खामोश स्टेशन की वो आखिरी शामभाग 1: पुरानी यादेंशहर की चकाचौंध वाली जिंदगी से दूर, नर्णौल के किनारे बसा वो पुराना रेलवे स्टेशन आज भी वैसा ही था—जंग लगे प्लेटफॉर्म, टूटे-फूटे बेंच और हवा में घुली हुई पुरानी ट्रेनों की खुशबू। बेंच नंबर 4 पर नील बैठा था, जैसे हर शाम बैठता था। उसके हाथ में एक फटी हुई डायरी थी, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे, और आँखें स्टेशन के उस छोर पर टिकी हुईं, जहाँ से ट्रेनें आती थीं। लोग उसे देखते, कुछ मुस्कुराते, कुछ सहानुभूति से सिर हिलाते, लेकिन कोई नहीं रुकता। कौन जानता था कि नील अकेला नहीं था? उसके साथ बैठी थीं आरोही की यादें—वो हँसी, वो बातें, वो अधूरा वादा।पाँच साल पहले की वो बारिश भरी शाम आज भी नील की आँखों में ताजा थी। नील तब एक साधारण सा क्लर्क था, शहर के एक छोटे से ऑफिस में काम करता। शाम को थकान उतारने के लिए वो इसी स्टेशन पर आ जाता। उस दिन आकाश फट पड़ा था। नील ने अपना छाता खोला ही था कि एक लड़की भागती हुई उसके पास आ गई। "भैया, थोड़ा साया दे दो ना!" उसकी आवाज में बारिश की तरह चहक थी। नील ने छाता आगे किया, और दोनों एक ही छाते के नीचे सिमट गए। वो लड़की आरोही थी—लंबे काले बाल, आँखों में चमक और हाथ में एक स्केचबुक।"बारिश तो मुझे पसंद है," आरोही ने कहा, जबकि पानी उनके जूतों को भिगो रहा था। "ये धुलन लाती है, नई शुरुआत की। तुम्हें?" नील ने हिचकिचाते हुए कहा, "मुझे? बस गीला होना पसंद नहीं।" आरोही हँसी, वो हँसी जो स्टेशन के सन्नाटे को चीर गई। "अरे, गीला होना ही तो जिंदगी है! सूखे लोग बोरिंग होते हैं।" बस, यहीं से बातें शुरू हुईं। आरोही एक पेंटर थी, दिल्ली से आई थी एक प्रदर्शनी के लिए। नील ने कभी सोचा नहीं था कि एक अजनबी से बात करना इतना आसान हो सकता है। बारिश रुकी, लेकिन वो नहीं रुके। आरोही ने अपना नंबर दिया, "कल फिर मिलें, बेंच नंबर 4 पर।"अगले दिन से उनकी मुलाकातें शुरू हो गईं। आरोही स्टेशन को अपना कैनवास मानती। वो स्केचबुक निकालती और प्लेटफॉर्म के दृश्य उकेरती। नील चुपचाप देखता। "तुम्हारी आँखों में उदासी है, नील," एक दिन आरोही ने कहा। "क्या बात है?" नील ने हँसकर टाल दिया, "बस, जिंदगी।" लेकिन आरोही ने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे नील ने खुलना शुरू किया। उसके माता-पिता की जल्दी मौत, अकेलापन, सपनों की कमी—सब कुछ आरोही को बताया। आरोही सुनती और कहती, "नील, जिंदगी सफेद कैनवास है। मैं इसमें रंग भरूँगी।"भाग 2: अधूरा वादादिन बीतते गए, मुलाकातें घना हो गईं। दोस्ती प्यार में बदल गई, बिना किसी शब्द के। आरोही की हँसी नील के सन्नाटे को तोड़ती। वो साथ घूमते—स्टेशन के पास की नदी किनारे, पुराने मंदिर में। आरोही पेंटिंग बनाती, नील देखता। एक शाम, नदी किनारे बैठे हुए आरोही ने कहा, "नील, मैं तुम्हारी जिंदगी में इतने रंग भर दूँगी कि तुम्हें सफेद से नफरत हो जाएगी।" नील ने उसका हाथ थामा, "तुम हो तो रंग खुद आ जाते हैं।"लेकिन किस्मत का खेल अजीब होता है। आरोही को दिल्ली एक बड़ी आर्ट गैलरी में काम मिला। "बस कुछ महीने, नील," उसने कहा। "फिर लौट आऊँगी।" नील उदास था, लेकिन खुश भी। आरोही की सफलता में उसकी खुशी थी। वो शाम जब आरोही स्टेशन पर विदा लेने आई, आसमान गहरा लाल था। सूरज डूब रहा था, जैसे उनका प्यार भी। "वादा करो, इसी बेंच पर मिलोगे," आरोही ने कहा। नील ने हाथ थामा, "वादा। हर शाम इंतजार करूँगा।"ट्रेन आई, आरोही चढ़ी। नील ने हाथ हिलाया। ट्रेन खिसकने लगी। तभी... एक तेज चीख। ट्रेन के पहियों के नीचे कुछ फंस गया। लोग चिल्लाए। नील भागा। आरोही का बैग प्लेटफॉर्म पर पड़ा था। ट्रेन रुकी। हादसा हो चुका था। आरोही ट्रेन के नीचे आ गई थी। वो बच न सकी। डॉक्टरों ने कहा, "इंस्टेंट डेथ।" नील का दुनिया भर का सफेद रंग काला हो गया। आरोही के रंग धुंधला हो गए। उसके स्केचबुक के आखिरी पेज पर नील का चित्र था—उस बेंच पर बैठा, मुस्कुराता हुआ।नील टूट गया। वो नौकरी छोड़ दी। स्टेशन पर रहने लगा। डायरी में आरोही की बातें लिखता। हर ट्रेन में उसकी परछाई ढूँढता। शहर वालों ने उसे पागल कहा, लेकिन नील को फर्क नहीं पड़ता। प्यार शब्दों में नहीं, एहसास में था।भाग 3: इंतज़ार का अंत?पाँच साल बीत गए। नील अब और बूढ़ा लगता। बाल सफेद, आँखें धँसी हुईं। लेकिन बेंच नंबर 4 पर हर शाम। एक शाम, बारिश शुरू हुई। नील ने छाता नहीं खोला। डायरी खोली। अचानक एक लड़की आई, छाता लिए। "अंकल जी, साया?" नील ने देखा—वो आरोही जैसी लगी। लेकिन नहीं, वो नेहा थी, एक कॉलेज स्टूडेंट। "तुम्हें बारिश पसंद है?" नील ने पूछा। नेहा हँसी, "बहुत। ये नई शुरुआत लाती है।"नेहा ने देखा डायरी। "ये क्या है?" नील ने सुनाया—आरोही की कहानी। नेहा भावुक हो गई। "अंकल, आरोही जैसी औरतें अमर होती हैं। तुम्हारा इंतजार प्यार है। लेकिन जिंदगी रुकती नहीं।" नील मुस्कुराया। पहली बार। नेहा ने कहा, "मैं रोज आऊँगी। तुम्हारी कहानी सुनाने।"नील की डायरी का आखिरी पन्ना अब खाली नहीं। उस पर लिखा— "प्यार कभी खत्म नहीं होता, बस रूप बदल लेता है।" वो शाम खामोश स्टेशन की आखिरी शाम नहीं थी। नई शुरुआत थी।
"प्यार का मुकम्मल होना ज़रूरी नहीं, उसका एहसास ही काफी है। अगर आपको नील और आरोही की यह छोटी सी झलक पसंद आई हो, तो कहानी के अगले हिस्से के लिए मुझे ज़रूर फॉलो करें!"