Berang Ishq Gahra Pyaar - 1 in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | बेरंग इश्क गहरा प्यार - एपिसोड 1

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बेरंग इश्क गहरा प्यार - एपिसोड 1

एपिसोड 1: रिश्तों की नीलामी
शहर की रफ़्तार शाम ढलते ही और तेज़ हो गई थी, लेकिन 'खन्ना मेंशन' के भीतर वक्त जैसे ठहर गया था। यह घर नहीं, संगमरमर से बना एक आलीशान ताबूत लगता था, जहाँ रोशनी तो बहुत थी पर गर्माहट की भारी कमी थी।
देब खन्ना अपनी स्टडी टेबल के पीछे बैठा था। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे उसकी बेतरतीब नींद की गवाही दे रहे थे। उसके सामने एक फ़ाइल खुली थी, जिसके पन्ने सफेद थे, लेकिन उन पर लिखी शर्तें काली और कड़वी थीं। देब ने अपनी महंगी घड़ी की ओर देखा—शाम के ठीक सात बजे थे। ठीक उसी वक्त दरवाजे पर एक हल्की सी दस्तक हुई।
"अंदर आ जाओ," देब की आवाज में कोई भाव नहीं था। वह सपाट और ठंडी थी, जैसे सर्दियों की कोई सुबह।
दरवाजा खुला और पाखी मिश्रा अंदर आई। सादी सूती साड़ी, माथे पर एक छोटी सी बिंदी और आँखों में आत्मसम्मान की एक ऐसी चमक जो गरीबी की धूल में भी धुंधली नहीं पड़ी थी। उसके हाथ थोड़े कांप रहे थे, लेकिन उसने अपनी नजरें नहीं झुकाईं।
देब ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। वह वैसी ही थी जैसा उसने सुना था—शांत और सरल। देब ने मेज पर रखा पेन उसकी तरफ खिसकाया।
"शर्तें याद हैं न पाखी? या एक बार फिर दोहरा दूँ?" देब ने कुर्सी पर पीछे झुकते हुए पूछा।
पाखी ने मेज पर रखे उन कागजों को देखा। उसकी सांसें भारी हो रही थीं। उसने धीमी आवाज में कहा, "मुझे याद हैं। एक साल की शादी। हम दुनिया के सामने पति-पत्नी होंगे, लेकिन इस कमरे की चारदीवारी के भीतर हम दो अजनबी होंगे। मैं आपके निजी जीवन में दखल नहीं दूँगी, और एक साल बाद... हम हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे।"
देब ने सिर हिलाया। "और इस एक साल के बदले, तुम्हारे पिता के हार्ट ट्रांसप्लांट का पूरा खर्च, हॉस्पिटल के बिल और तुम्हारी माँ की जिम्मेदारी मेरी होगी। यह कोई रिश्ता नहीं है पाखी, यह एक 'डील' है। भावनाओं की यहाँ कोई जगह नहीं है। मैं एक टूटा हुआ इंसान हूँ और मुझे जोड़ने की कोशिश मत करना।"
पाखी का दिल भीतर तक छलनी हो गया। वह जानती थी कि वह अपनी आत्मा का सौदा कर रही है, लेकिन अस्पताल के बेड पर पड़े अपने पिता की सफेद पड़ती शक्ल उसे याद आई। उसने कांपते हाथों से पेन उठाया।
"मैं यहाँ आपको बदलने नहीं आई हूँ मिस्टर खन्ना। मैं बस अपना फर्ज निभाने आई हूँ," पाखी ने दस्तखत करते हुए कहा। उसके हाथ से पेन छूटा तो उसकी आवाज में एक अजीब सी खनक थी। "लेकिन याद रखिएगा, कागज पर किए गए दस्तखत इंसान को बांध सकते हैं, उसकी तकदीर को नहीं।"
देब की आँखों में एक पल के लिए हलचल हुई, जैसे किसी ने ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंक दिया हो। पर उसने तुरंत खुद को संभाल लिया। "कल सुबह छोटी सी पूजा है। घर वालों को यही पता चलना चाहिए कि यह प्रेम विवाह है। अपनी सादगी को थोड़ा छिपा लेना, खन्ना खानदान की बहू ऐसी नहीं दिखती।"
पाखी बिना कुछ कहे मुड़ गई। जब वह कमरे से बाहर निकली, तो कॉरिडोर की ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया। उसने दीवार का सहारा लिया और गहरी सांस ली। क्या उसने सही किया? क्या एक साल तक वह उस शख्स के साथ रह पाएगी जो भावनाओं को कमजोरी समझता था?
रात के सन्नाटे में, देब अपनी बालकनी में खड़ा सिगरेट सुलगा रहा था। उसने सालों पहले खुद से वादा किया था कि वह कभी किसी को अपने करीब नहीं आने देगा। प्यार ने उसे सिर्फ जख्म दिए थे। उसकी खामोशी ही उसका कवच थी। उसने धुएं के साथ उन यादों को उड़ाने की कोशिश की जो उसे आज भी सोने नहीं देती थीं।
उधर, पाखी ने अपने पुराने घर के छोटे से मंदिर के सामने दीया जलाया। उसकी आँखों से एक आंसू टपक कर उसकी हथेली पर गिरा। उसने भगवान से बस इतनी ताकत माँगी कि वह इस समझौते के बोझ तले अपनी पहचान न खो दे। वह संवेदनशील थी, कोमल थी, पर कमजोर नहीं।
अगली सुबह, पाखी जब दुल्हन के लिबास में खन्ना मेंशन की सीढ़ियां चढ़ रही थी, तो उसे लगा जैसे वह किसी युद्ध क्षेत्र में जा रही है। देब वहां खड़ा था, शेरवानी में वह किसी राजा की तरह लग रहा था, लेकिन उसकी आँखें पत्थर की थीं।
जब देब ने पाखी की मांग में सिंदूर भरा, तो पाखी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। वह सिंदूर प्यार का नहीं, समझौते का रंग था। देब के हाथ पाखी की पेशानी (माथे) से छुए, तो एक बिजली सी दौड़ गई। देब ने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया, जैसे वह जल गया हो।
"स्वागत है, मिसेज पाखी देब खन्ना," देब ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया। उसकी आवाज में जीत का अहसास कम और हार का दर्द ज्यादा था।
पाखी ने उसकी आँखों में देखा। वहां नफरत नहीं थी, बस एक खालीपन था। उसने मन ही मन सोचा—'मिस्टर खन्ना, आप कहते हैं कि आप टूटे हुए हैं, लेकिन टूटे हुए लोग ही सबसे ज्यादा शोर करते हैं। आपकी ये खामोशी बहुत कुछ कह रही है।'
घर के बड़े-बुजुर्ग आशीर्वाद दे रहे थे, खुशियाँ मनाई जा रही थीं, लेकिन उन दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी थी। वह दीवार जो 'कॉण्ट्रैक्ट' के शब्दों से बनी थी।
रात को जब पाखी पहली बार उस बड़े से कमरे में दाखिल हुई, जो अब उसका भी था, तो उसने देखा कि देब पहले से ही सोफे पर सो जाने की तैयारी कर रहा था।
"आप बेड पर सो सकते हैं, मैं सोफे पर..." पाखी ने हिचकिचाते हुए कहा।
देब ने बिना मुड़े जवाब दिया, "आदत डाल लो पाखी। इस घर में हम साथ होकर भी साथ नहीं होंगे। तुम्हारी दुनिया अलग है, मेरी अलग।"
उसने लाइट बंद कर दी। कमरे में अंधेरा छा गया, बस खिड़की से आती चाँदनी पाखी के चेहरे पर पड़ रही थी। उसने अपनी भारी ज्वेलरी उतारी और खिड़की के पास खड़ी हो गई। आज से उसकी जिंदगी का एक नया अध्याय शुरू हुआ था, जहाँ रोमांस की जगह समझौता था और बातों की जगह खामोशी।
लेकिन पाखी को नहीं पता था कि कभी-कभी सबसे खूबसूरत कहानियाँ वहीं से शुरू होती हैं जहाँ शब्द खत्म हो जाते हैं। स्लो-बर्न रोमांस की आंच धीमी जरूर होती है, लेकिन वह पत्थर को भी पिघलाने की ताकत रखती है।
हुक:
देब को लगा था कि उसने सिर्फ एक पत्नी खरीदी है, लेकिन वह यह नहीं जानता था कि पाखी अपने साथ वह रोशनी लाई है जो उसके अंधेरे अतीत के हर कोने को रोशन करने वाली थी। क्या एक साल का यह समझौता उम्र भर के साथ में बदल पाएगा?