शादी को कुछ ही दिन बीते थे।
संस्कृति अब भी उस घर को समझने की कोशिश में थी—
कि कब, कैसे सब ठीक होगा।
लेकिन उस दिन उसके शरीर ने उसे धोखा नहीं दिया… समाज ने दिया।
सुबह-सुबह संस्कृति को दर्द महसूस हुआ।
वो समझ गई—पीरियड्स हो गए।
उसने चुपचाप अपना काम निपटाने की कोशिश की, लेकिन बात
सास तक पहुँच गई।
सास की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी—
राम-राम-राम!
गंदी लड़की!
पूरे घर को अशुद्ध कर दिया!
संस्कृति सन्न रह गई।
सास ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ा और घसीटते हुए घर के पिछले हिस्से की तरफ ले चली।
संस्कृति डर गई।
संस्कृति बोली -
माँजी… मुझे दर्द हो रहा है…।
लेकिन कोई नहीं रुका। घर के कोने में एक कमरा था। अंधेरा। सीलन भरा। हवा तक बासी। दरवाज़ा खुला तो बदबू ने संस्कृति का दम घोंट दिया। कमरा गंदा था…धूल, जाले, पुरानी मिट्टी की गंध। संस्कृति को गंदगी से एलर्जी थी।
वो छींकने लगी लगातार। और पेट का दर्द और तेज़ हो गया।
तभी उसकी सास ने उसे कमरे में धक्का दे दिया। संस्कृति अन्दर जा गिरी।
सास (निर्दयी स्वर में) बोली -
जब तक ठीक नहीं हो जाती, यहीं रहेगी।
सास बोली -
घर में पूजा हो रही है। तू अशुद्ध है।
धड़ाम!
दरवाज़ा बंद हुआ।
फिर—
क्लिक।
ताला लग गया।
संस्कृति की साँस अटक गई। अंधेरा… पूरी तरह अंधेरा।
वो ज़मीन पर बैठ गई। पेट दर्द से ऐंठ रहा था।
हाथ काँप रहे थे। उसके पास बस दो पैड के पैकेट थे।
ना पानी। ना दवा। ना रोशनी।
और उसे अंधेरे से बहुत डर लगता था।
अंधेरे में उसके दिमाग़ में एक ही सवाल घूम रहा था—
जिस खून से सृष्टि बनी… जिससे जीवन आता है… वो खून अशुद्ध कैसे हो गया?
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। लेकिन वो रो नहीं पाई। सिर्फ़ चुपचाप काँपती रही।
उसने दरवाज़े की तरफ देखा—
शायद कोई आए।
कार्तिक…कोई…लेकिन बाहर मंत्रों की आवाज़ थी। घंटी बज रही थी। पूजा चल रही थी।
और वो… अकेली। संस्कृति ने घुटनों में सिर छुपा लिया।
संस्कृति (काँपती आवाज़ में) बोली -
क्या यही रघुवंश की मर्यादा है…?
मैं भी तो रघुवंशी हूं मेरे घर वाले भी तो रघुवंशी थे।
वहां तो ऐसा कभी नहीं हुआ।
Mummy ने तो कभी ऐसा भाभी के साथ नहीं किया।
अंधेरे कमरे में बस उसकी सिसकी थी—
जो किसी ने सुनी नहीं।
शाम को कार्तिक घर लौटा। थकान हमेशा की तरह उसके चेहरे पर थी, लेकिन आज घर में कदम रखते ही कुछ गलत लगा। बहुत गलत।
वो सीधे अपने कमरे में गया। नज़र सबसे पहले पलंग पर पड़ी।
खाली। संस्कृति वहाँ नहीं थी। कार्तिक की भौंहें आपस में जुड़ गईं।
उसने कमरे के चारों ओर देखा—
अलमारी बंद, खिड़की वैसी ही, सब कुछ ठीक… सिवाय एक चीज़ के।
संस्कृति।
कार्तिक ने पहली बार अपने सीने में अजीब-सी घबराहट महसूस की।
कार्तिक (मन में) बोला -
इस वक्त वो बाहर क्यों होगी?”
वो तेज़ क़दमों से घर में इधर-उधर देखने लगा।
ड्रॉइंग रूम। रसोई। बरामदा।
कहीं नहीं।
आख़िरकार वो माँ के कमरे के बाहर रुका।
कार्तिक (संयमित आवाज़ में) बोला -
मां! संस्कृति कहाँ है?
माँ ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
सास (ठंडी आवाज़ में) बोली -
घर में ही है।
बस इतना। कोई और जवाब नहीं। कार्तिक का धैर्य धीरे-धीरे टूटने लगा।
कार्तिक बोला -
घर में… कहाँ?
माँ ने फिर चुप्पी ओढ़ ली।
वो समझ गया—
कुछ छुपाया जा रहा है।
सीढ़ियों के पास लाली खड़ी थी।
उसकी आँखों में डर और अपराधबोध दोनों थे।
कार्तिक ने उसे इशारे से बुलाया।
कार्तिक (धीमी आवाज़ में) बोला -
लाली, सच-सच बताना—
संस्कृति कहाँ है?
लाली के होंठ काँपे। उसने चारों तरफ देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा।
लाली (धीमे, काँपते स्वर में) बोली -
मालिक…बहू जी को पिछले वाले अंधेरे कमरे में बंद कर दिया गया है… ।
कार्तिक की आँखें एकदम सख्त हो गईं।
कार्तिक बोला -
क्यों?
लाली ने आवाज़ और धीमी कर ली—
वो…वो उन दिनों में हैं…।
एक पल को कार्तिक की साँस जैसे रुक गई।
उसके भीतर कुछ टूट कर आग बन गया।
माँ पर।
इस घर पर।
इन नियमों पर।
उसने मुट्ठियाँ भींच लीं।
वो वापस माँ के कमरे की तरफ देखा।
उसे अच्छे से पता था—
माँ से कुछ कहना मतलब भैंस के आगे बीन बजाना।
ना सुनेंगी। ना समझेंगी। सिर्फ़ और ज़हर उगलेंगी।
कार्तिक ने कुछ नहीं कहा। बस पीछे मुड़ा। लेकिन इस बार उसकी चाल में ठंडापन नहीं था। कुछ और था—फैसला।
क्या कार्तिक उस अंधेरे कमरे का दरवाज़ा खोलेगा?
या माँ के डर से फिर चुप रह जाएगा?