसार पूरे मनोयोग से काम किया। दो अध्यापक गोण्डा शहर से आते जाते थे। पर वे भी समय से आ जाते। मैं भी पूरे मनोयोग से आगे बढ़ने की कोशिश करता रहा।
1973 की गर्मियों में मेरे छोटे भाई राम सुन्दर सिंह का विवाह सम्पन्न हुआ। जेल रोड पर ही लड़की वालों का मकान था। घर से जेल रोड की दूरी दो किमी के अन्दर थी इसलिए हम लोग पैदल ही वहाँ पहुँच गए। केवल दूल्हे के लिए टैक्सी की व्यवस्था की गई थी। बारात में लड़की वालों की तरफ से कम से कम शिष्टाचार के लिए किसी नृत्यांगना को बुलाने की बात की गई किन्तु मेरे इन्कार करने पर वे लोग भी चुप हो गये। विद्यालय के लिए इण्टरमीडिएट की मान्यता के लिए आवेदन किया गया था किन्तु उस पर मेरे रहते हुए कोई कार्यवाही नहीं हो पायी।