मिलन की उत्कंठा: -
"विराट कर्तव्य और गृहस्थ धर्म दोनों एक साथ भी तो निभाए जा सकते हैं .. ।महेश बाबा की तरह।"
"हां लेकिन महेश बाबा ने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने और सक्षम होने के बाद ही अपना त्याग वाला गृहस्थ जीवन शुरू किया था।"
"यशस्विनी के जाने के बाद नेहा के साथ भी तो एक बार फिर वह अधूरी यात्रा प्रारंभ की जा सकती है….."
"वह यात्रा अगर केवल यशस्विनी की स्मृतियां से नेहा में उसका प्रतिरूप देखने के कारण है, तो तुम्हारी शुरुआत संकुचित ही रह जाएगी रोहित। तुम अपने कर्तव्य और नेहा के संभाव्य प्रेम के बीच में संतुलन नहीं साध पाओगे।"
"आप नारी से परहेज करना सिखा रहे हैं लेकिन नारी के बिना पुरुष अधूरा है और स्त्री तथा पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण तो जन्म जन्मांतर से है और सृष्टि के प्रारंभ से ऐसा चला आ रहा है।"
"मैं जीवन में स्त्री का निषेध करने के लिए नहीं कह रहा हूं लेकिन मुझे चिंता इस बात की है कि तुम्हारी साधना मानवता के कल्याण के बदले अपने प्रेम को दोबारा प्राप्त करने और यशस्विनी के जाने से जीवन में शुरू हुई रिक्तता को भरने तक ही सीमित ना रह जाए।"
अनेक तर्क- वितर्कों के बाद भी जब वह कोई निर्णय नहीं कर पाया तो उसने कहा,"अरे मैं विचारों के किन द्वंद्वों में उलझ गया। हो सकता है कल स्वामी जी और नेहा से भेंट के बाद मुझे कोई समाधान सूझ जाए। भगवान श्री राम इसमें मेरी सहायता करें।"
बहुत देर बाद रोहित को नींद आई। उसकी नींद भी देर से खुली और जब वह स्वामी मुक्तानंद के साधना कक्ष में पहुंचा तो स्वामी जी और नेहा उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसे थोड़ी ग्लानि हुई क्योंकि घड़ी की सुइयां आठ बजकर पांच मिनट दिखा रही थीं।
रोहित देरी के कारण सकुचाते हुए साधना कक्ष में पहुंचे थे।
"प्रणाम स्वामी जी,क्षमा चाहता हूं, मुझे देर हो गई।"रोहित ने चरण स्पर्श करते हुए कहा।
"कोई बात नहीं रोहित तुम समय से ही हो और नेहा भी अभी यहां पहुंची है। नेहा से तो तुम्हारा परिचय हो ही गया होगा।"
"जी स्वामी जी!"
"मैंने तुम दोनों को एक साथ इसलिए बुलाया है ताकि हम संपूर्ण मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न और उसके समाधान पर विचार कर सकें।"
"जी स्वामी जी!"नेहा और रोहित ने एक साथ कहा।
स्वामी मुक्तानंद ने नेहा से प्रश्न किया,"तुम्हारा अनुसंधान कहां तक पहुंचा है नेहा? समाज में नारियों के विरुद्ध बढ़ती अपराधों की घटनाओं को लेकर मन व्यथित है और इसका स्थाई समाधान निकालने की आवश्यकता है। क्या तुमने इस संबंध में और कुछ सोचा है?"
"जी,अपने अनुसंधान में मैं प्रगति पर हूं स्वामी जी! जब महिलाओं पर यौन हमला होता है तो आत्मरक्षा के लिए मिर्च स्प्रे पाउडर से लेकर पैनिक अलार्म तक अनेक सुविधाएं उपलब्ध है लेकिन अकस्मात होने वाले को रोकने में ये तभी कारगर होंगे जब उनके उपयोग करने का अवसर मिले,अन्यथा ये धरे के धरे रह जाएंगे।"
रोहित को नेहा के आश्रम में आने का उद्देश्य अब धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया।
"तुम तो देश की बड़ी वैज्ञानिक हो नेहा! हमारे रोहित अब बहुत जल्दी ही मनुष्य की अति इंद्रिय शक्तियों को जाग्रत करने की साधना शुरू करने वाले हैं। रोहित का काम एक दिशा में आगे बढ़ेगा और तुम वैज्ञानिक स्तर पर यह अनुसंधान करना कि क्या महिलाएं आत्मरक्षा के लिए ऐसी डिवाइसों से युक्त हो सकती हैं,जो न सिर्फ उन्हें भावी खतरे की समयपूर्व सूचना दे दे,बल्कि उस खतरे को दूर करने में भी सक्षम बना दे।"
"जो आज्ञा स्वामी जी!"नेहा ने श्रद्धापूर्वक कहा।
अब स्वामी जी ने रोहित से पूछा," ध्यान के क्षेत्र में क्या प्रगति हो रही है रोहित?"
"वही स्थिति है स्वामी जी!अभी भी मेरा मन विचलित हो रहा है।"
हंसते हुए स्वामी जी ने कहा,"अब तुम ध्यान करोगे तो अवश्य ध्यान लगेगा। 15 दिनों में तुम ध्यान की अतल गहराइयों में डूबने की क्षमता प्राप्त कर लोगे। 16 वें दिन से तुम यहीं आकर फिर अभ्यास शुरू करोगे।
रोहित का कार्यक्षेत्र कंप्यूटर का है लेकिन महेश बाबा के गुरुकुल में यशस्विनी के साथ कार्य करने के दौरान उसकी रुचि आध्यात्मिक और योग ध्यान के क्षेत्र में बढ़ गई थी। अब उनका लक्ष्य मनुष्य के भीतर अंतर्निहित उस प्रकाश को प्राप्त करने की ओर केंद्रित है,जिससे वे मानवता का कल्याण कर सकें और यशस्विनी के अधूरे कार्यों को पूरा कर सकें।
प्रातः समय रोहित अपने कक्ष में ही ध्यान में निमग्न हो जाता है। कई दिनों के बाद आज वह अधिक देर तक ध्यान में बैठ पाया। नेहा से उसकी भेंट दोपहर के भोजन और शाम को मंदिर में आरती के समय होती है।नेहा की उपस्थिति ने उसे नए सिरे से अपने कार्य को परिभाषित करने का अवसर दे दिया है।इधर नेहा जीव विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपने विशेष अनुसंधान में व्यस्त है। देश की बड़ी प्रयोगशालाओं में अपना अधिकांश अनुसंधान कार्य पूर्ण कर लेने के बाद नेहा यहां आई है।अब वह अपने अनुसंधान के समापन चरण में है।रोहित और नेहा का कक्ष भी आश्रम में अगल-बगल ही है और आवश्यकता होने पर वे एक दूसरे से संपर्क कर लेते हैं। दोनों के कार्य करने की विधियां भले अलग-अलग हैं, लेकिन अंतत:वे दोनों मानव कल्याण के लिए ही समर्पित होकर कार्य कर रहे हैं।बीच-बीच में वे फोन पर भी चर्चा कर लेते हैं।
जब रोहित कुछ दिनों के बाद यम और नियम के अंतर्गत नैतिक और व्यावहारिक आचरण के अभ्यस्त हो गए तो फिर स्वामी मुक्तानंद ने उन्हें फिर से अपने निज कक्ष में ध्यान की विशेष साधना के लिए बुला लिया। रोहित ने पालथी मोड़कर आसन पर बैठकर योग के अष्ट चरण की साधना के सोपानों को धीरे-धीरे तय करना शुरू किया। प्राणायाम की प्रक्रिया में पूरक, कुंभक, रेचक और बाह्य कुंभक के रूप में एक चक्र पूरा होता था।सांसों का भीतर जाना और फिर सांसों का बाहर आना इन सबमें समय के उचित अनुपात का अभ्यास होने लगा तो रोहित धीरे-धीरे ध्यान में अधिक समय तक बैठने लगे।अब वे शरीर के विभिन्न चक्रों का भी ध्यान करने लगे थे। दिन पर दिन बीतते गए और रोहित साधना में धीरे-धीरे और ऊंचे उठते गए। फिर आया प्रत्याहार का चरण और बहुर्मुखी इंद्रियां धीरे-धीरे अंतर्मुखी होने की अभ्यस्त होती गईं।धारणा के चरण में अब रोहित का ध्यान एक बिंदु पर केंद्रित होने लगा।
क्रमशः
योगेंद्र