is ghar me pyar mana hai - 2 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | इस घर में प्यार मना है - 2

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इस घर में प्यार मना है - 2

कमरे में सन्नाटा था।
इतना गहरा… कि संस्कृति की सिसकियाँ भी उसे तोड़ नहीं पा रही थीं।
वो वहीं बैठी रही। दुल्हन की तरह सजी… लेकिन किसी बेवा से भी ज़्यादा अकेली।
धीरे-धीरे उसने फाइल अपने हाथ से नीचे रख दी। जैसे उसमें लिखा हर शब्द उसके दिल पर किसी ने नुकीले पत्थर से उकेर दिया हो।

संस्कृति (खुद से, टूटती आवाज़ में) बोली - 
“तो यही है… शादी?”

उसने कंगन उतार दिए। एक-एक करके। गहने उतार कर इधर उधर फेंक दिए। हर खनक के साथ उसकी उम्मीद टूटती गई।
आईने में खुद को देखा—
लाल जोड़ा अब बोझ लग रहा था। सिंदूर… जैसे किसी और की कहानी हो।
वो ज़मीन पर बैठ गई। घुटनों में सिर छुपा लिया।
आँसू गिर रहे थे… लेकिन आवाज़ नहीं निकल रही थी।
क्योंकि उसे याद था इस घर में आँसू मना हैं।

उसे अपनी माँ याद आई। शादी से पहले कही गई आख़िरी बात—
“बेटी, अगर पति सख्त हो तो थोड़ा झुक जाना…घर बचा रहता है।”

संस्कृति ने हल्की सी हँसी हँसी। 

वो बोली - 
कितनी अजीब बात है—
झुकते-झुकते कोई खुद ही टूट जाता है।

रात गहरी होती गई।घड़ी की टिक-टिक उसके दिल की धड़कन से टकरा रही थी।
हर आहट पर उसे लगा… शायद कार्तिक लौट आए।
लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। वो समझ गई—
ये इंतज़ार भी एकतरफ़ा है।

संस्कृति ने तकिए को सीने से लगाया। जैसे किसी इंसान को पकड़े हो।

संस्कृति (धीमे स्वर में) बोलीं - 
“मैं ज़्यादा कुछ नहीं चाहती थी…
बस इतना कि आप मुझे पराया न समझें।”

तकिया गीला हो गया। लेकिन जवाब नहीं आया।

रात के किसी पहर… संस्कृति की नींद हल्की हो गई।
आँखें बंद थीं, लेकिन कान जाग रहे थे।
बाहर से आवाज़ें आ रही थीं—
दबी-दबी, तीखी… जैसे कोई झगड़ा हो रहा हो।

आवाज़ें (बाहर, अस्पष्ट) —
“नई-नई शादी है…”
“लोग क्या कहेंगे?”
“बहू कमरे में अकेली है!”

संस्कृति ने करवट बदली। लेकिन थकान इतनी थी कि वो पूरी तरह जाग नहीं पाई।
कुछ देर बाद… दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई।
क्लिक…
उसे लगा कोई कमरे में आया है। हल्के कदम… बहुत संभल-संभल कर।
फिर… पलंग का दूसरा सिरा थोड़ा सा धँसा।
संस्कृति ने नींद में ही महसूस किया— 
किसी की साँसें।
गहरी…थोड़ी बेचैन।
उसका दिल ज़ोर से धड़का, लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया।
वो बहुत थक चुकी थी।

नींद और जागने के बीच उसके होंठों से बस इतना निकला—
“माँ…”

साँसें एक पल को रुक गईं। फिर पहले से धीमी हो गईं।

सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से अंदर आई।
संस्कृति की आँख खुली।
पहले तो उसे कुछ अजीब लगा… जैसे कमरे की हवा बदली हुई हो।
फिर उसकी नज़र…पलंग की दूसरी तरफ गई।

कार्तिक।
वो वहीं सो रहा था। पीठ उसकी तरफ, चेहरा थोड़ा सा मुड़ा हुआ।
संस्कृति की साँस अटक गई।
एक पल को उसे लगा वो सपना देख रही है। लेकिन ये सपना नहीं था।
कार्तिक का कोट कुर्सी पर पड़ा था। जूते नीचे उतरे हुए थे।
वो सच में… यहीं सोया था।

संस्कृति ने कोई आवाज़ नहीं की। बस उसे देखती रही।
उसका सख्त चेहरा नींद में थोड़ा थका हुआ लग रहा था।
संस्कृति के मन में अपने आप जवाब बनने लगे।

संस्कृति (मन में) बोली - 
“कल रात…ज़रूर घरवालों ने कुछ कहा होगा।
दुल्हन के पास न सोने की वजह से…”

वो समझ गई थी—
ये उसका फैसला नहीं था। ये मजबूरी थी।

कार्तिक की भौंहें नींद में भी सिकुड़ी हुई थीं। जैसे वो चैन से सो नहीं रहा हो।
संस्कृति ने बहुत धीरे से अपना आँचल ठीक किया।
उसे छूने की हिम्मत नहीं हुई। पास होकर भी… दूरी साफ़ दिख रही थी।

संस्कृति (मन में) बोली - 
“आप आए…लेकिन मेरे लिए नहीं।”

उसके होंठों पर हल्की सी उदासी भरी मुस्कान आ गई।
कार्तिक की आँख अचानक खुल गई। उसकी नज़र सीधे
संस्कृति से टकरा गई।
कुछ सेकंड… बस खामोशी।
फिर कार्तिक उठकर बैठ गया।

कार्तिक (रूखे स्वर में) बोला - 
“गलत मत समझना।
माँ ने ज़िद की थी।”

संस्कृति ने तुरंत नज़र झुका ली।

संस्कृति (धीरे से) बोली - 
“मैं समझती हूँ।”

कार्तिक पल भर को रुका। शायद उसने ये जवाब उम्मीद से ज़्यादा आसान पाया। वो पलंग से उठा।

कार्तिक बोला - 
“घरवालों के सामने सब ठीक लगना चाहिए।”

संस्कृति ने सिर हिलाया।
वो दरवाज़े तक गया… और बिना पीछे देखे निकल गया।
संस्कृति फिर से अकेली रह गई।
लेकिन इस बार…अकेलापन थोड़ा और भारी था।
क्योंकि अब वो जान चुकी थी—
उसकी ज़िंदगी में कार्तिक की मौजूदगी होगी…
लेकिन उसके दिल की नहीं।

क्या ये मजबूरी धीरे-धीरे आदत बनेगी?
या यही पास रहना कार्तिक की नफरत में पहली दरार डालेगा?