Masum Chehra - Geeta - 4 in Hindi Crime Stories by Black Demon books and stories PDF | मासूम चेहरा - गीता - 4

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मासूम चेहरा - गीता - 4

सगाई के बाद शादी की बात निर्धारित की जाती है। 

गीता यह सोचते- सोचते मंत्र मुग्ध हो रही थी। की अब उसकी भी शादी होगी। हर किसी की तरह उसकी भी एक एक रस्म बडी धूम धूम धाम से होगी। रिश्तेदारों का आना जाना लगा रहेगा। ओर बिछड़े उन सभी लोगों से मिलने का मोका मिलेगा। जो आज तक नहीं मिले है। 

ओर कहीं न कहीं ये बात सही भी है। एक बार को लोग लड़के की शादी छोड़ देते है मगर ""अगर लडकी की शादी का रिश्ता मीलों दूर से भी आया होता है सभी लोग जाकर ही रहते है। ओर जो लोग नहीं जा पाते वो ज्यादा नहीं तो कम से कम अपनी क्षमता के अनुसार बेटी को मिलने वाला कन्यादान तो किसी न किसी के हाथों पहुंचा ही देते है। 

धीरे धीरे गीता के घर पीली चिट्ठी आती है। की आप के यहां विवाह इस दिन तय किया गया है। 

उस चिट्ठी में सब रस्म और दिनों का विवरण दिया हुआ था। 

ओर गीता भी इस बात से खुश हुए जा रही थी। की आखिर कार वो दिन आ ही गया की उसे भी अब। इस नर्क भरी जिन्दगी से अच्छा जीने का मोका मिलेगा। 

ऐसा नहीं है कि केवल गीता की ही शादी थी उस माह """"

और लड़कियों की भी शादी थी। ओर गीता भी शादियों में जाने के कारण सारे रस्म और रिवाज जानती थी। 

जब बहुत दिन हो गए उसके घर ना कार्ड छपे न कोई मेहमान आया। 

अब मेहमान तो तब आए जब उनको पता लगे कि आखिर बेटी की शादी है। या उनको कहीं से खबर मिलती।

बेचारी गीता इसी आस में रही की उसकी सहेलियां आएगी और वो उनके साथ खूब मौज मस्ती करेगी। 

अपने बचे कुचे कुछ दिन हस खेल कर उनके साथ बात करके बिता लेगी। 

मगर ना तो उसकी शादी में कोई मेहमान आया और ना ही कोई अड़ोसी पड़ोसी। 

गीता बस यह तकती रह गईं। उसकी हल्दी कब होगी। उसकी मेंहदी की रस्म कब होगी। उसपर तेल कब चढ़ेगा। 



गीता की अन्य सहेलियां इस बात का आश्वासन देकर जाती की तेरे घर रस्म होते ही हम तेरे पास सबसे पहले आ जायेंगी। ओर शादी की बंदिश के कारण वो घर से बाहर भी नहीं जा पा रही थी। उसका काम छूट गया था। 



गीता की सारी इच्छाएं यहां रखी की रखी रहे जा रही थी।

दिखाने को बस प्रसन्न थी। उसके दिमाग में बहुत सारे सवाल चल रहे थे। दिन प्रतिदिन उसका कलेजा आंसुओ से भरता जा रहा था। कई बार तो यहां आंसू इतने ज्यादा हो जाते की बह कर आंखों से बाहर ही आ जाते।

की आखिर उसकी शादी कैसी है। सामान्य क्यों नहीं है। धूम धाम क्यों नहीं है। 

माना हालात गरीबी वाले है। मगर इतने भी गरीब नहीं की रस्म और रिवाज ना कर पाए। 

वो अपनी मां से कहती भी,,,, कि मां मेरी शादी ऐसी क्यों है। 

मगर मां की खामोशी या बस बात को टालने के अलावा उनको कोई जवाब ना मिलता। 

उसकी मां बस एक बात कह देती अभी बहुत टाइम पड़ा है हो जायेगी तेरी सारी रस्म भी। तू चिंता क्यों करती है। 

गीता को रोना तक आ जाता की आखिर उसकी शादी कैसी शादी है।

उसे तीव्र इच्छा हो रही सब जानने की । अब आप को हम सब के जैसे उसके पास मोबाईल होता तो एक कॉल घुमाती और सारा मामला पूछ लेती वो अपने होने वाले पति से की ये सब चल क्या रहा है।

ये शादी बस दिखावा है या कुछ है भी। 

बहुत सवालों ने उसको घेरा हुआ था। 

क्या उसके पति के यहां भी सभी रस्मों रिवाज विधि पूर्वक संपन्न हो रहे होंगे। या उनके भी रश्मो और रिवाजों को यूंही टाला जा रहा होगी। 



जब सुहाग की मेंहदी ही नहीं होगी तो मेंहदी का रंग कैसे चढ़ेगा हाथों में। 

वो सोच रही थी। की उसकी भी मेहंदी होती। तब उसकी सहेलियां खूब नाचती और उसे तंग भी करती। आखिर वो भी तो अपनी सखियों की शादी ब्याह में उसकी पीली चिट्ठी से लेकर विदाई में साथ रोने तक शादी में चार चांद लगाया करती थीं। 



ओर आज उसकी ही शादी की रौनक गायब थी। 

सोच रही थी की उसकी मेंहदी में पति का नाम लिखा जाता बहुत गुप्त तरीके से छुपा कर और उसे चिढ़ाया जाता की तू तेरे पति का नाम ढूंढ कर बता तो सही। 



ओर उसे भी अपनी मेहंदी का रंग परखना था। की कीतना लाल या काला हो जाता है। वो भी मेहंदी के आधार पर अपने प्यार का अंदाजा लगाना चाहती थी की उसका पति उसको कितना प्यारा करेगा। 

ओर यहां उसके हाथों की मेहंदी ही गायब थी। सच में प्यार था भी या ये बस एक सौदा बन कर ही रह रहा था। 



गीता के घर में शादी जैसी कोई रौनक नहीं थी। सब बस हाथ पर हाथ रख कर बेठे थे। उतावले द तो बस बारात को लेकर।

कि कब गीता भी अजीब दुविधा में थी। सवालों ने उसे चारों तरफ़ से घेरा हुआ था। 



तभी शादी वाला अाखरी दिन आता है। गीता के पिता को एक इंसान बीस हजार की गड्डी पकड़ा जाता हैं। ओर कहता है की शादी की तयारी धूम धाम से करनी है। 



गीता के पिता एक। ही दिन में सारा इंतजाम कर देते हैं। जैसे उन्होंने पहले से सब तयार कर रखा था। इंतजार बस रुपयों का था। 

गीता के पिता बाजार जाते है। 

ओर अड़ोस पड़ोस में सबको निमंत्रण दिया जाता हैं। कि,,

आज गीता की सारी रस्में विधि पूर्वक संपूर्ण करवाई जाएंगी। 



उसकी। मां बताती हैं की नक्षत्र और ग्रह दशा ठीक नहीं थी इस वजह से ये सारे अवसर टाले जा रहे थे। आज का दिन सब के लिए शुभ हैं। 

ओर अड़ोसी पड़ोसी ज्यादा दिमाग़ न लगाते हुए खुशी ज़िंदगी में एक बार आने वाली खुशी में शामिल हो जाते है। 



गीता के पिता सारे सामान का इंतजाम कर देते है।

हल्दी,, तेल,, और मेहंदी सब का इंतजाम कर देते है। बारी बारी से के साथ सभी रश्म पुरी की जा रहीं थी। आज गीता का चेहरा खिला- खिला लग रहा था। 



मगर ये खुशी सच में खुशी ही थी या दिखावा

चलो देखते हैं अगले पार्ट में



To be continued...................