Invisible Drink - 3 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अदृश्य पीया - 3

Featured Books
Categories
Share

अदृश्य पीया - 3

सुनीति ऑफिस से वापस आती है। उसके चेहरे पर थकान और उदासी साफ झलक रही है।
आज ऑफिस में बॉस ने उसे डाँट दिया था। पहली बार उसे अपने आप पर भरोसा टूटा हुआ लगा।
कमरे में आते ही वो ज़मीन पर बैठ जाती है और बच्चों की तरह रोने लगती है।

सुनीति (रोते हुए) बोली - 
“मैं इतनी कोशिश करती हूँ… फिर भी सब मुझसे नाराज़ क्यों रहते हैं? क्या मैं सच में इतनी कमज़ोर हूँ?”

अचानक उसके सामने टेबल पर एक सफेद रूमाल रखा हुआ दिखता है, जो कुछ देर पहले वहाँ नहीं था।

सुनेति (चौंककर, धीरे से) बोली - 
“ये… ये रूमाल कहाँ से आया?”

वो डरते-डरते रूमाल उठाती है। आँसू पोंछती है। उसकी साँसें थोड़ी शांत हो जाती हैं।
थोड़ी देर बाद वो फोन उठाकर reels देखने लगती है। धीरे-धीरे उसका मूड हल्का हो जाता है। हँसी और उदासी के बीच वो थककर बिस्तर पर लेट जाती है। और नींद उसे घेर लेती है।

रात – कमरे में चाँदनी फैली है। सुनेति नींद में है। अचानक उसे महसूस होता है जैसे कोई उसे अपनी बाँहों में भरकर सो रहा है।
उसके कानों के पास गर्म साँसें गूँज रही थीं। इस बार वो डरने के बजाय… गहरी साँस लेती है।
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती है।

सुनीति (धीरे से, आँखें बंद रखते हुए) बोली - 
“मुझे अकेले सोना कभी पसंद नहीं था… लेकिन अब… ये अकेलापन कम लग रहा है।”

नींद में ही उसका हाथ हल्का-सा हवा में उठता है। और वो अदृश्य कौशिक का हाथ कसकर पकड़ लेती है।
उसे समझ नहीं आया कि वो सपना है या सच… पर उस स्पर्श में उसे वो सुकून मिला, जिसकी उसे बरसों से तलाश थी।
कमरे में हल्की फुसफुसाहट गूँजती है, बहुत धीमी – जो सिर्फ़ दिल सुन सकता है।

कौशिक (धीरे से) बोला - 
“तुम्हारे दर्द को बाँटने के लिए ही शायद किस्मत ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है… भले ही अदृश्य होकर।”

सुनीति गहरी नींद में मुस्कुरा देती है।

सुनीति अलमारी में अपना सामान ढूँढ रही है। अचानक हाथ दीवार से जुड़ी एक अटैच अलमारी से टकराता है। अलमारी थोड़ी ढीली लगती है।

सुनीति (हैरानी से) बोली - 
“ये… ये अलमारी तो मैंने पहले कभी नोटिस ही नहीं की।”

वो अलमारी खोलती है। अंदर एक पुराना बैग रखा है। धूल से ढका हुआ।
सुनीति धीरे-धीरे बैग बाहर निकालती है। थरथराते हाथों से उसे खोलती है।
अंदर से पुराने कपड़े, किताबें और कुछ तस्वीरें निकलती हैं।

सुनीति (तस्वीर देखते हुए, ठहरकर) बोली - 
“ये… यही है… यही तो वो चेहरा है जो हर जगह मुझे महसूस होता है।”

तस्वीर में एक बेहद हैंडसम लड़का – मुस्कुराता हुआ, मानो किसी राजकुमार जैसा।
सुनीति की आँखें चमक उठती हैं।)

सुनीति (धीरे से फुसफुसाकर) बोली - 
“कौशिक ठाकुर…”

सुनीति बैग से और कागज़ निकालती है। उसे मार्कशीट्स मिलती हैं। हर बार First Division, Topper. हर विषय में नंबर पूरे के पूरे। फं

सुनीति (आश्चर्य से) बोली - 
“इतना टैलेंटेड था ये… हर बार टॉप करता था।”

उसकी आँखों में गर्व और प्रशंसा झलकती है।
बैग में रखे पुराने कपड़े – साफ-सुथरे, करीने से तह किए हुए। सुनीति उन्हें छूकर अपने चेहरे से लगाती है। उनकी खुशबू को महसूस करती है वही खुशबू जो उसे हर रात मिलती थी।

सुनीति (आँखें बंद करके) बोली - 
“जैसे अभी भी इन कपड़ों में उसकी खुशबू बाकी है…”

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान और दिल में अनजाना अपनापन महसूस होता है।
आख़िर में बैग के सबसे नीचे से एक पुरानी डायरी निकलती है। उस पर सुनहरे अक्षरों में नाम लिखा है – Kaushik Thakur.
सुनेति की उंगलियाँ काँपने लगती हैं। उसकी साँसें रुक-सी जाती हैं।

सुनेति (फुसफुसाकर) बोली - 
“ये… ये उसकी डायरी है।”

वो डायरी सीने से लगाकर पल भर चुप रहती है, फिर धीरे-धीरे पहला पन्ना खोलती है।
सुनेति डायरी पढ़ने लगती है। और जैसे ही पहला पन्ना पलटती है, कमरे में हल्की-सी हवा बहती है।

कौशिक की आवाज़ (धीरे से, मानो डायरी से निकल रही हो) - 
“अगर किसी दिन कोई मेरी ये डायरी पढ़े… तो शायद उसे मेरी कहानी समझ आ पाएगी।”

सुनीति की आँखों में डर और जिज्ञासा दोनों चमकते हैं।

सुनीति (धीरे से) बोली - 
“कौशिक… ये तुम्हारी सच्चाई का दरवाज़ा है न?”

सुनीति बिस्तर पर बैठी है। उसके हाथों में कौशिक ठाकुर की डायरी है।
वो पन्ने पलटती है। हर पन्ने में कौशिक की मेहनत, सपने और उसकी तन्हाई लिखी हुई है।

सुनीति (धीरे से पढ़ते हुए) बोली - 
“आज फिर अकेलेपन ने मुझे घेर लिया। लेकिन मुझे यकीन है एक दिन मेरी मेहनत मुझे बड़ी पहचान दिलाएगी।”

वो पन्ना पलटती है। अगला हिस्सा पढ़ती है।

सुनीति बोली - 
“AI प्रोजेक्ट मेरी ज़िन्दगी बदल देगा… अगर ये कामयाब हुआ तो शायद मैं हमेशा के लिए दुनिया को बदल दूँगा।"

सुनीति की आँखों में हैरानी झलकती है।
वो कई पन्ने पढ़ती है, पर कहीं भी ये ज़िक्र नहीं कि कौशिक अचानक कहाँ गया, कैसे ग़ायब हुआ।

सुनीति (परेशान होकर) बोली - 
“डायरी में तो सब है… उसके सपने, उसकी मेहनत… लेकिन ये नहीं कि वो अचानक ग़ायब क्यों हो गया।”

उसके चेहरे पर झुंझलाहट और उलझन है।
सुनीति डायरी सीने से लगाकर बैठी है। उसकी आँखों से आँसू बहते हैं।

वो उसके सामने था, उसके बिल्कुल पास। लेकिन न सुनेति उसे देख सकती थी… न छू सकती थी।
कौशिक हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखता है।

कौशिक (धीरे से, मन ही मन) बोला - 
“काश… तुम मुझे देख पाती, सुनीति। काश… तुम जान पाती कि मैं तुम्हारे ही पास हूँ।”

सुनीति आँखें पोंछकर डायरी को कसकर पकड़ती है।

सुनीति (धीरे से) बोली - 
“कौशिक… मैं तुम्हें ढूँढकर रहूँगी। मुझे जानना ही होगा कि तुम अचानक कहाँ चले गए। ये रहस्य अब हमेशा रहस्य नहीं रहेगा।”

कौशिक उसकी बात सुनकर और भी गहरी मुस्कान बिखेरता है। उसकी आँखों में पहली बार उम्मीद की चमक है।
सुनीति घर पर है। बिस्तर पर सिकुड़ी हुई पड़ी है। चेहरे पर दर्द साफ झलक रहा है। आँखों से आँसू बह रहे हैं।

सुनीति (रोते हुए, धीमे स्वर में) बोली - 
“हे भगवान… ये दर्द सहा नहीं जाता। मैं अब और नहीं सह सकती…”

कमरे में घड़ी की सुइयाँ 2:30 AM दिखा रही हैं।
कौशिक वहीं मौजूद है, अदृश्य। उसकी आँखों में चिंता और अपनापन है।

वो भगवान के छोटे से मंदिर के पास जाता है। अचानक उसका हाथ सिंदूर की डिब्बी से टकरा जाता है। डिब्बी नीचे गिरती है और थोड़ा सा सिंदूर उसके हाथ में लग जाता है।
कौशिक सावधानी से सिंदूर को वापस डिब्बी में रखता है और सामने दीपक जला देता है। हल्की लौ पूरे कमरे को रौशन कर देती है।
कौशिक वापस सुनेति के पास आता है। धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरता है, जैसे उसे सुकून दे रहा हो।
उसके हाथ का सिंदूर अनजाने में सुनेति की मांग पर लग जाता है।
सुनीति रोते-रोते धीरे-धीरे सो जाती है।

सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से अंदर आती है। सुनीति नींद से उठती है, आलस से सिर पर हाथ रखती है।
अचानक उसकी उँगलियों पर लाल सिंदूर आ जाता है।

सुनीति (हैरान होकर) बोली - 
"ये… ये सिंदूर मेरी मांग में कैसे? मैंने तो… मैंने तो कभी नहीं लगाया…”

वो आईने की तरफ दौड़ती है। आईने में खुद को देखती है – उसकी मांग में साफ-साफ सिंदूर भरा हुआ है।

सुनेति (काँपते हुए, खुद से) बोली - 
“हे भगवान… ये क्या हो रहा है मेरे साथ? ये सिंदूर… यहाँ आया कैसे? क्या… क्या कौशिक…?”

पीछे कौशिक खड़ा है, उसकी आँखों में एक अजीब-सी गहराई है।
उस रात बिना बोले, बिना कहे… एक अदृश्य रिश्ता बन चुका था।
शायद किस्मत ने उनकी डोर बाँध दी थी।

सुनीति आईने में अपनी मांग देखती है। डर से पसीना बह रहा है। हाथ जोड़कर भगवान की मूर्ति के आगे बैठी है।

सुनीति (फुसफुसाते हुए) बोली - 
“मैं ये बात किसी से कहूँगी तो… कोई विश्वास नहीं करेगा। सब मुझे पागल समझेंगे।”

उसकी आँखें आँसुओं से भर जाती हैं।

अगले दिन – सुनीति ऑफिस के बाद अपने दोस्त तरुण को घर ले आती है। दोनों कमरे में बैठते हैं।

सुनीति (काँपती आवाज़ में) बोली - 
“तरुण… मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूँ। लेकिन प्लीज़ मज़ाक मत उड़ाना।”

तरुण (मुस्कुराकर) बोला - 
“अरे, हम दोस्त हैं। बता क्या हुआ?”

सुनीति (रोते हुए) बोली - 
“इस कमरे में कोई है… जो दिखता नहीं। लेकिन मैं हर रोज़ उसे महसूस करती हूँ। कभी मेरे बालों को छूता है, कभी आँसू पोंछता है… कल रात मेरी मांग में सिंदूर था, जो मैंने लगाया ही नहीं।”

तरुण चौंककर देखता है, फिर हँसने लगता है।

तरुण बोला था 
सुनीति, तुम्हें डॉक्टर की ज़रूरत है। ये सब दिमागी तनाव है।”

सुनीति ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती है।

सुनीति (बचपन की तरह रोते हुए) बोली - 
“मैं झूठ नहीं बोल रही… सच में कोई है।”

तरुण उसे संभालता है, उसका हाथ पकड़कर पास बिठाता है।
अचानक पीछे की टेबल पर रखा फूलदान अपने आप गिरकर टूट जाता है। तेज़ आवाज़ गूंजती है।
तरुण घबराकर उठ खड़ा होता है। उसकी आँखें फटी रह जाती हैं।

तरुण (हकलाकर) बोला - 
“ये… ये कैसे गिरा? यहाँ तो कोई नहीं था…!”

सुनीति काँपते हुए तरुण को देखती है।

सुनीति (धीरे से) बोली - 
“मैंने कहा था न… कोई है यहाँ।”

कमरे में हल्की-सी हवा बहती है। जैसे कोई अदृश्य मौजूदगी अपनी बात साबित कर रही हो।
तरुण धीरे-धीरे बैठ जाता है। उसका चेहरा अब गंभीर है।

तरुण बोला - 
सुनीति… शायद तुम सही कह रही हो। यहाँ वाकई कोई है… कोई जो तुम्हारे बहुत करीब है।”

सुनीति की आँखों में डर और आँसू दोनों हैं। कैमरा धीरे-धीरे कमरे में घूमता है। पृष्ठभूमि में कौशिक खड़ा है, उसकी आँखों में हल्की मुस्कान और दर्द दोनों हैं।
अब सुनेति अकेली नहीं थी। किसी और ने भी उसकी अदृश्य मोहब्बत को महसूस कर लिया था।