The beginning of an unrequited love in Hindi Short Stories by Bharti 007 books and stories PDF | एक अनकही प्यार की शुरुआत

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एक अनकही प्यार की शुरुआत



जबलपुर की शांत गलियों में पली-बढ़ी आराध्या त्रिपाठी के सपनों में एक ही तस्वीर थी—सफेद एप्रन, स्टेथोस्कोप और एक डॉक्टर बनने का आत्मविश्वास।
बारहवीं के बाद उसने पूरे मन से NEET दिया, पर किस्मत ने बस दो-चार अंकों की दूरी रख दी ,सपना टूटा नहीं था, बस थोड़ा ठिठक गया था।

माँ-बाप दोनों शिक्षक थे—समझदार भी, समर्थ भी, उन्होंने बेटी की आँखों में उम्मीद देखी और फैसला किया ,एक साल ड्रॉप, और कोटा।

कोटा…
जहाँ हर सुबह अलार्म नहीं, सपने जगाते हैं।
कोचिंग, हॉस्टल, नोट्स, टेस्ट—आराध्या उसी लय में ढल गई, पढ़ाई में अच्छी थी, और खूबसूरती ऐसी कि नज़र ठहर जाए—पर उसे इससे कोई मतलब नहीं था।
एक महीने बाद उसे अजीब-सा एहसास होने लगा।

तीन-चार लड़के… हमेशा थोड़ी दूरी पर,
ना कुछ कहते, ना पास आते—बस मौजूद रहते , एक दिन छुट्टी के वक्त, उनमें से एक ने हिम्मत की और अपने राजस्थानी लहजे में बोला—“मारो नाम राजबीर सै… ग्राम बनाड़, तन्ने कि नाम सै?

आराध्या के कदम रुक गए, दिल तेज़ धड़कने लगा ,वो बिना जवाब दिए आगे बढ़ गई और पास के ब्यूटी पार्लर में घुस गई डर से वहां लड़कियों की जगह थी ,राजबीर बाहर ही रुक गया।

आराध्या को डर के साथ-साथ गुस्सा भी था , उसने दोस्तों को बताया, और फिर एक हफ्ते तक दोस्त उसे हॉस्टल तक छोड़ने लगे , अब राजबीर बस दूर से दिखता—पीछा नहीं, दख़ल नहीं।

आराध्या का दिल निकल रहा था पढ़ाई और कोटा की ठंड, शाम की चाय, गोलगप्पे
और भीड़ में कहीं दूर खड़ा राजबीर,
दिवाली आई, दोनों अपने-अपने घर चले गए ,लौटने के बाद एक दिन, आराध्या अकेली कोचिंग से लौट रही थी ,
अचानक वही आवाज़—
“मारे से दोस्ती करोगी..??

इस बार आराध्या रुकी, आँखों में डर नहीं, आग थी ,“यहाँ दोस्ती करने आए हो या पढ़ने? मेरे पीछे आए तो थप्पड़ पड़ेगी,
मैं यहाँ पढ़ने आई हूँ—समझे!”

राजबीर चुप रहा, बस देखता रहा।
और जब वह आगे बढ़ गई, तो धीमे से पूछा, “जी… थारो नाम तो बता दिया…”

कोई जवाब नहीं...

कुछ दिनों बाद आराध्या शादी में जबलपुर चली गई , उधर, राजबीर हर दिन उसे ढूँढता ,उसे लगने लगा कि वो कोचिंग सेंटर छोड़ कर तो नहीं चली गई , फिर उसने 
दो दिन बाद सच पता चला कि,वो शादी में गयी है .. दोस्तों ने मज़ाक उड़ाया ," भाई लड्डू देने वो जरूर आएगी ...

और उसी बीच, जिन लड़कों से वह हमेशा भिड़ता था ,उनसे झगड़ा हो गया,
शिकायत पहुँची, फैसला हुआ—कोचिंग छोड़नी पड़ेगी।

राजबीर का आख़िरी दिन था और वो एक बार फिर...वही रास्ता ,और सामने—आराध्या...

राजबीर ने शांत स्वर में कहा—“मारे को घर जाणो सै , था अच्छी छोरी सै ,
यहाँ बहुत से लड़के खराब है आदत अच्छे नहीं हैं , तुम किसी की बातों में मत आना,
अगर कोई तुम्हें परेशान करे या कभी ज़रूरत पड़े… ये मेरा नंबर एबीसी******* ,और मेरा इंस्टा आईडी है —‘मां करणी के भक्त’।
मेरे दोस्त यहाँ हैं तुम्हारी… मदद कर देंगे।”

आराध्या पहली बार रुकी।
पूछ बैठी— “तुम भी तो मेरे पीछे आते थे… क्यों?”
राजबीर मुस्कुराया, थोड़ा झुका—
“हाँ, पसंद करता हूँ, पर जबरदस्ती करणा मन्ने आता नहीं , बहुत अच्छी हो ,
जिन लड़कों से मेरी लड़ाई हुई—वो थारे पीछण पड़ने वाले थे इसलिए थारे पीछे मारो को आणो पड़ो, उसके लिए सॉरी सै ,वो छोरे छोरियों को बहकाते हैं , ग़लत काम करते हैं और छोड़ देते हैं ,तुम बहुत अच्छी हो..बाय" और वो उस दिन चला गया।

उस दिन से आराध्या के दिल में
डर की जगह सम्मान ने जगह ले ली,
गुस्से की जगह नर्मी ,वक़्त बीता,
पढ़ाई पूरी हुई ,इस बार किस्मत ने साथ दिया।
NEET—ऑल इंडिया रैंक अच्छी आई और उसे चुना गया—AIIMS, जोधपुर..

जोधपुर की हवा में कुछ अलग था,
रेत की खुशबू, नीले घर, और हर शाम सूरज का किले के पीछे ढल जाना—जैसे हर दिन किसी कहानी की शुरुआत करता हो।
AIIMS जोधपुर का कैंपस अपनी ही दुनिया था, सफेद कोट, किताबों का बोझ, नींद से भारी आँखें—और फिर भी आँखों में सपने।
आराध्या त्रिपाठी अब वही लड़की नहीं थी जो कभी कोटा में डरकर ब्यूटी पार्लर में छिप गई थी ,NEET की टॉपर, आत्मविश्वास से भरी, पर दिल अब भी उतना ही सादा ,उस दिन ड्रामा सेंटर के बाहर स्टूडेंट्स का हुजूम था..

किसी नाटक की रिहर्सल चल रही थी,
आराध्या अपनी दोस्त के साथ वहाँ से गुजर रही थी तभी— “आराध्या?”
वो ठिठक गई, आवाज़ जानी-पहचानी थी, पर यक़ीन नहीं हुआ ,
पीछे मुड़ी तो सामने खड़ा था— राजबीर।
वही लंबा कद, वही सीधी नज़र, वही सादगी ,बस अब चेहरे पर एक ठहराव था—जैसे ज़िंदगी ने कुछ सिखा दिया हो।

“तुम… यहाँ?”आराध्या के मुँह से बस इतना ही निकला।

राजबीर हल्का-सा मुस्कुराया,
“हां… मारो भी सिलेक्शन यहाँ हुआ सै,
मन्ने सुना और देखा जारी फोटो ,तन्ने भी यहीं हो… उसकी आवाज़ में गर्व था,
लेकिन अधिकार नहीं।

दोनों कुछ पल चुप रहे,
बीच में सिर्फ हवा थी—और पुरानी यादें।
आराध्या ने खुद ही चुप्पी तोड़ी—
“कैसे हो? गाँव… घर सब ठीक?”

“सब ठीक, और था कैसे हो ..??अब तो डॉक्टर बणणे वाली हो,
पहली बार बातचीत में न डर था, न शिकवा,
बस दो लोग, जो वक़्त के बाद फिर मिले थे,
उस दिन के बाद मुलाक़ातें बढ़ने लगीं—
कभी कैंटीन में, कभी लाइब्रेरी के बाहर,
तो कभी हॉस्टल के गेट पर।
राजबीर कभी ज़्यादा देर नहीं रुकता,
न सवालों की बौछार,न नज़दीक आने की ज़िद , वो बस होता था—ज़रूरत जितना।

एक शाम, आराध्या थकी हुई सी कैंपस के गार्डन में बैठी थी, पहला सेमेस्टर, लगातार प्रैक्टिकल्स—दिमाग भारी था,
राजबीर पास आया, हाथ में चाय का कप।
बिना पूछे, पास रख दिया।
“तन्ने कोटा में भी चाय पसंद थी।”

आराध्या मुस्कुरा दी,“तुम्हें अब भी याद है?”

“कुछ बातें याद रह जाती हैं,उसने आँखें चुरा लीं ,उस दिन बहुत देर तक बातें हुईं,
कोटा, बनाड़, जबलपुर,
डॉक्टर बनने का डर,और ज़िंदगी की अनिश्चितताएँ, आराध्या ने पहली बार महसूस किया—
राजबीर उसे सुनता है,
ठीक वैसे ही जैसे वो है।
एक दिन आराध्या ने हिम्मत की।
पूछ ही लिया—
“तुमने फिर कभी किसी से दोस्ती… या प्यार?”
राजबीर कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—“नहीं..मुझे आधी-अधूरी चीज़ें पसंद नहीं , और तुम…तुम हमेशा मेरे लिए एक इज़्ज़त रही हो।”

ये शब्द किसी प्रपोज़ल से ज़्यादा गहरे थे,
दोस्ती अब एक नाम बन चुकी थी—
सुकून, ना रोज़ मिलना ज़रूरी,
ना रोज़ बात करना,बस भरोसा था,
AIIMS के उस विशाल कैंपस में,
जहाँ रिश्ते अक्सर जल्दी बनते और टूटते हैं,
वहाँ आराध्या और राजबीर की दोस्ती
धीरे-धीरे मज़बूत होती जा रही थी,
कभी-कभी आराध्या सोचती—
“शायद यही सही शुरुआत है…बिना दबाव,
बिना उम्मीदों के बोझ के।”

और राजबीर…वो बस दूर से देखकर यही सोचता—“अगर वक़्त ने चाहा, तो एक दिन
दोस्ती का नाम बदल जाएगा।

जोधपुर की रातें गवाह थीं ,कि कुछ रिश्ते
शोर से नहीं, ख़ामोशी से पनपते हैं ,और यही आराध्या और राजबीर की
नई शुरुआत थी।

समाप्त 

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