Bade Dil Wala - Part - 6 in Hindi Motivational Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | बड़े दिल वाला - भाग - 6

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बड़े दिल वाला - भाग - 6

अभी तक आपने पढ़ा कि अनुराग ने पहली रात अनन्या की थकान का सम्मान करते हुए उसे नहीं जगाया और सुबह उसे प्यार से सुहाग का पूरा सामान उपहार में दिया। हीरे का मंगलसूत्र और चूड़ियाँ देखकर अनन्या भावुक हो गई, अनुराग के स्पर्श ने उसके दिल को गहराई से छू लिया। अब इसके आगे-

अनुराग के स्पर्श को अपने शरीर पर महसूस करते हुए अनन्या सोचने लगी, ऊपर वाले तू यह कैसी अग्नि परीक्षा ले रहा है। अनुराग का दिया हुआ ये उपहार सुहाग की निशानी है और इस शृंगार को अपनाने के लिए उसका मन तैयार नहीं है। वह तो वीर के हाथों से मंगलसूत्र पहनना चाहती थी। परंतु ये ... तब तक अनुराग ने मंगलसूत्र पहना दिया। फिर उसके सामने खड़ा होकर बिंदी के पैकेट से बड़ी-सी बिंदी निकालकर अनन्या के माथे पर लगाने लगा।

लेकिन अनन्या के आंसू देखकर उसने पूछ लिया, "क्या हुआ अनु, तुम्हारी आंखों में आंसू ...? अच्छा ... जानता हूँ, ख़ुशी के हैं ना?" कहते हुए बड़े ही प्यार से उसके माथे पर बिंदी लगाकर अनुराग ने अपने होंठ अनन्या के होठों पर रख दिए।

अनन्या असहज होने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, कैसे अनुराग को मना करे। तब तक किसी ने दरवाज़ा खटखटाया तो अनुराग को अलग होना पड़ा।

उसने अनन्या का माथा चूमते हुए कहा, "अभी हम दोनों को और इंतज़ार करना पड़ेगा।"

लेकिन अनन्या खुश हो गई। उसने सोचा हाश ... अच्छा हुआ कोई आ गया।

अनुराग ने दरवाज़ा खोला तो देखा उसका छोटा भांजा था तथा पीछे-पीछे उसकी बहन श्रुति आ रही थी।

श्रुति ने कहा, "क्या भैया हमें भाभी से बात करना है। आपका समय रात का है, आप अभी जाओ यहाँ से।"

श्रुति के आने से अनन्या ने एक गहरी सांस ली और उसके साथ बातें करने लगी। फिर भी उसे डर तो लग ही रहा था कि अभी नहीं तो रात को वह फिर आएगा। तब कैसे मना करेगी? वह तो वीर की है, यदि वह अपने आप को बचा नहीं पाई तो वीर को क्या मुंह दिखाएगी। जब वीर उनके अधूरे मिलन को पूरा करना चाहता था तब काश उसने कर लेने दिया होता। वीर ने उसे कितना मनाया था। एक बार नहीं, कई बार पर वह नहीं मानी थी। आज उसकी हर सांस वीर को पाना चाहती है। उसका तन, मन सब वीर के स्पर्श को महसूस करना चाहता है। अनुराग के छूने से उसे घुटन होती है।

खैर, दिन तो श्रुति और शैलजा के साथ कट गया। परंतु फिर धीरे-धीरे रात भी अपने पैर पसारने लगी। रात को अनुराग ने कमरे में आते ही दरवाजे पर चटकनी लगा दी।

अनुराग ने अनन्या से कहा, "बस अब हमें कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा," ऐसा कहते हुए उसने अनन्या को अपनी बाँहों में भरने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया।

अनन्या ने उसे रोकते हुए कहा, "प्लीज आप इस तरह जल्दी मत कीजिए। मैं अभी कंफर्टेबल नहीं हूँ। मुझे थोड़ा समय लगेगा।"

"क्या ...? यह तुम क्या कह रही हो अनु? हम पति-पत्नी हैं, यह हमारी मिलन की रात है और तुम मना कर रही हो। आख़िर बात क्या है अनु? कुछ भी परेशानी हो तो तुम मुझसे कह सकती हो।"

"नहीं-नहीं, कोई परेशानी नहीं है। बस मुझे थोड़ा-सा समय चाहिए।"

"कोई बात नहीं अनु, मैं तुम्हारी मर्जी के बिना कभी भी कुछ नहीं करूंगा। जब तुम हाँ कहोगी तभी हमारा मिलन होगा।"

अनन्या तो यही चाहती थी। पूरी रात एक दूसरे की तरफ़ पीठ करके बीत गई। अनन्या को तो वीर के पास जाना था।

वह अनुराग की गलतियों का, उसके गुस्से का इंतज़ार कर रही थी। पर उसकी वह इच्छा पूरी ना हो सकी। अनुराग हर रोज़ उसके लिए फूलों का गजरा लेकर आता। खाना खाने के लिए उसे भी साथ में बिठाता। उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख़्याल रखता। चाह कर भी अनन्या उसे किसी भी तरह से दोषी नहीं बना पा रही थी।

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक 
क्रमशः