रात इतनी गहरी थी कि चाँद की रौशनी भी शायद डर के छिप रही थी। बारिश की बूंदें पत्थरों पर जोर से गिर रही थीं, और हर तरफ सिर्फ अंधेरा था।यह कहानी है २२ साल के आरव की, जो कुछ ही समय पहले बैंगलोर में शिफ्ट हुआ था।शहर के बीचो-बीच एक पुरानी, खाली हवेली खड़ी थी। टूटे-फूटे दरवाजे, घिसी-पिटी दीवारें। लोगों का कहना था कि अक्सर रात में उस हवेली से अजीब-सी आवाजें आती हैं और हवेली के एक कोने से रौशनी दिखाई देती है।आरव ने सोचा, “जो लोग कहते हैं, शायद बस कहानियाँ हैं, पर जो भी है, मुझे खुद देखना होगा।”बिना कुछ सोचे-समझे आरव लैम्प लेकर हवेली की ओर निकल पड़ा। चारों तरफ अंधेरा और तेज बारिश थी। आरव हवेली के पास गया, उसकी धड़कनें तेज हो रही थीं। उसने हवेली के दरवाजे को जोर से धक्का मारा और दरवाजा खुल गया। जमीन पुरानी लकड़ियों और धूल से भरी हुई थी। आरव हवेली के अंदर गया। हर कदम पर एक अजीब-सी आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई उसे पुकार रहा हो।आरव आगे बढ़ा। अचानक एक कमरे का दरवाजा धीरे-धीरे खुला और दीवार पर एक पुरानी पेंटिंग लगी थी। आरव डर के मारे सहम गया, उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, लेकिन उसकी जिज्ञासा उसे रोक नहीं पाई। उसने पेंटिंग को देखने के लिए लैम्प ऊपर उठाया।तभी एक धीमी, कान को चुभने वाली आवाज़ सुनाई दी,“बाहर जाओ, यहाँ मत रुको।”आवाज सुनते ही आरव का शरीर कांप उठा। उसके हाथ से लैम्प लगभग छूट ही गया था। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन कमरे में उसके अलावा कोई नहीं था। अचानक हवा ठंडी हो गई और लैम्प की लौ काँपने लगी।“क-कौन है?” आरव ने डर के मारे कांपती आवाज़ में पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।दीवार पर टंगी वही पुरानी पेंटिंग अब उसे अलग-सी लग रही थी। पेंटिंग में बने आदमी की आँखें गहरी और खाली थीं, जैसे आरव को ही घूर रही हों। आरव डर से पीछे हट गया और फिर हवेली के अंदर दूसरी तरफ बढ़ा। हवेली के अंदर की हवा ठंडी और अजीब थी, जैसे कोई अज्ञात प्रेत उसके पीछे चल रहा हो।तभी उसकी नजर जमीन पर पड़ी और एक डायरी दिखाई दी। जैसे ही उसने डायरी उठाई, हवेली का दरवाजा अपने आप जोर से बंद हो गया। आरव समझ नहीं पाया कि यह सब क्या हो रहा है।डायरी में लिखा था:“जो भी इस हवेली में रात में रहेगा, वह इस हवेली का हिस्सा बन जाएगा।”डर की वजह से लैम्प आरव के हाथ से गिरकर बुझ गया। तभी अचानक पेंटिंग की आँखों से लाल रौशनी फैल गई, और हवेली के चारों ओर छा गई। आरव के चारों ओर सिर्फ परछाइयाँ घूम रही थीं। डर के मारे वह जमीन पर गिर पड़ा।आरव ने सोचा, “मुझे यहाँ से निकलना होगा।”आरव ने तेजी से भागते हुए दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश अब थोड़ी कम हो गई थी और रात का अंधेरा भी हल्का सा कम हुआ था। आरव ने पीछे देखा। हवेली पूरी तरह खामोश खड़ी थी, लेकिन उसकी परछाई के साथ एक और परछाई खिड़की में दिखाई दे रही थी, जैसे कोई उसके पीछे खड़ा हो।