Shrapit ek Prem Kahaani - 35 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 35

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 35

वर्शाली को देखकर एकांश कहता है--

>" वर्शाली तुम यहां ?


 वर्शाली एकांश से कहती है----


>" हाँ जी मैं यहां आपके लिए आई हूँ। एकांश जी आप वहां मेला में मत जाओ। वहां पर खतरा है। 


एकांश कहता है---

>" तुम्हे ये सब कैसे पता , और हां वर्शाली मुझे पता है। 


वर्शाली कहती है----


>" ये जानते हुए भी के कुंम्भन मुक्त हो चुका है और वो अब सबको मारने लगा है। तब भी आप वहाँ जाना चाहते हो और कुम्भन अब वो शांत नहीं होगा। क्योंकी राजनगर का रक्षा कवच अब नहीं रहा इसीलिए वो राजनगर के सभी मनुष्य को मारने लगा है और ये मेला उसी क्षेत्र में आता है। इसिलिए आप वहाँ नहीं जाएंगे। वो अपनी पुत्री को श्राप से मुक्त करने के लिए कुछ भी कर सकता है क्योंकि उसके पास अब ज्यादा समय सेस नहीं है।


 चतुर वर्षाली को बस देखे जा रहा था। क्योंकी वर्शाली जैसी सुंदर लड़की उसने आज तक नहीं देखा था। एकांश के मुह से वर्शाली नाम सुनकर चतुर हैरान था। तभी आलोक वर्शाली से कहता है---


>" पर वर्षाली हमारा वहाँ जाना बहुत जरुरी है। क्योंकि वहाँ पर एकांश का पूरा परिवार गया हुआ है। इसिलिए हमे जाना पड़ेगा। 


आलोक की बात सुनकर वर्शाली कहती है--


>" ठीक है तब मेैं भी आपके साथ चलूंगी। 


एकांश कहता है--


>" नहीं वर्शाली मेरे वजह से तुम किसी खतरे में पड़ो ये मैं कभी नहीं चाहता इसिलिए मैं तुम्हें नहीं ले जा सकता। अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाऊंगा और फिर मैं तुम्हारे परिवार वालो से क्या कहूँगा।


एकांश के कहने पर भी वर्शाली एकांश से बार बार ज़िद करने लगती है। तो आलोक बाइक से उतर कर चतुर में साथ जाता है और वर्शाली एकांश के साथ जाती है। सभी वहा से बाइक स्टार्ट करके मेला में जाने लगता है।

कुछ दैर में सभी मेला पँहुच जाता है और एकांश के परिवार को ढूंढने लगता हैं। पर भीड़ ज्यादा होने में कारण उन लोगो को ढुंढने में काफी परेसानी हो रही थी। मेला में सभी वर्शाली को ही देखने लगता है। एकांश को लोगो पर गुस्सा भी बहोत आ रहा था । वो लोग वर्शाली को एक टक दैखे जा रहा था ।


क्योंकी वर्षाली जैसी सुंदर लड़की किसी ने नहीं देखा था। वर्शाली के कपड़े भी अलत ढंग के थे । जिसमे से वर्शाली का कमर , नाभी दिख रहा था । इसिलिए मेला के लोग बार बार वर्षाली के करिब से गुज़रने लगता है।


जिससे वर्शाली को काफी परेसानी हो रही थी। तभी एकांश वर्शाली का हाथ पकड़कर एक कपड़े के दुकान पर ले जाता है और वर्शाली के लिए कपड़ा खरीदने लगा है। 


एकांश एक लाल रंग की साड़ी वर्शाली के चुनता है। वर्शाली एकांश से पूछती है---

>" ये किसके लिए है एकांश जी ? 

एकांश कूछ नही कहता है । एकांश वर्शाली को ट्रायल रूम मे ले जाकर कहता है ---


>" ये लो और इसे पहन लो । 


वर्शाली कहती है ---

वाह कितने सुंदर वस्त्र हैं मैं इसे अपने महल मे पहनुगीं।


 एकांश कहता है ---

>" घर मे नही तुम यही पहनोगी । 


वर्शाली पूछती है---


>" पर क्यों एकांश जी।


 एकांश बहाने बनाकर कहता है---

>" तुम इन कपड़ो मे अच्छी नही लग रही हो इसिलिए। 


वर्षाली समझ जाती है के एकांश क्यो उसे कपड़े बदलने को बोल रही है।

 वर्षाली कहती है---


>" पर एकांश जी मुझे तो ये कपड़े पहना भी नही आती है। तो मै क्या करू इसिलिए मैं कह रही थी के ।


 वर्शाली के इतना कहते ही एकांश बिच मे ही बात को काटकर कहता है---

>" लाओ मैं पहना देता हूँ ।

इतना बोलकर एकांश वर्शाली से साड़ी ले लेता है , एकांश का बात सुनकर वर्शाली सरमाते कहती है--

आप कैसे एकांश जी आप तो पूरूष हो ना तो आप कैसे मेरा वस्त्र बदलेगें । अगर आपने मेरा वो सब दैख लिया तो ?


एकांश के पास इसका कोई जवाब नही था तब वर्शाली एकांश के कान मे कहती है ---

>" मैं तो ऐसे ही बोल रही थी । मुझे आप कैसे भी दैख सकते है ।

एकांश कहता है ---


>" बाहर जो तुम्हे इतने लोग घुर - घुर कर दैख रहे है उसका कुछ नही।


 इतना बोलकर एकांश वर्शाली के साथ ट्रायल रूम मे घूस जाता है और वर्शाली को अपने कपड़े उतारने को कहता है---


>" वर्शाली अपने कपड़े उतारो ।

 सरमाने लगती है तो एकांश कहता है ---

>" ठीक है मैं अपनी आंखे बंद करके रखता हूँ और तुम कपड़े उतारो। 


वर्षाली कहती है-- 

>" पर आप अगर आंखे बंद रखेगें तो मुझे वस्त्र कौन 
पहनाएगा। 

एकांश वर्शाली के सवाल से चूप हो जाता है। वर्शाली फिर कहती है---

>" अऱे हर बार इतना गहरी सौच मे क्यू चले जाते है । अगर मुझे आपके साथ कोई परेसानी होती तो मैं यहां पर आपके साथ अकेली नही आती । आप मुझे एक बार दिखा दिजिए, उसके बाद मैं खुद पहनलूगी ।

एकांश वर्शाली को खुद पर साड़ी को पहनकर दिखा देता है वर्शाली एकांश से कपड़ा ले लेती है और वर्शाली अपने कपड़े उतारने लगती है और एकांश अपनी आखें बंद करके रखा था ।

वर्शाली पहले पेटी कोट पहनती है फिर साड़ी को जैसे एकांश ने दिखाया था वैसे ही पहनती है , अंत मे वर्शाली जानबूझकर एकांश से कहती है ---

>" एकांश जी मैने पूरा पहन तो लिया बस यही पर समझ मे नही आ रहा है । अब आप पहना दिजिए एकांश जी ।


एकांश अपनी आंखे खोलता है तो दैखता है के वर्शाली साड़ी तो पहन ली थी पर उसको साड़ी का गुच्छा समेटना नही आता था , तब एकांश वर्शाली के पास जाता है और साड़ी का गुच्छा पकड़कर समेटने लगता है एकांश वर्शाली के कमर के बहोत करिब था , 


वर्शाली गोरा कमर और नाभी उसके बिल्कुल पास थे , एकांश का हाथ कांप रहा था क्योकी वर्शाली की खुबशरती थी ही ऐसी । एकांश के चेहरे पर से पसीने के बूदें टपक रही थी । 

तब वर्शाली कहती है ---

>" क्या हूआ एकांश जी , आपके हाथ क्यो कांप रहे है ?

एकांश जैसे तैसे अपने आपको संभालता है और साज़ी का गुच्छा वर्शाली के नाभी के निचे डाल देता है , जिससे एकांश वर्शाली के कमर को पहली बार छु रहा था , वर्शाली भी जौर की आंहे भरती है । 

एकांश उठता है और वर्शाली के आगे के उभार को ढक देता है ताकि अब लोगो को वर्शाली की ना उभार दिखे और ना कमर ।


वर्शाली साड़ी मे बहोत खूबसुरत लग रही थी। एकांश बस वर्षाली को दैखे जा रहा था तभी एकांश वर्शाली का चैहरा ढक देता है ताकि कोई वर्शाली का चेहरा ना दैख पाए। 


अब वर्शाली के सिर्फ आंखें ही दिखाई देती है। एकांश कहता है---


>" कितने बेसरम है सबके सब। ये लोग तो देत्यो से 
भी खतरनाक है, कैसे घुर रहे हैं तुम्हें। 

वर्शाली हंस कर कहती है---


>" क्यूं एकांश जी आपको बुरा लग रहा है। 


एकांश कहता है---

>" हां बहुत बुरा लग रहा है। कोई तुम्हारी तरफ देखे ये मुझे अच्छा नहीं लगता। 


तब चतुर कहता है--

>" एकांश क्या ये वही वर्शाली है जिसके बारे में तुमने बताया था। 


एकांश कहता है---

>" क्यूं अब जब सामने है तब विश्वास हो रहा है। जब में बोल रहा था तब विश्वास नहीं हो रहा था ।


 चतुर चुप हो जाता है वो समझ जाता बै के इससे आगे पूछना ठीक नही रहेगा। इतना बोलकर सभी इंद्रजीत और बाकी को ढुंडने लगता है। कुछ दैर ढूंढने के बाद वर्शाली कहती हैं-- 


>" एकांश जी वो देखीए कुंम्भन।


To be continue.....515