टीम धीरे-धीरे टूटी दीवार के रास्ते लैब के अंदर घुसती है। अँधेरा है, लेकिन मशीनों की धीमी-धीमी आवाज़ गूँज रही है। चारों तरफ़ तार, केमिकल के बड़े-बड़े कंटेनर और लाल-नीली लाइट्स।
राकेश (फुसफुसाकर) बोला -
“यही है वो जगह… जहाँ खतरनाक प्रयोग होते हैं।”
(अचानक दीवार पर लगी स्क्रीन अपने आप जल उठती है। उस पर अजीब कोड्स और फॉर्मूलों की झलक आती है। सुनेति ठिठक जाती है।)
सुनीति बोली -
“ये वही फॉर्मूला है… जो डायरी में लिखा था।”
(गुंजन कंप्यूटर हैक करने लगती है। तभी काँच के बड़े चैंबर में हल्की रोशनी होती है। सब चौंककर देखते हैं। चैंबर के अंदर कुछ इंसानी सिलुएट्स दिखाई देते हैं – लेकिन आधे शरीर अदृश्य और आधे सामान्य।)
राधिका (डरी हुई आवाज़ में) बोली -
“हे भगवान… ये तो… अधूरे इंसान जैसे हैं।”
तरुण (साँस रोककर) बोला -
“मतलब… कौशिक अकेला नहीं था… और भी लोग इस एक्सपेरिमेंट का शिकार हुए हैं।”
(राकेश और सुनीति एक अलमारी खोलते हैं। अंदर फाइलें और दस्तावेज़ हैं।
एक फाइल खोलते ही उसमें फोटो और रिपोर्ट मिलती है – कौशिक का नाम, उसकी मेडिकल रिपोर्ट और उस रात का पूरा रिकॉर्ड।)
सुनीति (आँखों में आँसू लिए) बोली -
“तो ये सच है… कौशिक को यहाँ से उठाकर ले गए थे।”
(अचानक पेन अपने आप अलमारी से गिरता है और डायरी के पन्ने पलटने लगते हैं। कौशिक लिखता है:)
डायरी पर लिखावट (कौशिक) बोला -
“मैंने तुम सबको यहाँ तक पहुँचाने के लिए ही रास्ता दिखाया था।
लेकिन असली खतरा अभी शुरू होगा।”
(गुंजन कंप्यूटर में डेटा कॉपी करती है। तभी स्क्रीन पर एक लाल चेतावनी चमकती है – “Intruder Detected”। जोरदार अलार्म बज उठता है।)
गुंजन (घबराकर) बोली -
“ओह नो! किसी ने हमें देख लिया है।”
(कमरे में लाल बत्तियाँ जलने लगती हैं। बाहर से भारी कदमों की आवाज़ आने लगती है। हथियारबंद गार्ड लैब की ओर दौड़ रहे हैं।)
तरुण (जोर से फुसफुसाकर) बोला -
“अब तो असली एक्शन शुरू हुआ… भागो!”
सच्चाई की पहली झलक उन्हें मिल चुकी थी।
पर अब वो रहस्य से ज़्यादा खतरे में थे।
क्या टीम बच पाएगी?
और क्या कौशिक को उसका इलाज मिल पाएगा?
(टीम लाल बत्तियों और गार्ड्स की आवाज़ों के बीच लैब से बाहर निकलती है। सब तेजी से दौड़ते हैं। कौशिक अदृश्य होकर उनका मार्गदर्शन करता है।)
तरुण (हँसते हुए सांस लेते हुए) बोला -
“वाह भाई… क्या रोमांच था!
मैंने तो सोचा था कि ये बस कहानी होगी, लेकिन ये तो लाइव एक्शन था।”
राकेश (अभी भी थोड़ा तनाव में) बोला -
“शांत! पहले घर पहुँचें, फिर सब कुछ चेक करेंगे।”
(टीम घर पहुँचती है। दरवाज़ा खुलता है और सब थके हुए कमरे में बैठते हैं। कौशिक धीरे-धीरे पेन से डायरी में लिखता है:)
डायरी पर लिखावट (कौशिक) बोला -
“एंटीडोट सुरक्षित है। अब बस इसे इस्तेमाल करना है।”
(राधिका और गुंजन खुश होकर एक-दूसरे को देखती हैं। सुनेति कौशिक की ओर देखती है और हल्की मुस्कान देती है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“तो अब सब ठीक हो जाएगा… सही?”
(अचानक सभी के मोबाइल में मैसेज आता है। स्क्रीन पर लाल अलर्ट और संदेश दिखाई देता है।)
मोबाइल स्क्रीन पर -
“अदृश्य एंटीडोट अब उपलब्ध नहीं है। स्टॉक समाप्त हो चुका है।”
(टीम चौंककर एक-दूसरे को देखती है। गुंजन का चेहरा सिकुड़ जाता है।)
गुंजन (धुँधली आवाज़ में) बोली -
“मतलब… हमारे पास था, और अब भी है…
लेकिन ये बस पल भर की खुशी थी… अब सब खत्म?”
तरुण (सिर पकड़कर) बोला -
“अरे भाई… ये क्या? इतनी मेहनत, इतना जोखिम, और अब…?”
सुनीति (धीरे से, आँसू भरे स्वर में) बोली -
“हमने जो सोचा था कि सब ठीक हो जाएगा… वो तो सिर्फ़ सपना था।
कौशिक, अब क्या होगा?”
(कौशिक पेन से धीरे-धीरे लिखता है:)
डायरी पर लिखावट (कौशिक) बोला -
“डरो मत… असली लड़ाई अब शुरू होती है।
हम हारेंगे नहीं… चाहे जितनी मुश्किल आए।”
(सुनीति पेन को छूती है। आँखों में आँसू हैं, पर चेहरा दृढ़ है।)
राकेश (धीरे से) बोला -
“ठीक है। अब तक सब कुछ हाथ आया,
लेकिन असली चुनौती अभी बाकी है।
हमें फिर से योजना बनानी होगी।”
एंटीडोट हाथ में था… लेकिन खुशियों का झटका बड़ा था।
टीम ने पहला मिशन पूरा किया था,
लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होने वाली थी।
कौशिक और सुनेति का अदृश्य प्रेम और टीम की हिम्मत ही उनका सहारा था।
(ड्रॉइंग रूम में सन्नाटा है। एंटीडोट की बोतल टेबल पर रखी है, लेकिन अब वो बेकार है।)
राधिका (थकी हुई आवाज़ में) बोली -
“अब सच में कुछ समझ नहीं आ रहा…
ना एंटीडोट है, ना कोई दूसरा रास्ता।”
राकेश (गंभीर होकर) बोला -
“मुझे फैक्ट्री में एक पुराने कलीग से मिलना है।
शायद कुछ पता चल जाए।”
गुंजन बोली -
“मैं लाइब्रेरी और ऑनलाइन रिसर्च ट्राय करती हूँ।”
तरुण बोला -
“मैं अपने कॉन्टैक्ट्स देखता हूँ… कोई तो होगा जो इस एक्सपेरिमेंट के बारे में जानता हो।”
(एक-एक करके सब बाहर निकल जाते हैं।)
(घर का दरवाज़ा बंद होता है। पूरा घर अचानक बहुत बड़ा और बहुत खाली लगने लगता है।)
जब सब चले गए…
तो सुनीति के चारों तरफ़ सिर्फ़ खामोशी बची थी।
और उसी खामोशी में डर फिर से लौट आया।
(सुनीति खिड़की बंद करती है, लाइट ऑन करती है।)
सुनीति (अपने आप से) बोली -
“सब ठीक है… मैं अकेली नहीं हूँ।
ये बस मेरा डर है।”
(लेकिन उसकी आवाज़ खुद उसे ही आश्वस्त नहीं कर पाती।)
(रात के 11:45 बजे। घड़ी की टिक-टिक बहुत तेज़ लग रही है।)
(सुनीति बिस्तर पर बैठी है। गीता उसके पास रखी है।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“कौशिक… अगर तुम यहीं हो…
तो आज मुझे अकेला मत छोड़ना।”
(कमरे में हल्की-सी हवा चलती है। पर्दा हिलता है।)
(सुनीति की सांस तेज़ हो जाती है।)
(लाइट अचानक हल्की-सी फ्लिकर करती है।)
(सुनीति को महसूस होता है जैसे कोई उसके पास आकर बैठ गया हो।)
सुनीति (कांपती आवाज़ में) बोली -
“क…कौशिक?”
(कोई दिखाई नहीं देता,
लेकिन उसके कंधे पर हल्का-सा दबाव महसूस होता है।)
वही जाना-पहचाना अहसास…
वही साँसों की गरमी…
लेकिन आज डर ज़्यादा था, सुकून कम।
(सुनीति के आँसू बहने लगते हैं।)
सुनीति (रोते हुए) बोली -
“मैं थक गई हूँ कौशिक…
हर रोज़ उम्मीद, हर रोज़ डर।
अगर तुम्हें कभी वापस नहीं ला पाए… तो?”
(अचानक कोई उसके आँसू पोंछता है।)
(सुनीति सिहर जाती है।)
सुनीति बोली -
“मुझे डर लग रहा है…
आज सच में बहुत डर लग रहा है।”
(टेबल पर रखा पेन अपने आप हिलने लगता है।)
पेन पर लिखावट (कौशिक) बोला -
“डरो मत सुनीति।
जब तक मैं हूँ…
तुम कभी अकेली नहीं रहोगी।”
(सुनीति पेन को सीने से लगा लेती है।)
सुनीति (आँखें बंद करके) बोली -
“बस आज की रात…
मेरे पास रहो।”
(हवा का हल्का झोंका, जैसे किसी ने उसे बाँहों में ले लिया हो।)
जब सारी दुनिया बाहर चली गई थी…
तब भी एक अदृश्य प्यार
सुनीति के साथ जाग रहा था।
लेकिन क्या ये प्यार उसे बचा पाएगा…
या अगली सुबह कोई नया तूफ़ान लेकर आएगी?
रात के 2:17 बजे। पूरा घर बिल्कुल शांत। बाहर कुत्तों के भौंकने की दूर की आवाज़।
(सुनीति बिस्तर पर बैठी है। नींद नहीं आ रही। आँखें लाल हैं।)
सुनीति (अपने आप से, धीमे से) बोली -
“आज सब चले गए…
और आज डर कुछ ज़्यादा ही लग रहा है।”
(वो साइड टेबल से अपना नंबर वाला चश्मा उठाती है।)
उसे आदत थी…
सोने से पहले चश्मा उतार देने की।
लेकिन आज… न जाने क्यों… उसने पहन लिया।
(सुनीति जैसे ही चश्मा पहनती है, कमरे का माहौल बदल जाता है।)
(हवा भारी हो जाती है।
कमरे की लाइट स्थिर हो जाती है।)
(सुनीति सामने देखती है…
और अचानक उसकी साँस अटक जाती है।)
सुनीति (फुसफुसाकर, कांपती आवाज़ में) बोली -
“…कौ… कौशिक?”
(उसके सामने, बिस्तर के पास…
एक पूरा इंसानी रूप खड़ा है।
धुंधला नहीं।
डरावना नहीं।
बल्कि… शांत… उदास… और बेहद सुंदर।)
(कौशिक वही है जैसा फोटो में था—
सीधी आँखें, सादा कपड़े, चेहरे पर हल्की थकान।)
कौशिक (धीमे, सच्चे स्वर में) बोला -
“तुम… मुझे देख पा रही हो?”
(सुनीति की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।)
सुनीति बोली -
“मैं पागल नहीं थी…
तुम सच में यहाँ थे…
हर वक्त…”
(वो धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।)
(सुनीति काँपते हाथ से कौशिक की ओर हाथ बढ़ाती है।)
(इस बार…
उसका हाथ खाली हवा में नहीं जाता।)
(उसे कौशिक की उँगलियों की गर्माहट महसूस होती है।)
(हमेशा तो बस कौशिक ही उसे छू सकता था पर आज वो भी उसे छू सकती थी।)
सुनीति (रोते हुए) बोली -
“मैं तुम्हें छू भी सकती हूँ…”
कौशिक (हल्की मुस्कान के साथ) बोला -
“क्योंकि तुम मुझे देख पा रही हो।”
(सुनीति अचानक चश्मा उतार देती है।)
(कौशिक गायब।)
(वो घबरा जाती है और तुरंत फिर चश्मा पहन लेती है।)
(कौशिक फिर सामने।)
सुनीति (हक्की -बक्की होकर) बोली -
“मतलब…
ये चश्मा…?”
कौशिक (सिर हिलाकर) बोला -
“हाँ।
ये सिर्फ़ नंबर का चश्मा नहीं है।”
कौशिक बोला -
“जिस एक्सपेरिमेंट का मैं शिकार हुआ…
उसमें लाइट स्पेक्ट्रम और ह्यूमन विज़न को बदला गया था।
मैं अब उसी फ्रिक्वेंसी पर हूँ
जो आम आँखें नहीं देख सकतीं।”
सुनीति (धीरे से) बोली -
“तो फिर मैं…?”
कौशिक बोला -
“तुम्हारी आँखें नहीं…
तुम्हारा चश्मा।”
(सुनीति भ्रमित है।)
सुनीति बोली -
“लेकिन बाकी कोई क्यों नहीं देख सकता तुम्हें?”
कौशिक (गंभीर होकर) बोला -
“क्योंकि…
उस रात लैब से भागते समय
मैंने सिर्फ़ तुम्हारा चश्मा छुआ था।”
(सुनीति सन्न रह जाती है।)
कौशिक बोला -
“वही चश्मा उस स्पेक्ट्रम से ट्यून हो गया।
और…
तुम्हारे अलावा
किसी और ने वो चश्मा पहना ही नहीं।”
(सुनीति की आँखों में डर नहीं…
अब सिर्फ़ भावनाएँ हैं।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“तो इसका मतलब…
मैं ही तुम्हें इस दुनिया से जोड़ सकती हूँ?”
कौशिक (नज़रें झुकाकर) बोला -
“हाँ।
और शायद…
तुम ही मुझे वापस भी ला सकती हो।”
उस रात सुनीति को सिर्फ़ एक राज़ नहीं मिला…
उसे एक ज़िम्मेदारी मिली।
एक अदृश्य इंसान की
दिखने की इकलौती वजह बनने की।
और एक ऐसे प्यार की शुरुआत हुई
जो दुनिया की किसी नज़र में नहीं था…
सिवाय उसकी।