Mujh se Miliye in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Mujh se Miliye

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Mujh se Miliye

कहानी मेरी है… मैं एक पेन हूँ… 

जी हाँ, आपने सही पढ़ा है…

 

 

इंग्लिश में कहें तो पेन, उर्दू में कहें तो क़लम, और भी भाषाओं में मुझे अलग नामों से बुलाया जाता होगा, पर मतलब सबका एक ही निकलता है—पेन या क़लम…

मेरी ज़िंदगी बहुत ही अलग है, मैं हर किसी के काम आता हूँ—बच्चे, जवान, पढ़े‑लिखे, बिज़नेस मैन, और तो और मोहल्ले की किराने की दुकान पर भी मेरा बड़ा दबदबा है…
हाँ जी, ये मैंने इसलिए कहा क्योंकि सबकी उधारी तो वो मुझसे ही लिखता है, कितना कलेक्शन कहाँ से करना है, सारे पैसे का हिसाब‑किताब में ही देखता हूँ…

जैसा कि मैंने आपको बताया, हर किसी को दिन में कम से कम एक बार तो मेरी ज़रूरत पड़ती ही है…
कितना अच्छा लगता है जब अचानक ज़रूरत पड़ने पर मज़मय में पुकारा जाता है, “अरे किसी के पास पेन है क्या?” और मेरा सीना ख़ुशी से फूल जाता है…

जिस किसी के पास पेन निकल आता है, वो तो भीड़ में सर उठाकर जीता है…
पर आपने सोचा है अगर ज़रूरत पड़ने पर मैं न मिलूँ तो क्या हो सकता है…

चलिए, आपको अपनी जीवन यात्रा करा ही देता हूँ…

तो साहब, जब मेरा जन्म हुआ, तो मैंने एक परिवार में आंखें खोली…
मेरे मालिक का नाम था गोलू… अरे नहीं नहीं, वो भी ज़िंदा है…

हाँ, तो जनाब गोलू के पाँचवीं क्लास में पास हो जाने की ख़ुशी में गोलू की बड़ी बहन परी ने उसको गिफ्ट में दिया लाल रंग का बहुत खूबसूरत पेन यानी मैं…

 

मैं अपनी तारीफ़ तो नहीं कर रहा, पर हाँ, ऐसा गोलू ने ही कहा था—“बहुत खूबसूरत पेन है, दीदी… थैंक यू।”
इसीलिए मुझे पता चला कि मैं दिखने में सुंदर हूँ… और साथ‑साथ बेहद सुषील भी।
यानी मेरी नोक जो है, जब पेपर पर चलती है तो ऐसा लगता है जैसे बस फूल ही खिल उठेंगे…
बिल्कुल सुलूल, राइटिंग पेपर पर उभरती चली जाती है…
पर (लिखने वाले को भी थोड़ा सलीका तो आना ही चाहिए)।

चलिए, मेरी तारीफ़ आप इतनी भी न कीजिए, अब आपको अपने मालिक से मिलवाता हूँ।
गोलू के बारे में क्या बताऊँ… बेहद ला परवाह…
और वो बच्चा बिलकुल अपने नाम की तरह गोल‑मोल है।

पाँचवीं क्लास में पास हुआ तो परी दीदी ने उसे पेन गिफ्ट में दिया, पर गोलू ठहरा सदा का लापरवाह…
गिफ्ट में मिली चीज़ की भी उसे कोई क़दर नहीं…
मजाल है जो वह एक दिन भी मुझे स्कूल अपने साथ, अपने बैग में डालकर ले गया हो…

बस मुझे डाल दिया एक खिलौनों के डिब्बे में, जहाँ उसके बाकी सारे गिफ्ट बचपन की यादों के साथ रखे थे…
और मैं उसी इंतज़ार में पड़ा बोर होता रहा कि कब गोलू मुझे यहाँ से निकालकर सही जगह इस्तेमाल करेगा…

और एक दिन… वो दिन भी आ ही गया…

उस दिन सुबह की रोशनी के साथ ही किसी ने उस डिब्बे से मुझे बाहर निकाला था…
ये गोलू की परी दीदी थीं…
मेरे मालिक की दीदी थीं, तो मेरी भी दीदी ही हुईं… यहाँ मैं भी उन्हें दीदी ही बुलाऊँगा…

तो परी दीदी ने मुझे उस क़ैद से बाहर निकाला…
वो उस दिन कमरे में कुछ डरी‑सहमी सी आई थीं…
पेन ढूँढते‑ढूँढते उन्हें मैं मिला…

फिर उन्होंने काग़ज़ उठाया और लिखना शुरू किया…

प्यारी मानु दीदी…
मैं पढ़ाई के लिए कॉलेज में एडमिशन लेना चाहती हूँ, पर पापा ने मुझे मना कर दिया।
कहते हैं—अब बस शादी की तैयारी करो, घर-दारी सीखो।
पर मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।
दीदी, आप आकर पापा से बात करो…

ओह… ये क्या चल रहा था परी की ज़िंदगी में…
वो अपनी बड़ी दीदी को ख़त लिखकर बुला रही थी…

मेरा मन दुखी हो गया।
जहाँ गोलू और परी के पेरेंट्स गोलू को पढ़ाने के लिए बाहर भेजने की प्लानिंग कर रहे थे,
वहीं परी दीदी को लेकर उनकी सोच कैसी थी…

मैं उदास हो गया…

परी दीदी ने ख़त पूरा लिखा और मोड़कर साथ ले गईं,
पर मुझे वहीं टेबल पर ही छोड़ दिया…

मैंने ज़रा नज़र उठाकर देखा,
तो मैं इस वक़्त घर के हॉल में रखी टेबल पर था…

तभी कोई हॉल में दाख़िल हुआ…

“गोलू ओए गोलू, चल क्रिकेट खेलेंगे…”

ये था गोलू का दोस्त पिंटू,
जो न तो ख़ुद पढ़ता था,
ना ही गोलू को पढ़ने देता था—
निरा एक नंबर का निकम्मा…

मेरे माथे पर बल ही तो पड़ गए इस नालायक को देखकर…

वो इधर-उधर देखता हुआ घर के अंदर घुसता चला आया…
गोलू शायद घर पर नहीं था…

उसकी नज़र मुझ पर पड़ी,
और आँखें फाड़कर मेरी सुंदरता को बस देखता ही रह गया…

फिर क्या था—
उसने झट से मुझे उठा लिया…

अब वो मुझे घुमा-फिरा कर चारों तरफ़ से जाँच रहा था।
मेरे सिर पर लगा हीरा चमकता देख उसे बड़ी हैरानी हुई…

“इतना प्यारा पेन…”
उसके गंदे से मुँह से निकला…

“अरे पिंटू, गोलू तो स्कूल गया है, तुम नहीं गए क्या?”
तभी अंदर से परी दीदी आ निकलीं…

और पिंटू ने बड़ी तेज़ी से मुझे अपनी पैंट की जेब में डाल लिया…

उफ़्फ़… मेरा तो दम ही घुट गया…
और साथ ही आज मुझे समझ आ गया कि गोलू मुझे कभी स्कूल ले जाने की हिम्मत क्यों नहीं कर सका था…

“अच्छा दीदी, ठीक है, मैं चलता हूँ…”
वो परी दीदी से बोलता हुआ,
बहुत तेज़ी से घर के बाहर वाले दरवाज़े की तरफ़ दौड़ गया…

“इसे क्या हुआ?”
परी दीदी की आवाज़ हैरानी में डूबी थी…

और मुझे पता था—
इसे क्या हुआ…

ये मुझे किडनैप करके ले जा रहा था…

मेरा दम सूख गया जनाब…

अच्छा-अच्छा, ठीक है, माना मैं कोई इंसान नहीं,
बस एक पेन हूँ…
तो फिर भी हुई तो ये चोरी ना…

वो अपनी गंदी, बदबूदार पैंट में डालकर
मुझे चुरा कर ले जा रहा था…

और मैं…
मैं कुछ भी नहीं कर सका…

“साला इतना सुंदर पेन…
ये गोलू ने कभी दिखाया नहीं, ना ही स्कूल लेकर आया…
अब मज़ा आएगा, जब घर पर ढूँढेगा तो मिलेगा नहीं…”

वो बड़बड़ाता हुआ मुझे जेब में ही हाथों से कसता हुआ घर की जानिब दौड़ रहा था…

पर कुछ हुआ अचानक…

मैं मुँह के बल गिरा था…
मेरी तो दुनिया ही हिल गई…

शायद पिंटू की जेब फट गई थी…
और वो नालायक देख भी नहीं पाया कि मैं ज़मीन पर कैसे चारों खाने चित, मिट्टी में जाकर अट गया था…

वो सरपट दौड़ता हुआ आगे निकल गया…
और मैं…
वहीं पड़ा रह गया…

ये शायद प्ले-ग्राउंड था…
जहाँ कुछ बच्चे—
जो इतने भी बच्चे नहीं थे, थोड़ा जवान थे—
क्रिकेट खेल रहे थे…

मैं चुपचाप मिट्टी से अटा इंतज़ार कर रहा था कि कब किसी की नज़र मुझ पर पड़ेगी
और मुझे उठाकर कोई सीने से लगाएगा…

जी हाँ साहब…
खाने की क़ीमत भूखा ही जानता है,
और क़लम की क़ीमत पढ़ा-लिखा जानता है…

बाक़ी सबके लिए तो ये बस खेलने की चीज़ है…

न जाने कितनी देर मैं मिट्टी में अपनी इज़्ज़त बचाए पड़ा रहा,
जब एक हाथ मेरी चमक से मुतासिर होकर आगे बढ़ा और मुझे उठाया…

“व्हाट ए ब्यूटीफुल पेन… नाइस…”

एक नौजवान लड़का था…
शायद बहुत पढ़ा-लिखा होगा।
उसके मुँह से अंग्रेज़ी में अपनी तारीफ़ सुनकर मैं बस शर्म ही गया…

खैर छोड़िए, आप क्या समझेंगे…

उसने मुझे उठाया और जेब से रूमाल निकालकर अच्छी तरह साफ़ किया।
फिर अपनी सफ़ेद शर्ट की जेब में बड़े प्यार से इस तरह लगा लिया
कि मेरे सिर पर लगा हीरा शान से सिर उठाकर दुनिया को देख रहा था…

ये होते हैं क़द्रदान,
जो क़लम की क़ीमत पहचानते हैं…

मुझे खुशी हुई—
आज मैं सही हाथों में पहुँच गया था…

अब होंगे बड़े-बड़े काम मेरे ज़रिये…
ये सोचते हुए मैंने सुकून से आँखें बंद कर लीं…

जी हाँ,
निकाह के पेपर तैयार थे…

मैं अपने नए घर में जब से आया था,
तब से बहुत अच्छी कट रही थी।
नया मालिक मुझे शर्ट पर लगाए घूमता था,
पर ज़रा अजीब ही इंसान था—
काम ज़रा मुझसे कम ही लेता था।
मुझे बस शर्ट पर लगा हुआ देखकर बहुत खुश होता था…

आज भी मैं उसकी शर्ट पर ही लगा था,
पर शर्ट दीवार पर लगी खूंटी पर टँगी हुई थी…

जब कमरे में कोई फ़ोन पर बात करता हुआ एंटर हुआ,
मैंने झट से आँखें खोल दीं—

“पेपर की बात हुई कुछ?”

मतलब अब पड़ी पेन की ज़रूरत—
यानी मेरी…

मैं ज़रा-सी तैयारी में आ चुका था…

“हाँ-हाँ यार, लेकर आ रहा हूँ निकाह के पेपर,
बस एक पेन चाहिए…”

ये काशिफ (मेरा नया मालिक) का बड़ा भाई हुसैन था,
जो इधर-उधर सामान उलट-पलट कर काशिफ के कमरे में
पेन ढूँढने आया था…

उसके एक कान पर फ़ोन लगा था,
हाथ में पेपर थे,
और तभी उसकी नज़र मुझ पर पड़ी…

और बस—
आओ देखा ना ताओ,
और मुझे काशिफ की जेब से खींच लिया…

“चल मैं आया…
बस हाँ यार, बारात में ही पहुँच रहा हूँ,
तेरे निकाह होने से पहले ही मिलता हूँ…”

वाह!
कितना अज़ीम काम होने जा रहा था मेरे ज़रिये…

निकाहनामे पर दूल्हा-दुल्हन के साइन होंगे मुझसे…

वाह…
मुझे अपने आप पर फ़ख़्र हुआ…

कितना बड़ा काम है—
एक छोटे से पेन से दो दिलों को मिलाने का…

कहने को बहुत छोटी-सी बात है,
पर मेरे लिए नहीं…

एक पेन की नोक क्या-क्या लिख सकती है,
इसका अंदाज़ा मैं ही कर सकता था…

तो साहब…

हुसैन जल्दी-जल्दी रेडी होकर अपने दोस्त की बारात में पहुँचा।
क़ाज़ी साहब बस इंतज़ार में थे—
दूल्हा समेत।

और जैसे ही हुसैन पहुँचा,
उसने पेपर और पेन दूल्हे के हाथ में दे दिए…

दूल्हे ने चंद लम्हे मुझे अच्छे से उलट-पलट कर देखा,
फिर पेपर की बैक साइड पर थोड़ा-सा रगड़ कर
मुझे चेक किया कि मैं ज़िंदा हूँ—
मेरा मतलब, लिखता भी हूँ या नहीं…

बस फिर क्या था…

क़ाज़ी साहब और गवाहों के सामने इजाज़त मिलते ही
दूल्हे ने निकाहनामे पर साइन कर दिए…

वहीं दूसरी तरफ़
दुल्हन अपनी सहेलियों के साथ
शरमाई-सी बैठी थी…
थोड़ी घबराई-सी भी…

दूल्हे ने पेन दुल्हन की सहेलियों की तरफ़ बढ़ा दिया
और पेपर भी साथ में…

और क़ाज़ी साहब समझाने लगे
कि कहाँ-कहाँ साइन करना है…

वाह…
कितने प्यारे, नरम हाथ थे…

आज पहली बार इतना अच्छा एहसास हुआ था…

मैं खो-सा गया…

तभी दुल्हन ने भी
वही हरकत की
जो दूल्हे साहब पहले कर चुके थे…

जी हाँ…
सच में उसने भी दूल्हे राजा की तरह काग़ज़ की बैक साइड पर पहले रगड़ कर मुझे चेक किया… जब तसल्ली हो गई कि सब ठीक है तब दुल्हन ने निकाहनामा पर साइन कर दिए 

सच में छत्तीस के छत्तीस गुण मिलते हैं दोनों के…

ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो…

— जहाँआरा बेग़म… जी हाँ, ये था हमारी दुल्हन का नाम…

बस फिर क्या था, एक मुबारकबाद का जो शोर का सिलसिला शुरू हुआ तो अगले दस मिनट तक सभी खुशी से एक-दूसरे के गले मिले। कोई दुल्हन को मुबारकबाद दे रहा था, कोई दूल्हे से हाथ मिला रहा था और क़ाज़ी साहब इस चक्कर में थके जा रहे थे कि उन्हें खाना खिला कर उनकी फ़ीस दे कर जल्दी विदा किया जाए…

मुबारक हो नवेद… कल कोर्ट में आ जाना, शादी को क़ानूनी तौर पर भी रजिस्टर करना है… ये एक काले कोट का हाथ था जो दूल्हे से जाकर मिले, मुबारकबाद दी और… चुपके से टेबल पर पड़ा खूबसूरत सा पेन उन्होंने सबकी नज़र बचा कर उठा लिया और अपने काले कोट की सामने वाली पॉकेट में बिल्कुल जैसे काशिफ़ अपनी शर्ट पर मुझे लगाता था, लगा लिया…

और मैं हुसैन नालायक, जो मुझे यहाँ लाया था, उसे ढूँढ रहा था, भूल ही गया था वो मुझे… वो दुल्हन के पास उनकी सहेलियों से खुश गप्पियों में मशगूल था… मैंने एक लंबी साँस ली… चलो जी फिर से मालिक बदल गया…

खाने के निपट कर बारात दुल्हन को लेकर रवाना हुई, इधर बाकी के लोग भी निकल पड़े अपने-अपने रास्ते… और मैं, मैं वकील साहब के साथ चल पड़ा और कोई ऑप्शन नहीं था मेरे पास… पर अच्छा लग रहा था वकील साहब के कोट की पॉकेट में बैठे। बस मैं सोच रहा था, क्या मेरी मंज़िल यहीं तक है या अभी और सफ़र करना है…

नहीं नहीं, ये मायूसी या थकान की वजह से नहीं सोच रहा था मैं… अब देखिए, मुझे ज़िंदगी में बड़े-बड़े काम करने थे, फ़्यूचर के बारे में भी तो सोचना चाहिए ना… जैसे आज निकाह के पेपर साइन किए थे… क्या फ़ील था…

फिर अचानक से परी दीदी का वो ख़त, जो उसने अपनी दीदी को लिखा था, याद आ गया… मुझसे दुख भी जुड़े हैं और मैं खुशी  भी लाता हूँ।

मैं बस एक पेन नहीं हूँ…..
मैं लोगों की ज़िंदगी के ख़ास लम्हों से जुड़ा होता हूँ…..
क़लम का काम बहुत है साहब, अगर उसे इस्तेमाल करने वाले के अंदर जज़्बा हो…

हाँ, आजकल टेक्नोलॉजी ने ज़रा लिखने का काम आसान कर दिया है। लोग पेन या क़लम की जगह कंप्यूटर पर टाइपिंग को तरजीह देने लगे हैं, मगर जो काम जहाँ पर मैं कर सकता हूँ, वो आपका कंप्यूटर नहीं कर सकता….

ये आप मानते हैं ना..?

चलिए खैर… आगे की सुनिए…

वकील साहब के घर आकर मुझे बहुत अच्छा लगा। उन्होंने बाक़ी लोगों की तरह मुझे सिर्फ़ शो-पीस की तरह जेब में चिपका कर नहीं रखा… काफ़ी काम लेने लगे मुझसे, जैसे अपनी छोटी-सी डायरी में किस-किस से कितनी फ़ीस ऐंठनी है… वो नोट करते थे… यानी सिर्फ़ ब्लैक मनी का हिसाब वो मुझसे कराते थे और बाक़ी का चिट्ठा उनका असिस्टेंट अपने कंप्यूटर में जाने क्या-क्या खिट-पिट करके उन्हें बताता रहता था…

फिर एक दिन ऐसा आया जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया…

वकील साहब का मुक़दमा था कोर्ट में… उन्होंने एक एप्लिकेशन काग़ज़ पर लिखी… जिसका सार कुछ यूँ था कि वो एक NOC लेटर था, जो एक पार्टी से दूसरी पार्टी को देना था। बाक़ी सारे कोर्ट के पेपर्स के साथ ये पेपर साइन करवा कर कोर्ट में सबमिट करने थे…

वकील साहब अपने चैंबर में बैठे थे, जब उनकी बुलाई हुई पार्टी आई। वो कुछ ग़रीब-से बूढ़े, एक औरत और एक मर्द थे… शायद पढ़े-लिखे भी नहीं थे… उनकी प्रॉपर्टी का केस था, जो धोखे से किसी ने हड़प ली थी और वकील साहब को इन बुज़ुर्ग लोगों को वापस दिलाने के लिए इनकी बेटी ने हायर किया था…

“बाबा, आप आ गए… लीजिए, यहाँ अंगूठा लगा दीजिए आप दोनों…”
वकील साहब ने बड़ी फुर्ती से वो लेटर उन बूढ़े लोगों के सामने टेबल पर रख दिया।

“क्या लिखा है बेटा इसमें…? हमारी ज़मीन तो छुड़ा लोगे ना तुम…?”
बूढ़े ने बड़ी आस से वकील से पूछा।

“बाबा, आप पहले अंगूठा लगाओ, फिर सब बता दूँगा…”

बूढ़े ने अपनी बीवी की तरफ़ देखा…
“लगा दो, जब वकील बाबू कह रहे हैं… इन्होंने जो किया होगा, वो सही ही होगा…”
औरत ने बड़े विश्वास से बूढ़े को समझाया, तो उसने काग़ज़ पर अंगूठा लगा दिया…

उसके बाद वकील ने नोटों से भरा एक बैग उन बूढ़े लोगों को देते हुए कहा…
“बाबा, ये आपकी ज़मीन के पैसे हैं… ठाकुर साहब ने आपको काफ़ी बड़ी रकम दी है। आप आराम से बैठकर खाइए… और आपके पास घर है ना रहने के लिए… क्या करना था इतनी बड़ी ज़मीन का… वैसे भी हाईवे प्रोजेक्ट में आपकी ज़मीन आ रही है, गवर्नमेंट उसे आपसे ले ही लेती… ठाकुर साहब के पास चली जाएगी तो उनको भी थोड़ा मुनाफ़ा हो जाएगा…”

दोनों बूढ़े वकील की बात पर सदमे से उसे देखने लगे…
“मतलब क्या है वकील साहब…? हमने आपको अपनी ज़मीन का क़ब्ज़ा हटाने का काम दिया था और आपने ठाकुर के साथ मिलकर हमें धोखा दिया…? क्या लिखा है इस पेपर में…?”

बूढ़े ने गुस्से से हाथ बढ़ा कर वो पेपर छीनना चाहा… तो वकील ने थोड़ा बिगड़ कर कहा…
“इसमें वही लिखा है जो सही है… मतलब ये कि आपने अपनी रज़ामंदी से अपनी ज़मीन ठाकुर साहब को मुनासिब दामों में बेच दी है और आगे से उस ज़मीन और ठाकुर साहब से आपका कोई मतलब नहीं है। आपको आपकी ज़मीन के पैसे दे दिए गए हैं…”

वकील की बात ने बूढ़े लोगों के साथ मुझे भी सदमे में डाल दिया…
ये क्या किया था वकील ने… ये कैसा धोखे का सौदा मुझसे कराया… बेचारों बुज़ुर्ग लोग…

“वकील साहब, आपने ये अच्छा नहीं किया… इस ज़मीन के सिवा हमारे पास और कुछ नहीं है। इसी पर काम करके हमारी रोटी चलती है। आपने ठाकुर के साथ मिलकर बहुत धोखा किया है… आपको ऊपरवाला कभी माफ़ नहीं करेगा…”

बुज़ुर्ग औरत ने ये कहते हुए अपने आँसू पोंछे और अपने बूढ़े का हाथ पकड़ कर दरवाज़े की तरफ़ क़दम बढ़ा दिए…

उफ़्फ़… क्या-क्या होता है इस दुनिया में… लोग अपने फ़ायदे के लिए कुछ भी कर जाते हैं… काश ये लेटर लिखने से पहले ही मेरी इंक ख़त्म हो जाती… मैंने दुख से सोचा, पर… फिर मैं न होता तो कोई और होता… ये सोच कर मैंने एक लंबी साँस छोड़ी…

“जी ठाकुर साहब, आपका काम हो गया…”
“जी-जी, कुछ नहीं ठाकुर साहब, आप परेशान ना हों… क्या ही कर लेंगे दोनों… आप बेफ़िक्र रहें, इस उम्र में और कितनी ज़मीन इनको चाहिए…”

वकील साहब की बातें मेरे दिल पर बिजलियाँ गिरा रही थीं… ठाकुर से बात करके उसने अपनी सीट संभाली और अपनी काले चिट्ठों वाली डायरी निकाल कर मुझे उठा लिया…

ठाकुर रणविजय के नाम के साथ ही वो पेमेंट की डिटेल लिखने लगा…
पचास लाख… पूरे 50 लाख लिए थे उसने इस धोखे के बदले…

मैं एक बार फिर अफ़सोस में डूब गया…
उन बूढ़े लोगों के आँसू मुझे भी दुखी कर रहे थे…

 मैं कर भी क्या सकता था…
एक पेन ही हूँ मैं… लोग अपने फ़ायदे के लिए भी मेरा इस्तेमाल करते हैं…

अब मैं जान गया था कि सिर्फ़ अच्छे काम ही नहीं… मेरा इस्तेमाल लोग अपनी अक़्ल के हिसाब से बुरे कामों के लिए भी करते हैं…

एक वक़्त था जब क़लम का बड़ा रौब था… सच्चे लोग सच्चाई को अपने मुक़ाम तक पहुँचाने में क़लम का इस्तेमाल किया करते थे… और ये अब आज का दौर है, जहाँ कुछ भी हो सकता है…

सच्चाई आज पैसों में बिक रही थी… और सच के लिए आवाज़ उठाने वाला कोई ना था, तो क़लम कौन उठाता…

क्या यही है इस दौर की सच्चाई… और मुझे ये मान लेना चाहिए??????

वकील साहब ने उठा कर मुझे जेब में रखा और फिर पेपर्स समेट कर कोर्ट में जाने के लिए उठ गए…

आज कोर्ट में उनके दो केस पर सुनवाई थी… एक तो यही ज़मीन का केस… और दूसरा एक डाइवोर्स के लिए लड़ रहे थे…

शादीशुदा होते हुए भी उनके मुवक्किल ने दूसरी शादी अपनी बीवी को बताए बिना कर ली थी, जिस पर उनकी पहली बीवी ने केस कर दिया, जो कि जायज़ भी था… होना शायद ये चाहिए था कि उनकी सुलह करा कर आगे की ज़िंदगी के बारे में उन्हें समझा कर अक़्ल के साथ फ़ैसला लेने का वक़्त दिया जाता… पर आख़िर नतीजा यही निकला कि डाइवोर्स ही सही डिसीजन है…

कोर्ट की कार्रवाई हुई, दोनों के वकीलों ने अपनी-अपनी दलील सामने रखी और जज साहब ने एविडेंस की मुनासबत से और दोनों पक्षों की रज़ामंदी से उनकी शादी को ख़ारिज करने का फ़ैसला दे दिया…

मैंने वकील साहब की जेब से झाँक कर थोड़ा सा सामने के कटघरे में खड़ी उस लड़की को देखा… जज साहब के फ़ैसले पर उसके चेहरे पर एक सन्नाटा सा छा गया था… पर केस उन्होंने ही दायर किया था तो शायद उनको ख़ुद को मुतमईन दिखाना तो था ही…

वकील साहब ने डाइवोर्स पेपर उस लड़की की तरफ़ बढ़ाए तो मैंने देखा उसके हाथ काँप रहे थे…
“आप ये पेपर साइन कर दीजिए और क़ानूनी तौर पर आज से आप दोनों की शादी ख़ारिज हो गई है। आपके शौहर आपको हर महीने 20 हज़ार रुपये तब तक देते रहेंगे, जब तक आपका बेटा बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए और कमाने न लगे…”

बीवी ने पेपर हाथ में पकड़े… मैं उसकी कपकपाहट महसूस कर सकता था… आसान नहीं था उसके लिए दस साल का रिश्ता तोड़ना… न जाने कितनी यादें उसकी आँखों के सामने लहरा रही होंगी…

काँपते हाथों से उसने वकील साहब के बताए जगहों पर साइन किए… और मैं करता भी क्या… वो साइन कर रही थी और मैं दुआ कर रहा था — काश मेरी इंक ख़त्म हो जाए… मगर फिर वही जवाब… मैं न होता तो कोई और होता…

एक आख़िरी साइन पर उसकी आँख का एक आँसू, जिस जगह उसने साइन किए, मेरी इंक पर आ गिरा… और मेरा दिल बस उसी लम्हे किसी ने ज़ोर से जैसे मसल दिया हो…

“ठीक है, अब आप जाइए…”
वकील ने पेपर ले लिए और पेन लेना भूल गया…

मैं उन्हीं उँगलियों में दबा रह गया, जो कुछ देर पहले डाइवोर्स पेपर पर साइन कर रही थीं… और वो ख़ुद अभी एक दुख से गुज़र रही थी… शायद एहसास ना रहा होगा कि पेन वकील साहब को वापस भी करना है… मुझे उसने मुट्ठी में भींच लिया… शायद तकलीफ़… या शायद गुस्सा… कुछ तो था उस हाथ में इस वक़्त, जो वो दिखा भी नहीं सकती थी…

कोर्ट से बाहर आकर सुनैना अपनी गाड़ी में बैठी और ड्राइवर ने गाड़ी घर की तरफ़ बढ़ा दी…

तब जाकर मुझे होश आया…
मेरा मालिक फिर बदल चुका था…

सुनीना का दुख बड़ा था। वो घर आकर बिस्तर पर जैसे गिर-सी गई… जैसे एक इंसान अपना सब कुछ जुए में हार कर खाली हाथ रह जाता है… सुनीना भी शायद ऐसा ही फ़ील कर रही होगी।

उसने कमरे में आकर मुझे ज़ोर से सामने वाली दीवार पर दे मारा…
उफ़्फ़…

मैं मुँह के बल दीवार से टकराता हुआ मार्बल के फ़्लोर पर आ गिरा और बेड के नीचे अँधेरे में कहीं डूबता चला गया… मानो जैसे एक बेहोशी मेरे हवास पर उतर आई हो…

बस दिल ने आख़िरी बार जो सोचा, वो यही था कि…
मेरी नई मालकिन बुरी नहीं है… बस दुख की वजह से उसने मेरे हाथ-पैर थोड़े से तोड़ डाले हैं… कोई बात नहीं…

ख़ुद को तसल्ली भी दे डाली साथ ही, और एक नए सवेरे के इंतज़ार में मैंने आँखें बंद कर लीं…

मैं न जाने कितने दिन उस बेड के नीचे बिना खाए‑पिए, या यूँ कह लें बिना कोई काग़ज़ काला किए, अपने आप को इस अँधेरे में छुपाए पड़ा रहा — इसका मुझे पता नहीं चला। लोग आते, कमरे में बातों की आवाज़ें सुनता। कभी सुनीना का बेटा बेड पर ज़ोर‑ज़ोर से उछल‑कूद करता, तो मेरा दिल ही बैठ जाता — अगर ये बेड टूट गया और मुझ पर आ गिरा तो?????

इससे ज़्यादा मुझमें सोचने का दम नहीं था। माँ‑बेटा दोनों ही शायद थोड़े अजीब तरह के थे…

फिर एक दिन एक झाड़ू बेड के नीचे सरसराती हुई घुस चली आई। पहले तो मैं डर ही गया और झाड़ू से टकरा कर थोड़ा और अंदर की तरफ़ सरक गया… पर झाड़ू थामे हाथ बहुत लंबे थे… शायद तय कर चुके थे कि आज तो सब साफ़ करना है। दो‑तीन बार की कोशिशों के बाद उसने आख़िर मुझे धर ही लिया…

मैं फ़र्श पर झाड़ू के साथ घिसटता हुआ, थोड़ा धूल‑मिट्टी में अटा हुआ, कचरे के साथ बेड से बाहर आ ही गया… पहले तो दो‑तीन झाड़ू और मुझ पर पड़ीं। शायद उसकी नज़र मुझसे ज़्यादा कचरे पर थी… और मैं उसकी इस बे‑क़दरी नज़र से बहुत ग़म में डूब गया। आख़िर मेरी ख़ूबसूरती मंद पड़ गई थी क्या… जो मैं उसको नज़र नहीं आया…

फिर अचानक झाड़ू रुक गई… ये अब चला मेरा जादू… मैं ज़रा नाज़ से ख़ुद में अकड़ गया… झाड़ू छोड़ कर उसने मुझे उठा लिया… ये इस घर की कामवाली थी। आँखें फाड़ कर उसने मुझे देखा… फिर अपनी साड़ी के पल्लू से मेरा मुँह‑हाथ पोंछे… और जब मैं लिश्कारे मारता हुआ उसके सामने अपनी पूरी आब‑ताब के साथ चमका, तो उसने बड़ी ख़ुशी से मुझे चूम लिया…

छी‑छी… सारा मुँह गंदा कर दिया… बेवक़ूफ़ औरत…

मैं बस मिनमिना कर रह गया… और मैं कर भी क्या सकता था… आख़िर को मैं एक पेन ही तो था ना…

उसने मुझे साफ़ करके अपनी साड़ी में छुपा लिया… और काम निपटा कर वो सुनीना से बोली —
“मैम साहब, मेरा काम ख़त्म हो गया… मैं चलती हूँ…”
और सुनीना ने सिर हिला कर उसे जाने की इजाज़त दे दी…

आपने कुछ महसूस किया…?
नहीं साहब, आपने नहीं किया… मैं बता देता हूँ आपको…
जी हाँ, मेरा मालिक एक बार फिर से बदल गया था…

कामवाली दूसरे घरों का काम निपटाती हुई अपने घर पहुँची। वहाँ उसका बेटा चिंटू अपना होमवर्क कर रहा था…
“देख चिंटू, मैं तेरे लिए क्या लाई हूँ…”

उसने अपनी साड़ी से छुपाया हुआ सुर्ख़ रंग का सुंदर‑सा पेन, जिसके सिर पर लगा हीरा जगमगा रहा था, अपने बेटे चिंटू के सामने कर दिया…

चिंटू ने अपने हाथ में पकड़ा मामूली‑सा प्लास्टिक का बॉल पेन छोड़ कर चमकती आँखों से मुझे देखा और अपनी माँ के हाथों से जैसे झपट ही लिया…
“वाह माँ! कितना सुंदर पेन है ये… आप मेरे लिए लाए हो… थैंक यू…”

चिंटू ने मुझे अपने सीने से लगा लिया और चिंटू की माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया। माँ‑बेटे के इस प्यार ने मेरी आँखें भिगो दीं…

चिंटू ने अपनी कॉपी खोली और अपना होमवर्क करने लगा। वो शायद सरकारी स्कूल में पढ़ता था। एक कामवाली बेचारी प्राइवेट स्कूल में क्या ही अपने बच्चे को डालती… पर वो उसे पढ़ा रही थी। ये देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और मुझे लगा — यही जगह मेरी असली जगह है…

चिंटू की राइटिंग बहुत सुंदर थी। जब वो मुझसे लिख कर अपना होमवर्क अपनी टीचर को दिखाता, तो उसे “गुड” मिलता था… चिंटू हर बार खुशी से चूम कर मुझे गंदा ज़रूर कर देता था, पर बाद में अपनी स्कूल यूनिफ़ॉर्म से साफ़ भी करके चमका देता था…

कुल मिलाकर मैं सुकून में था… बड़े काम भले ही मैं अपनी ज़िंदगी में न कर पाया, पर मैं अब अच्छे हाथों में था — इसका सुकून मुझे था…

लेकिन ये सुकून जल्दी ही ख़त्म हो गया…

“चल, मुझे पैसे दे… तुम दोनों माँ‑बेटा यहाँ ऐश कर रहे हो… और मैं एक बोतल शराब के लिए तरस रहा हूँ…”

वो शायद चिंटू का बाप था… इतने दिनों में पहली बार वो घर आया था… जैसे एक गंदे शराबी इंसान का हुलिया होता है, वो बिल्कुल ऐसा ही दिखता था। उसने माला के बाल (चिंटू की माँ) पकड़े हुए थे और चिंटू माला से लिपटा हुआ था…

“मेरे पास पैसे नहीं हैं… तुम यहाँ से जाओ…”

“हम माँ‑बेटा किस तरह से अपना गुज़ारा करते हैं, तुम कब हमसे पूछते हो…? तुम्हारी शराब के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं…”

माला ने चिंटू को अपने आप से और ज़ोर से चिपका लिया, इस डर से कि कहीं वो चिंटू पर भी हाथ न उठा दे। मैं इस वक़्त चिंटू के बैग के पास, बड़ी‑सी उसकी नोटबुक के बीच में लेटा हुआ था…

चिंटू अपने बाप के आने से पहले अपना बैग सेट कर रहा था, स्कूल जाने के लिए… पर जब उसके बाप ने उसकी माँ को थोड़े‑से पैसों के लिए मारना शुरू किया, तो नन्हा‑सा चिंटू डर कर बैग छोड़ कर अपनी माँ से लिपट गया था… वो क्या कर सकता था…

“ज़बान चलाती है… बहुत पैसे आ गए हैं ना लोगों के घर में जाकर काम करती है तू… क्या पगार नहीं मिलती तुझे…? थोड़े पैसे मुझे नहीं दे सकती…? चल पैसे दे… मुझे…”

वो इंसान नहीं, एक जानवर‑सा लग रहा था… उसने माला के मुँह पर एक चाँटा जड़ दिया। वो दोनों गिर पड़े…

“चिंटू, तू अपना बैग बना और स्कूल जा बेटा…”
माला ने चिंटू को उठा कर उसके कपड़े ठीक किए…

चिंटू जैसे रो पड़ने वाला था…

“अच्छा, स्कूल भेजती है तू इसे…? अरे ये भी सही है… कोई ज़रूरत नहीं है… ये किताबें तो मेरे काम आएँगी… इनको बेच कर ही मेरा शराब का काम बन जाएगा… मैंने तो देखा ही नहीं…”

वो चिंटू के बैग की तरफ़ बढ़ने लगा और एक‑एक किताब उठा कर अपनी गोद में रखने लगा, जैसे हिसाब लगा रहा हो — कौन‑सी कितने की बिकेगी, कितना पैसा मिलेगा जो उसको शराब दिला सके…

“वाह साला… ये तो मेरा एक हफ़्ते का राशन देगी मेरे को…”

उसने सारी कॉपी‑किताबें उठा लीं। फिर मुझ पर नज़र पड़ी, तो अलग से मुझे जेब में रख लिया…
“इसके तो शायद अच्छे दाम मिल जाएँगे…”

उसने खुश होकर मुझे अपनी गंदी शर्ट की जेब में डाल लिया…
एक शराबी इसके अलावा और क्या ही सोच सकता था…

“नहीं‑नहीं चिंटू के बाबा… मैं देती हूँ तेरे को पैसे… चिंटू की किताबें नहीं लेकर जाना… ये ले तेरी शराब के लिए पैसे… ये… ये सारे… ले जा, पर उसकी किताबें छोड़ दे… मेरा बेटा पढ़ता है, ये बड़ा होकर नाम कमाएगा… तू… तू ये रख ना पैसे…”

माला ने उसके हाथ से चिंटू की किताबें और उसका बैग छीन कर अपनी साड़ी के पल्लू में बँधे सारे पैसे उसके हाथ में थमा दिए…

उसको और क्या चाहिए था… वो खुश हो गया और सारी किताबें छोड़ कर घर से बाहर निकल गया, अपनी शराब ख़रीदने के लिए…

मैं उसकी गंदी, बदबूदार शर्ट में पड़ा सब देख और सुन रहा था… ये कैसी दुनिया थी, कैसे लोग थे… क्या होता जा रहा है… इंसानियत मर चुकी है क्या…

मैं बस बेबसी से सोच रहा था… और आख़िर में कर भी क्या सकता था… आख़िर था तो मैं बस एक पेन ही ना…

और फिर से एक बार…
नहीं, छोड़िए…
एक शराबी को मैं अपना मालिक नहीं कह सकता…

यहाँ तक मेरे बारे में जानने के बाद, क्या आपको लगता है कि जो कुछ हो रहा था, वह ठीक था…?
मैं जब दुकान में था (जब परी दीदी ने मुझे खरीदा नहीं था), तब मैं अक्सर सोचा करता था कि मेरे पूर्वजों ने कितने महान काम किए थे। एक क़लम की ताक़त ही हुआ करती थी, जो लोगों को इंसाफ़ दिलाया करती थी, लोगों के दिलों में जोश जगाया करती थी।

पर आज का इंसान शायद खुद ही अपने ज़मीर को बेच चुका है। वह अंदर से सोया हुआ है… वह कुछ करना ही नहीं चाहता। ताक़त तो क़लम उठाने वाले हाथों में होती है; क़लम का इस्तेमाल वही जानता है जो अंदर से ज़िंदा हो।
पर आज वह ताक़त कहीं भीड़ में गुम हो चुकी है। वह जज़्बा लोगों के दिलों से निकल चुका है… हाह!

तो फिर मैं अकेला, या मेरी सोच क्या ही कर सकती है? मैं उन लोगों को नहीं जगा सकता जिनका ज़मीर सो चुका है। लोग अपने आप को भूलते जा रहे हैं; अब वह वक़्त कहीं खो गया है। ये लोग वो लोग ही नहीं रहे… बस जैसे सब कंप्यूटर की दुनिया में तब्दील हो चुके हों। आज के इंसान के अंदर जैसे एक चिप सिस्टम लग गया है।

वह बस अपने बारे में सोचता है, अपनी फ़िक्र करता है। किसी को किसी की परवाह नहीं रही। जैसे कोई सितम हो रहा हो…
लेकिन आखिरकार मैं तो बस एक पेन ही हूँ न…
ख़ैर, छोड़ो …….

वह शराबी लड़खड़ाता हुआ शराब की दुकान पर पहुँचा और माँ के दिए पैसों से उसने जी-भरकर शराब पी। फिर वहीं एक कोने में मरे हुए कुत्ते की तरह पैर फैलाकर सो गया।
और मैं…
मुझे वक्त काटना था, इंतज़ार करना था—कि शायद अब मैं कहीं सही हाथों में पहुँच जाऊँ। शायद कोई मेरी ताक़त को पहचान ले और मेरा सही इस्तेमाल करे। उफ़… यह इंतज़ार…

तभी किसी ने उस शराबी को कॉलर से पकड़कर सीधा खड़ा किया—
“ओए, चल! बाहर निकल, दुकान बंद करने का वक्त हो चला है। साला नशेड़ी… बाहर जाकर कहीं मर।”

उसने बड़ी बदतमीज़ी से उसे कॉलर से पकड़े-पकड़े लगभग घसीटते हुए दुकान से बाहर फुटपाथ पर फेंक दिया। फिर दुकान का शटर डाउन कर ताला मारा और चलता बना।

और यह जो आदमी शराब पीने के लिए अपनी बीवी-बच्चों को मार-पीट कर पैसे लाया था, वह शराब भी इसकी न हो सकी। उसे किसी बेजान चीज़ की तरह फेंक दिया गया, और यह भी मज़े से पड़ा रहा। घर के सुकून को छोड़कर शराब में डूबा यह इंसान—जिसकी शर्ट की जेब में मैं पड़ा था—जिसे मेरी ज़रा-भर भी क़द्र नहीं थी।

वह वहीं पड़े-पड़े एक तरफ़ लुढ़ककर बेसुध हो गया। और मैं उसकी जेब से निकलकर उस गंदे से फुटपाथ पर जा गिरा, जहाँ गंदगी का ढेर और बदबू थी… उफ़्फ़…

न जाने कितनी देर बाद किसी के हाथों ने मुझे छुआ। उठाया, उलट-पलट कर देखा, और फिर जेब में डाल लिया—और अपना रास्ता नाप लिया।

दिन का उजाला फैला तो मैंने ख़ुद को एक साफ़-सुथरी सी राइटिंग टेबल पर पाया। कमरा भी बहुत साफ़ था और किसी पढ़े-लिखे इंसान का लग रहा था। मुझे ज़रा-सा ख़ुशी का एहसास हुआ।
क्या मैं अच्छे हाथों में… किसी क़द्रदान, किसी क़लम के शौक़ीन इंसान के पास पहुँच चुका हूँ?

उस टेबल पर कुछ किताबें थीं, तरह-तरह के काग़ज़ और एक पेन-होल्डर भी था, जिसमें अलग-अलग क़िस्म के पेन और पेंसिल रखे थे। मुझे ज़रा-सी जलन तो हुई, मगर एक एहसास भी जागा—मैं इन सब से ज़्यादा ख़ूबसूरत हूँ। मेरी सुर्ख़ रंगत, सुनहरा हैंडल और सर पर लगा हीरा
(हाँ-हाँ, नकली हीरा ही सही)
मुझे इन सब से अलग बना रहा था।

यह कोई गुरूर नहीं है, साहब…
अगर आपको ज़रा-सा भी लिखने का शौक़ है, तो आप समझ जाएँगे कि एक क़लम को अपने ऊपर इतना नाज़ क्यों होता है।

हाँ, तो मैं आपको अपने नए मालिक के बारे में बता रहा था, जिसके बारे में अभी ख़ुद मैं भी ठीक से जान नहीं पाया था… मगर कुछ अच्छा-सा एहसास हो रहा था।

तभी कमरे में कोई आया और कुर्सी खींचकर राइटिंग टेबल पर बैठ गया। टेबल पर पड़े काग़ज़ संभाले, एक तरफ़ कोने में रखे और बैग से लैपटॉप निकालकर कोई वीडियो क्लिप बार-बार चलाकर देखने लगा।
यही था मेरा नया मालिक… यहाँ भी टेक्नोलॉजी की बीमारी थी। मेरा मुँह बन गया।

और मैं कोने में पड़े बाक़ी काग़ज़ों के साथ-साथ बस यह देखने की कोशिश करने लगा कि आख़िर यह क्या देखने की कोशिश कर रहा है।
आप कुछ समझे…?
नहीं समझे…?
कोशिश करते रहिए…

बहुत देर तक वह वीडियो क्लिप देखने के बाद उसने जेब से फ़ोन निकाला और एक नंबर डायल किया—

“हेलो सुरेखा… मैं आशीष बोल रहा हूँ। सुनो, इंडिया टीवी पत्रकार आशीष।
हाँ, सुनो, मेरे पास बहुत ही सॉलिड एविडेंस हैं ऑपोज़िट पार्टी के ख़िलाफ़। उसकी बैंड बजने से अब कोई नहीं रोक सकता। इन नेताओं ने इस देश में जो घोटाले किए हैं, अब उसकी भरपाई का वक़्त आ गया है। मैं मोनालिका के पास जा रहा हूँ और उसका पूरा इंटरव्यू लेकर तुम्हें कॉल करूँगा। फिर उसके बाद हम अपनी न्यूज़ लाइव करेंगे।”

ओह… क्या बात थी!
तो आख़िर क़लम का असली हक़दार मिल ही गया था। मैं तो ख़ुशी से जैसे रोने ही वाला था। अब वक़्त आ गया था कुछ अच्छा करने का। इससे पहले कि मेरी स्याही ख़त्म होती, शायद मैं एक इतिहास रचने जा रहा था—ताकि अपने पूर्वजों के सामने शर्मिंदा न हो सकूँ। फ़ख़्र से सर उठाकर कह सकूँ—यह इतिहास मेरा लिखा हुआ है।

आशीष ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा, ज़रूरत की चीज़ें अपने बैग में रखीं—कुछ काग़ज़ और पेन। पेन उठाने के लिए उसका हाथ पेन-स्टैंड की तरफ़ बढ़ा… और मेरी साँस बस रुकने ही वाली थी कि उसका हाथ घूमकर मेरे सर पर आकर रुक गया।

“ह्म्म… ये ठीक है,”
उसके मुँह से निकला।

फिर उसने भी वही कर डाला जिससे मुझे तो क्या, सारे पेन और क़लम चिढ़ते हैं—एक बेकार काग़ज़ उठाया और ज़ोर से मेरी नोक को दो-तीन बार उलटी-सीधी लकीरें खींचकर चेक किया। हाँ, अभी मुझमें जान थी… मेरा मतलब है, स्याही बाक़ी थी।

उसने मुझे अपनी शर्ट की सामने वाली जेब में लगा लिया, तो मैंने उसकी इस गलती को नज़रअंदाज़ कर दिया।

आशीष ने गाड़ी निकाली और सामान का बैग साथ वाली सीट पर रखकर ख़ुद ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गया। गाड़ी स्टार्ट करके उसने एक और कॉल मिलाई—

“हेलो… मोनालिका,
मैं आशीष, सन इंडिया न्यूज़ से। देखो, मुझे वो फ़ुटेज मिल गई है और तुम्हारी बहन के मर्डर का पक्का सबूत यही वीडियो है। बस मुझे तुम्हारा इंटरव्यू लेना है। थोड़ी और जानकारी चाहिए, जिसके लिए मैं बस तुम्हारे ही पास आ रहा हूँ। तुम अपने घर पर ही मुझसे मिलो और इस बीच किसी और से कोई राब्ता मत करना।”

आशीष ने फ़ोन पर मोनालिका से बात की। तक़रीबन आधे घंटे बाद वह एक घर के सामने रुका। मामूली-सा घर था, शायद कोई बड़ा बंगला या कोठी नहीं। गाड़ी एक तरफ़ लगाकर आशीष ने अपना बैग संभाला और दरवाज़े पर आकर डोरबेल बजाई।

दरवाज़ा खोलने वाली मोनालिका ही थी।
“आइए सर… मैं आपका ही इंतज़ार कर रही थी।”

“मोनालिका, तुम मुझे एक बार सारा वाक़या शुरू से लेकर आख़िर तक बताओगी—क्या हुआ था—ताकि मैं हर कड़ी को जोड़कर निहारिका के लिए इंसाफ़ की गुहार लगा सकूँ।”

आशीष ने पेन और काग़ज़ संभाल लिए।

मोनालिका ने जो बताया, उसका सार यह था—
मोनालिका और निहारिका दोनों बहनें डांसर थीं और अक्सर बड़े लोगों की पार्टियों में शो करने के लिए बुलायी जाती थीं। तीन दिन पहले शहर के एक जाने-माने बिज़नेसमैन की बेटी की शादी में, जब रात के समय दोनों बहनें डांस कर रही थीं, तभी नशे में धुत उसी बिज़नेसमैन का एक रिश्तेदार—जो ख़ुशी में बात-बात पर फ़ायरिंग कर रहा था—शराब के नशे में गोली चला बैठा। वह गोली जाकर निहारिका को लगी और वह वहीं मर गई।

उफ़… कितना दर्दनाक हादसा था।

आशीष सारी डिटेल लिख रहा था और मैं लिखता जा रहा था। असरदार लोग थे—एक डांसर उनका क्या ही बिगाड़ लेती। डराकर-धमकाकर मोनालिका को वहाँ से भगा दिया गया और निहारिका की बॉडी को ग़ायब कर दिया गया। यह सब करने में शहर के कुछ नेताओं ने भी उस बिज़नेसमैन की मदद की।

बड़े लोगों से जान-पहचान रखने का यही तो फ़ायदा होता है—उन्हें खिलाओ-पिलाओ और जब वक़्त पड़े, अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करो। यहाँ भी यही हुआ था।

बहुत बुरा हुआ था…
आज की दुनिया में क्या कोई इंसाफ़ के लिए लड़ नहीं सकता? अपने लिए आवाज़ नहीं उठा सकता?

मोनालिका रोते हुए सब बता रही थी और मैं हैरान था।

आशीष उसका पूरा इंटरव्यू काग़ज़ पर उतारकर वहाँ से निकल आया।

“तुम बेफ़िक्र हो जाओ, मोनालिका। मैं यह कोर्ट में साबित करके ही दम लूँगा, और साथ ही पूरी तैयारी के साथ न्यूज़ चैनल पर इस इंसान का पर्दाफ़ाश करके रहूँगा।”

आशीष एक ईमानदार पत्रकार लग रहा था। मुझे आख़िर मेरा हक़दार मिल ही गया था। मैं बहुत ख़ुश और सुकून में था…
पर क्या जो मैं सोच रहा था, सब कुछ वाक़ई ऐसा ही हो जाना था…???

मोनालिका के घर से निकलकर आशीष ने कुछ और ज़रूरी काम निपटाए। शाम हो चली थी, वह घर आ गया। आशीष ने अपना सारा सामान, पेन और काग़ज़ अपनी राइटिंग टेबल पर रख दिए और शॉवर लेने चला गया।

रात के न जाने किस पहर खट-पट हुई तो मैं चौंक गया। कोई राइटिंग टेबल के पास खड़ा कुछ ढूँढ रहा था। आशीष का लैपटॉप किसी ने ऑन किया और वह फ़ुटेज—जो निहारिका की मौत का सबूत थी—डिलीट कर दी गई।

आशीष का फ़ोन बजा और उसने कॉल उठा ली—

“हाँ सर, कहिए…
जी, मैंने वो फ़ुटेज डिलीट कर दी है।
अरे सर, डील तो एक करोड़ की हुई थी, आप अब अपनी बात से पीछे हट रहे हैं…?
फ़ुटेज ही डिलीट की है मैंने। मोनालिका की पूरी स्टेटमेंट और मोनालिका कहाँ छुपी हुई है—यह अभी सिर्फ़ मुझे पता है।
अगर आप अपना वादा पूरा नहीं कर सकते, तो मैं भी वही करूँगा जो मुझे करना चाहिए।
कल सुबह सारे न्यूज़ चैनलों पर मोनालिका अपना बयान देगी।”

“तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे।
कल सुबह सात बजे मिलो। जो डील हुई है, वही पक्की समझो।”

आशीष ने मुस्कुराकर फ़ोन बंद कर दिया।

टेबल लैम्प की रोशनी में उसका चेहरा और उसकी मक्कारी देखकर मैं हैरान रह गया। आख़िर यहाँ भी इंसाफ़ बिक गया…
क्या फ़ायदा हुआ था कि मैंने अपनी स्याही से मोनालिका का पूरा इंटरव्यू लिखा था—जो उसके लिए इंसाफ़ का दरवाज़ा खोलने वाला था?

सच है जनाब, पैसों की ताक़त ने आज के दौर में क़लम की ताक़त को मार डाला है।
मैं भी अंदर से मर गया—यह सब देखकर।

अब कोई नहीं बचा इस दुनिया में जो क़लम की ताक़त को पहचाने, जो उसका सही इस्तेमाल करे।
सच ही था—यह दौर बदल गया था।
यह वक़्त कुछ और ही था…

अगली सुबह आशीष ने मोनालिका की फ़ाइल उठाई, मुझे अपनी शर्ट पर लगाया और तैयार होकर बताए गए पते पर जाने के लिए निकल खड़ा हुआ।
अब मेरे मन में न कोई उमंग बची थी, न ही इतिहास रचने का कोई शौक़। मैं बस ख़ामोश हो गया था। यह दौर क़लम का नहीं रहा था। मेरी उम्मीदें ग़लत थीं—आज के ज़माने में मैं किसे ढूँढने निकला था?
यहाँ तो सब अंधों और गूँगों की बस्ती हो चली थी। ऐसे में क़लम को तो ख़ामोश होना ही था। सो मैंने ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली। अब बस देखना था—कौन कहाँ तक और कितना गिर सकता है।

आशीष सदाचार सिंह के घर पहुँच चुका था। हाँ, यही वह गुनहगार था—जिसने एक मासूम की जान ली थी, सबूत मिटाए थे और अब नोटों से भरे एक बड़े से बैग के ज़रिये सच और इंसाफ़—दोनों के मुँह पर हमेशा के लिए ताला डालने वाला था।

“तुम वो पेपर लाए हो न?”
सदाचार बड़े से हॉल के बीच डाइनिंग टेबल पर बैठा, आशीष को घूरते हुए बोला।

“हाँ, मैं सब लाया हूँ। पहले पैसे आप मेरे हवाले कीजिए।”

सदाचार के एक आदमी ने आगे बढ़कर एक बैग उसकी तरफ़ बढ़ा दिया। आशीष से सारे काग़ज़ लेकर जाँच किए गए, फिर उन्हें एक डस्टबिन में फाड़कर डाल दिया गया—और साथ ही आग भी लगा दी गई।

और मैं बस देख रहा था… ख़ामोशी से।
और मैं कर भी क्या सकता था? मैं तो बस एक पेन ही था।

“तुम मुझे काम के आदमी लगते हो। काफ़ी न्यूज़ चैनलों के साथ तुम्हारे रिलेशन होंगे। तुम मेरे लिए काम करोगे।”
सदाचार ने आशीष के सामने एक कॉन्ट्रैक्ट रखा।
“तुम कभी मेरे ख़िलाफ़ कोई नेगेटिव रिपोर्ट किसी भी न्यूज़ चैनल को नहीं दोगे। बस मुझे दुनिया की नज़र में देवता बना दो—ताकि यह दुनिया मुझ पर आँख बंद करके विश्वास करती रहे। मीडिया में कितनी ताक़त है, यह मुझे पता है।”

और आशीष ने मुस्कुराकर कॉन्ट्रैक्ट के काग़ज़ उठा लिए।

“एक कॉपी साइन करके मुझे दो, एक तुम्हारे लिए।”

यह क्या हो रहा था…?

आशीष ने अपनी जेब की तरफ़ हाथ बढ़ाया। मुझे जेब से निकाला।
नहीं… यह क्या होने जा रहा था…?

न जाने कितने मासूमों की ज़िंदगी से खेलने वाले इस दरिंदे को यह इजाज़तनामा मैं किसी भी हालत में साइन नहीं करूँगा। इस काम के लिए मेरा जन्म तो नहीं हुआ था।
काश, मैं गोलू के खिलौनों वाले डिब्बे में ही हमेशा पड़ा रहता…
काश, परी दीदी मुझे ख़रीदकर न लाई होती…
काश, उस शराबी ने मुझे शराबख़ाने के मालिक को ही बेच दिया होता…
काश…

आशीष ने साइन करने के लिए जेब से पेन निकाला।
काग़ज़ अपने सामने रखा और जैसे ही साइन किए—

तो यह…
क्या पेन में स्याही ख़त्म हो चुकी थी…?

और उस लाल रंग के पेन ने, उस चमकदार हीरे वाले क़लम ने अपनी इज़्ज़त बचा ली थी।
वे ज़ालिम लोग न जाने कितने लोगों के ख़ून से उस क़लम को रंगने जा रहे थे…
अच्छा ही हुआ।

एक क़लम ने ख़ुद को बेइज़्ज़त होने से बचा लिया था।