रोहित ने कहा,"मैं समझ गया गुरुदेव! लेकिन जब मैंने स्वयं को आपके सुपुर्द कर दिया है तो फिर मैं अक्षरश: आपकी आज्ञाओं का पालन क्यों न करूं?"
"इसलिए रोहित,कि मैं तुम्हें आत्मनिर्भर देखना चाहता हूं। मैं यह नहीं चाहता कि जीवन में कोई कार्य करने के पहले तुम निर्देश के लिए मेरी ओर देखो,बल्कि मैं यह चाहता हूं कि तुम आत्मनिर्णय लेने में सक्षम बन जाओ और अपने दायित्वों का निर्वहन आत्मविश्वासपूर्वक करो। समाज को ऐसे ही लोगों की जरूरत है।मुझे केवल एक या दो योग्य शिष्य ही चाहिए,शिष्यों का वह भीड़ तंत्र नहीं चाहिए,जो केवल चमत्कारिक उपलब्धियों के लिए गुरु की शरण में जाता है।"स्वामी मुक्तानंद ने उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा।
"जी गुरुदेव!"ऐसा कहने के बाद रोहित ने गुरु के निर्देश पर अपनी आंखें बंद कीं और कुछ देर ध्यान में डूब गए।लेकिन यह क्या? रोहित अपना चित्त बिल्कुल भी स्थिर नहीं कर पा रहे हैं। मुक्तानंद जी ने आज साधना प्रक्रिया यहीं पर स्थगित कर दी।
रोहित प्रतिदिन प्रात 4:00 बजे गुरुदेव के कक्ष में पहुंचते हैं,लेकिन वे ध्यान में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। ध्यान करना तो दूर,रोहित दो मिनटों के लिए भी आसान में स्थिर नहीं बैठ पा रहे हैं और स्वामी मुक्तानंद उनकी सहायता का प्रयत्न कर रहे हैं।जब रोहित 5 मिनट भी आंखें बंद कर नहीं बैठ पाए और बेचैनी में जब उन्होंने अपनी आंखें खोल दीं तो स्वामी जी ने कहा,"अभी तुम्हें अपने दिनचर्या को और व्यवस्थित बनाने की जरूरत है रोहित!तुम अभी भी सांसारिक मोह - माया और रिश्ते- नातों से ऊपर नहीं उठ पाए हो। तुम पहले अष्टांग योग के प्रारंभिक दो चरणों;यम एवं नियम का पालन करो।"
"जो आज्ञा गुरुदेव, पर योग में इतनी कठिन दिनचर्या की आवश्यकता क्यों होती है?
आचार्य मुक्तानंद ने रोहित को समझाया जब बहिर्मुखी आचरण शुद्ध और पवित्र होगा,तब भीतर भी ऐसे ही शुद्ध और सात्विक भाव आएंगे।
"योग के आठ चरण यम, नियम ,आसन,प्राणायाम ,प्रत्याहार, धारणा,ध्यान और समाधि हैं। यम के अंतर्गत सत्य,अहिंसा,अस्तेय(किसी दूसरे की वस्तु में अधिकार भाव की चेष्टा का अभाव),अपरिग्रह(आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संचय और संग्रह न करना) और ब्रह्मचर्य इन व्रतों का पालन तो तुम्हारे संकल्प से ही हो जाएगा;बल्कि तुम अपने नैतिक विचारों में इस व्रत का पहले से ही पालन कर रहे हो;लेकिन नियम के अंतर्गत शौच(तन- मन की स्वच्छता),संतोष,तप,स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान आते हैं।इसके लिए व्यावहारिक जीवन में अभ्यास आवश्यक है,जहां शारीरिक क्रियाओं की भी आवश्यकता होती है।"
"जी गुरुदेव! मैं स्वयं भी ध्यान लगाने बैठता हूं तो जिन विचारों और चिंतन प्रक्रिया में उलझ जाता हूं,वे मुझे सताए नहीं, इसके लिए दैनिक जीवन में अभ्यास आवश्यक है, चाहे वह मेरे विचारों के शुद्धिकरण के रूप में हो या मेरे आचरण में और अधिक अनुशासन तथा नियमों के कड़ाई से पालन के रूप में हो।" रोहित ने उत्तर दिया।
स्वामी मुक्तानंद ने रोहित को निर्देश दिया कि अगले कुछ दिनों तक तुम यहां आकर मेरे मार्गदर्शन में अभ्यास या सामूहिक अभ्यास के बदले अपने कक्ष में ही ध्यान करना और कुछ दिनों के लिए विश्राम करना।तुम इस अवधि में इस आश्रम की व्यवस्था का सूक्ष्मता से अवलोकन करना और अगर तुम्हें लगे तो आश्रम की व्यवस्था में हाथ भी बंटाना।इस आश्रम के आसपास तुम्हें अनेक सुंदर प्राकृतिक दृश्य दिखाई देंगे।आश्रम के बाहर जाकर तुम इस हिमालय क्षेत्र की विशालता, दिव्यता और आध्यात्मिकता से जुड़ने का प्रयत्न करना। यह हिमालय साधना और दिव्यता का पर्याय है।इसके शीर्ष भाग में तिब्बत की ऊंची पहाड़ियों पर देवाधिदेव महादेव जी का कैलास पर्वत भी है।शिव तत्व को तुम हिमालय के कण- कण में कहीं से भी अनुभूत कर सकते हो।"
रोहित ने ध्यानपूर्वक स्वामी जी की बातें सुनीं और उनके चरण स्पर्श कर अपने कक्ष में लौट आया।शय्या पर लेटे-लेटे रोहित बाहर के दृश्य देखने लगा।कल रात्रि को इस क्षेत्र में हल्की बारिश हुई थी। आसपास चीड़, साल और सरू के कुछ वृक्ष हैं।अनेक जगहों पर बुरांश(रोडोडेंड्रो) के पेड़ हैं। अभी कड़ाके की सर्दियों का मौसम शुरू नहीं हुआ है इसलिए बुरांश के कुछ फूल पेड़ों पर हैं और उषा काल में उदित होते सूर्य की सुनहरी किरणें इन वनस्पतियों से मिल रही हैं तो एक अद्भुत स्वप्न लोक निर्मित हो रहा है। इस प्राकृतिक सुषमा को निहारते - निहारते थोड़ी देर के लिए रोहित की आंख लग गई।
अगले कुछ दिनों तक रोहित ने अपने कक्ष में ही ध्यान का प्रयत्न किया और स्वामी जी के निर्देशों के अनुसार यम और नियम को अपने विचारों तथा आचरण में पूरी तरह आत्मसात करने का प्रयत्न किया। रोहित अब लगभग शत प्रतिशत यह आश्वस्त हो गया था कि वह पुनः स्वामी जी के कक्ष में जाकर ध्यान- अभ्यास की स्थिति में आ जाएगा लेकिन फिर उसके जीवन में एक झंझावात आ गया। यह उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में बना हुआ एक प्राचीन मठ है।आज सुबह आश्रम के प्रवेश द्वार पर पर्वतारोहियों की वेशभूषा में एक युवती दिखाई दी।वह एक स्वस्थ और आकर्षक युवती थी।मुस्कुराता हुआ चेहरा और बोलती सी आंखों वाली उस युवती के रूप सौंदर्य को वह अपलक देखता रह गया।वह यशस्विनी का हूबहू प्रतिरूप थी। एक क्षण को तो उसने यही समझा कि यशस्विनी ही इस लोक में वापस आ गई है लेकिन जल्द ही उसे वास्तविकता की अनुभूति हुई।आश्रम में उसके आने से क्या रोहित के जीवन में एक और परीक्षा शुरू होने वाली है? एक लंबी चढ़ाई के बाद आश्रम पहुंचने की थकान उस युवती के चेहरे पर दिखाई दे रही थी। आश्रम के प्रवेश द्वार पर आश्रम के साधक रोहित अपने सहयोगियों को किसी आवश्यक कार्य के लिए निर्देश दे रहे थे…..
आगंतुक युवती ने पास आते हुए रोहित से पूछा,"नमस्कार साधक जी! क्या स्वामी मुक्तानंद जी से भेंट हो सकती है?"
रोहित उत्तर नहीं दे पाया…..
नेहा को देखकर रोहित को अपनी एक मित्र यशस्विनी का स्मरण हो आया।रोहित अवाक रह गया।
उसके मुंह से अचानक निकला. …….. यशस्विनी…… तुम ……तुम यहां कैसे?
...... यह प्रश्न सुनकर आगंतुक युवती भी चौंक उठी थी।इससे पहले कि वह रोहित से कहती, “साधक जी… मेरा नाम यशस्विनी नहीं है…..” स्वयं रोहित ने ही कह दिया, "क्षमा चाहता हूं देवी!मुझे पहचानने में थोड़ी गलती हो गई। आपको देखकर मुझे किसी अपने की याद आ गई थी।आप आश्रम के भीतर आइए। यहां आपकी भेंट स्वामी मुक्तानंद जी से अवश्य हो जाएगी।"
“कोई बात नहीं साधक जी! वैसे मेरा नाम नेहा है।” उस युवती ने बताया।
क्रमशः
योगेंद्र