बगावत के सुर
शहर में खबर फैल गई कि स्टेशन की जमीन पर काम फिर से शुरू हो गया है। इस बार पृथ्वी राठौर खुद अपनी जिप्सी लेकर वहां तैनात था, और उसके साथ भारी पुलिस बल था। यह सीधा चैलेंज था भानु प्रताप ठाकुर की सल्तनत को।
हवेली का कोहराम
भानु प्रताप के खास आदमी, कालिया ने रात वाली पूरी बात ठाकुर साहब के कानों में डाल दी थी। हवेली के बैठक में सन्नाटा था, लेकिन भानु प्रताप की आँखों में अंगारे दहक रहे थे।
"सनाया!" भानु प्रताप की आवाज गूँजी।
सनाया सीढ़ियों से नीचे उतरी, उसने देखा कि उसके पिता की लाइसेंसी बंदूक मेज पर रखी थी।
"क्या तुम कल रात उस राठौर के लड़के से मिली थी?" भानु प्रताप ने बिना उसकी ओर देखे पूछा।
सनाया ने एक पल की झिझक के बाद सिर ऊंचा किया। "हाँ, मिली थी। और जो उसने दिखाया, अगर वो सच है पापा, तो आप सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं लड़ रहे, आप तबाही का सामान इकट्ठा कर रहे हैं।"
चटाख! भानु प्रताप का हाथ सनाया के चेहरे पर पड़ा। हवेली के नौकर-चाकर अपनी जगह पर जम गए। 25 सालों में पहली बार ठाकुर साहब ने अपनी बेटी पर हाथ उठाया था।
"खून में गद्दारी भर गई है तेरे! उस राजवीर के बेटे ने तुझ पर ऐसा जादू किया कि तू अपने बाप के खिलाफ खड़ी हो गई? आज वो जमीन खून मांगेगी। और याद रखना, अगर तूने बीच में आने की कोशिश की, तो मैं भूल जाऊंगा कि तू मेरी बेटी है।"
मैदान-ए-जंग
दोपहर की तपती धूप में दरभंगा का वो स्टेशन वाला इलाका छावनी बन चुका था। एक तरफ पृथ्वी अपनी टीम के साथ खड़ा था, और दूसरी तरफ से दर्जनों गाड़ियों का काफिला धूल उड़ाता हुआ आया।
गाड़ियों से भानु प्रताप के हथियारबंद गुंडे उतरे। सबसे आगे भानु प्रताप ठाकुर खुद अपनी राइफल लिए खड़े थे।
"पृथ्वी राठौर! बहुत जी लिया तूने। आज तेरा हश्र भी तेरे बाप जैसा ही होगा—शहर छोड़कर भागने लायक भी नहीं बचेगा।" भानु प्रताप ने ललकारा।
पृथ्वी ने अपनी टोपी ठीक की और शांति से आगे बढ़ा। "ठाकुर साहब, ये 1999 नहीं, 2024 है। यहाँ आपकी लाठी नहीं, मेरा कानून चलेगा। पीछे हट जाइए, वरना सरकारी काम में बाधा डालने के जुर्म में मुझे कड़े कदम उठाने पड़ेंगे।"
"कानून मेरी जेब में रहता है!" भानु प्रताप ने चिल्लाकर अपनी राइफल तानी।
तभी एक गाड़ी तेजी से बीच में आकर रुकी। उसमें से सनाया उतरी। उसका चेहरा सूजा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में अब कोई डर नहीं था।
सनाया का फैसला
सनाया सीधे अपने पिता और पृथ्वी के बीच में जाकर खड़ी हो गई।
"हट जा सनाया! आज इसके खून से तिलक होगा," भानु प्रताप दहाड़े।
सनाया ने पृथ्वी की तरफ देखा, जिसकी आँखों में उसके लिए चिंता थी, फिर अपने पिता की तरफ देखा। उसने अपनी कमर से एक फोल्डर निकाला और उसे हवा में लहराया।
"ये वो फाइल नहीं है जो पृथ्वी ने मुझे दी थी। ये वो सबूत हैं जो मैंने आज सुबह आपके गुप्त तहखाने से निकाले हैं। पापा, अगर आपने आज गोली चलाई, तो ये सारे सबूत सीधे आईजी (IG) ऑफिस पहुँच जाएंगे। मैं आपको जेल जाने से नहीं बचा पाऊंगी।"
भानु प्रताप हक्के-बक्के रह गए। "तू... तू अपने बाप को जेल भेजेगी?"
सनाया की आँखों में आँसू थे, पर आवाज पत्थर जैसी सख्त। "मैं आपको एक कातिल और गद्दार बनने से रोक रही हूँ। पुलिस ऑफिसर राठौर अपना काम कर रहे हैं, और आप उन्हें करने देंगे।"
अंतिम वार
भानु प्रताप का अहंकार उनकी समझ पर भारी पड़ गया। उन्होंने सनाया को धक्का दिया और पृथ्वी पर निशाना साधा। "तो पहले तू ही मरेगा!"
डिश्शूं! गोली चली। लेकिन गोली पृथ्वी को नहीं लगी। आखिरी पल में पृथ्वी ने भानु प्रताप के हाथ पर सटीक निशाना लगाया और उनकी राइफल दूर जा गिरी। पुलिस ने तुरंत घेरा बनाया और भानु प्रताप के गुर्गों को सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया।
हथकड़ी जब भानु प्रताप के हाथों में लगी, तो पूरे दरभंगा ने चैन की सांस ली। भानु प्रताप ने जाते-जाते पृथ्वी और सनाया को देखा। उनकी हार सिर्फ कानून से नहीं, अपनी ही बेटी की नैतिकता से हुई थी।
उपसंहार (Ending)
शाम ढल रही थी। स्टेशन की जमीन पर काम के लिए आई मशीनें शांत खड़ी थीं। सनाया वहीं एक पत्थर पर बैठी रो रही थी। उसका घर टूट चुका था, उसका पिता अपराधी साबित हो चुका था।
पृथ्वी उसके पास आया और चुपचाप बैठ गया। उसने जेब से वही पुराना रुमाल निकाला जो 25 साल पहले उसके घुटने पर बांधा था।
"अब तो रोना बंद करो, सनाया। अब और चोट नहीं लगेगी," पृथ्वी ने धीमे से कहा।
सनाया ने उसकी तरफ देखा। "तुमने सब खत्म कर दिया, पृथ्वी।"
"नहीं," पृथ्वी ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, "मैंने सिर्फ वो गंदगी साफ की है जिसने हमारी दोस्ती को दुश्मनी में बदला था। अब इस जमीन पर स्टेशन बनेगा, और शायद... एक नई कहानी भी।"
सनाया ने पृथ्वी का हाथ थाम लिया। दुश्मनी की वो पुरानी चोट अब भरने लगी थी। दरभंगा की हवाओं में अब खौफ नहीं, एक नई शुरुआत की महक थी