UJJAIN EXPRESS - 3 in Hindi Moral Stories by Lakhan Nagar books and stories PDF | उज्जैन एक्सप्रेस - 3

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उज्जैन एक्सप्रेस - 3

"कभी-कभी इंसान अपनी मौत नहीं चाहता... वो सिर्फ अपने बोझ से आज़ादी चाहता है।"

 

रात का वक्त था। उज्जैन जंक्शन का प्लेटफॉर्म लगभग खाली था। सिर्फ एक बेंच पर अमृत  बैठा था, अकेला। उसकी आँखों में वो थकान थी जो सिर्फ हार से नहीं, लगातार हारने की आदत से आती है। उसके पास एक पुराना बैग था — जिसमें न कपड़े थे, न कोई सपना, सिर्फ कुछ कागज़ थे — बैंक नोटिस, कोर्ट समन, और उधार की पर्चियाँ।

 

कभी इन्हीं पन्नों से वह अपने भविष्य का खाका बना रहा था, आज वही पन्ने उसके लिए मौत की पुकार बन चुके थे।

अमृत  के पिता एक छोटे किसान थे। हर साल मौसम की बेरुखी, सरकारी कागज़ों की पेचीदगी, और बाजार की गिरती कीमतों ने उनकी कमर तोड़ दी थी। “चार एकड़ ज़मीन थी, लेकिन कर्ज़ बीज से ज़्यादा उगता रहा...” ये बात अमृत  अक्सर अपने दोस्तों से मज़ाक में कहता था, पर अब यही उसकी हकीकत बन चुकी थी।

 

जब वो 12वीं में था, तभी गाँव के दो किसान कर्ज़ ना चुका पाने की वजह से जहर खा चुके थे। उनके पिता चुप रहते थे, पर उनकी चुप्पी अमृत  के भीतर एक आग जला गई थी — वह ठान चुका था कि कुछ अलग करेगा, कुछ ऐसा जिससे ये चक्र टूटे।

 

उसने बहुत संघर्ष से इंजीनियरिंग की थी — कॉलेज की फीस, हॉस्टल का खर्चा, सब कुछ स्कॉलरशिप और ट्यूशन पढ़ाकर निकाला था। एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिली, अच्छे पैकेज पर। मुंबई की चकाचौंध भरी जिंदगी में वो आसानी से रम सकता था — लेकिन गाँव, ज़मीन और किसान उसकी रगों में बसा था।

 

 

 

GREENKOKO उसका सपना था — एक एग्रो-बेस्ड स्टार्टअप जो नारियल से बने ऑर्गेनिक उत्पाद जैसे नारियल पानी, तेल, स्किनकेयर और बालों के प्रोडक्ट बनाकर शहरी मार्केट में उतारे।
"जो हम गाँवों में उगाते हैं, वही शहरों में सोने के दामों में बिकता है। फर्क सिर्फ पैकिंग और मार्केटिंग का है," अमृत अक्सर दोस्तों से कहता।

 

उसने करीब ₹15 लाख का लोन लिया — कुछ बैंक से, कुछ रिश्तेदारों से। गाँव के पास ही एक छोटा सा प्लांट शुरू किया, जहाँ वो दक्षिण भारत से कच्चे नारियल मंगवाकर उत्पाद बनाता था। सोशल मीडिया पर उसका ब्रांड धीरे-धीरे पकड़ बना रहा था। इंस्टाग्राम पर "DESI YET PREMIUM”छवि ने युवाओं को आकर्षित किया। 3-4 छोटे स्टोर्स में उसके प्रोडक्ट रखवाए गए।

शुरुआत अच्छी रही।

अमृत की माँ ने जब पहली बार उसका पैक्ड नारियल पानी देखा, तो मुस्कुराकर बोली —
"बेटा, तेरे बाबा भी कभी यही पानी बैल की पीठ पर भरकर हाट में ले जाते थे। पर तूने इसे बोतल में भरकर दुनिया को बेच दिया।"

अमृत के चेहरे पर संतोष था।
"अब किसान सिर्फ उगाएगा नहीं, कमाएगा भी, माँ।"

 

लेकिन हर हरियाली के पीछे कुछ सूखे भी छिपे होते हैं।

 

2020 आया — और उसके साथ आई महामारी। लॉकडाउन लगा।
सप्लाई चेन टूट गई। कच्चा माल रुक गया। ऑर्डर कैंसल हुए, दुकानदारों ने भुगतान रोक दिए।
पैसे फंस गए — लेकिन बैंक की EMI नहीं। हर महीने ₹28,000 बैंक को जाना था। उसके कर्मचारी — जो गाँव के ही युवा थे — उनकी सैलरी, किराया, और बिजली-पानी का बिल… सब चलता रहा।

अमृत  खुद घर में उधार की सब्जी लाता, पर स्टाफ को समय पर भुगतान करता।

"बिज़नेस में डूबना मंज़ूर है, पर किसी का भरोसा नहीं तोड़ूंगा," वो कहता।

लेकिन धीरे-धीरे वो लड़खड़ाने लगा। जिन निवेशकों ने कुछ पैसा लगाया था, उन्होंने वापसी माँगी। कुछ दोस्त जो शुरू में साथ थे, खिसक गए।

एक दिन माँ ने देखा — अमृत  रात को देर तक छत पर बैठा था।
"क्या हुआ बेटा?"
"कुछ नहीं माँ, बस… कुछ सोच रहा हूँ।"

पर उसकी आँखों में उम्मीद कम, भारीपन ज़्यादा था।

वो दिनचर्या बदल गई थी। दिन में वो कागजों के ढेर में डूबा रहता — निवेश ढूँढना, कर्ज़ से निकलने के रास्ते, बिज़नेस बेचने की संभावनाएँ। रात को वो अक्सर अपनी डायरी में कुछ लिखता — जो कोई और नहीं पढ़ता।

 

अब वो अकेला हो गया था।पिता कहते — "मुंबई वाला काम सही था, वहीं रहना चाहिए था।"
रिश्तेदार ताने मारते — "बड़ा बिज़नेस मैन बनने चला था!"

वो दिनभर सबको समझाता, पर खुद को नहीं।

कभी-कभी वह पुरानी फोटोज़ देखता — जब पहली बार उसने GREENKOKO की बॉटल लॉन्च की थी।उसके चेहरे पर वो आत्मविश्वास अब कहीं नहीं था।

आखिरकार थक हार कर वो इन सबसे दूर कही आकर उज्जैन जंक्शन पर बैठा था और अपनी डायरी में लिखे शब्दों को दोहराते हुए उज्जैन एक्सप्रेस का इन्तजार कर रहा था –

मैंने सपना देखा, उसे जिया… पर ज़मीन पर लाकर उसे बचा न सका।"
"मैं फेल नहीं हुआ, बस अकेला हो गया था।"
"माफ करना माँ-पापा… मैंने हार नहीं मानी, बस रास्ते खत्म हो गए थे।"
"GREENKOKO अब तुम्हारा है — अगर कोई चाहे, तो इसे जिंदा कर देना… कभी।"

 

उज्जैन एक्सप्रेस आने में सिर्फ कुछ मिनट बचे थे। वह उठा और ट्रैक की ओर बढ़ा ही था कि तभी किसी की आवाज़ आई — “बिना चाय पिए इतना बड़ा फैसला लोगे?”

 

अमृत  चौंका। पीछे मुड़कर देखा, एक लड़की खड़ी थी — सफेद कुर्ता, हाथ में मिट्टी का कुल्हड़, चेहरे पर अजीब-सी मासूम शांति।

 

“तुम कौन  ...?” उसने पूछा।

 

लड़की मुस्कराई बोली , मैं मीना। ज्यादा कुछ नही  बस मेरा काम  इतना हैं  कि जब किसी की आँखें चाय से ज़्यादा उबलती दिखें, तो मैं उन्हें एक कप देती हूँ — और थोड़ी बातें।”

 

मीना उसके पास आकर बैठ गई। उसकी आवाज़ में कोई उपदेश नहीं था, बस एक अपनापन था। “किसी स्टार्टअप के फेल होने से इंसान फेल नहीं हो जाता।”

 

अमृत  ने धीरे से कहा,  "मैं एक बीज हूँ — जिसने खुद को गाड़ तो दिया, पर बारिश अब भी नहीं आई..."

 

मीना ने उसकी तरफ देखा, फिर बोली,- पता हैं खेत में पड़ा हुआ हर बीज ख़राब नहीं होता शायद वो सही मौसम का इन्तजार कर रहा हो । और पूछा -“क्या तुमने ओयो के रितेश अग्रवाल की कहानी सुनी है? एक समय था जब उसकी कंपनी बंद होने की कगार पर थी। किसी को यकीन नहीं था। लेकिन उसने फिर खड़ा किया — और आज वो अरबों का बिजनेस है। या फिर Airbnb — दो दोस्तों ने शुरुआत की थी अपने कमरे किराए पर देकर। कोई ग्राहक नहीं था महीनों तक। लेकिन आज... दुनिया भर में उनके नाम है।”

“उनके पास पैसे थे। मेरे पास तो कुछ भी नहीं बचा,” अमृत  ने धीमे से कहा।

“नहीं अमृत , उनके पास बस एक चीज़ थी — एक दिन और जीने का हौसला। वो एक दिन ही उन्हें वहाँ ले गया जहाँ आज वे हैं।”

मीना ने उसकी आँखों में झाँका और कहा, “तुम्हारे पापा किसान हैं ना? क्या उन्होंने बारिश ना आने पर खेती बंद कर दी? नहीं ना? तो तुम कर्ज़ से क्यों हार मान रहे हो?”

अमृत  के होंठ काँपे, “क्योंकि अब हिम्मत नहीं बची...”

मीना मुस्कराई, “हिम्मत बची नहीं होती, बनानी पड़ती है — हर उस दिन जब लगता है कि अब नहीं होगा। और हाँ, अगर तुम चले गए... तो तुम्हारा सपना नहीं मरेगा... तुम्हारे जैसे लाखों और सपने डर जाएंगे।”

उसी वक्त ट्रेन की सीटी सुनाई दी। मीना ने कुल्हड़ उसकी ओर बढ़ाया। “लो। चाय थोड़ी मीठी है। पर आज की रात भी मीठी हो सकती है। अगर तुम चाहो तो।”

अमृत  की आँखें भर आईं। उसने चुपचाप चाय ली, और पहली बार पटरी की ओर नहीं — आसमान की ओर देखा। ट्रेन प्लेटफॉर्म से गुजर गई। मीना कहीं नज़र नहीं आई। पर अमृत वहीं था — ज़िंदा, और पहली बार... थोड़ा हल्का।