भाग – 12
गाँव की मिट्टी
आज सृष्टि के पैरों को
पहले जैसी नहीं लगी।
न डर था,
न अपनापन—
बस एक ठोस सच्चाई।
अंकित उसके साथ था,
लेकिन यह लड़ाई
उसे खुद लड़नी थी।
गाँव में उनके आने की खबर
आग की तरह फैल गई।
“विधवा लौट आई है…”
“साथ में वही लड़का है…”
“अब क्या नया तमाशा होगा?”
ये फुसफुसाहटें
सृष्टि ने सुनीं,
लेकिन इस बार
उसने सिर नहीं झुकाया।
वह सीधे
अपने पुराने घर के सामने खड़ी हुई।
दरवाज़ा वही था,
लेकिन उसके अंदर जाने की हिम्मत
अब उसके भीतर थी।
सास ने दरवाज़ा खोला।
एक पल के लिए
उनकी आँखों में
अपराध चमका।
उनकी आवाज़ लड़खड़ाई।
तुम
सृष्टि ने साफ़ कहा,
मैं,
“सच लेकर आई हूँ।”
घर के आँगन में
लोग इकट्ठा होने लगे।
पंचायत अपने-आप
बैठ गई।
देवर भी आ गया।
उसकी आँखें
झुकी हुई थीं।
सृष्टि ने पहली बार
सबके सामने
बोलना शुरू किया—
“मेरे पति की मौत
एक दुर्घटना थी,
यह मैंने भी माना।
लेकिन उससे पहले
मेरी ज़िंदगी
एक डर बन चुकी थी।”
सन्नाटा छा गया।
“मैंने कभी शिकायत नहीं की,”
वह बोली,
“क्योंकि मुझे सिखाया गया था—
औरत सहती है।”
अंकित ने
कुछ नहीं कहा।
यह मंच
सृष्टि का था।
देवर ने आगे बढ़कर
कहा—
“भाभी सच कह रही हैं।
भैया बीमार नहीं थे—
वह गुस्से में थे।
और घर में
सब जानते थे।”
लोगों की आँखें
नीची होने लगीं।
सास रो पड़ीं।
उन्होंने कहा,
“हम डर गए थे,”
“समाज से।
इज़्ज़त से।”
सृष्टि ने
धीरे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—
“इज़्ज़त
किसी की चुप्पी से नहीं,
सच से बचती है।”
यह बात
किसी तमाचे से कम नहीं थी।
पंचायत ने
कोई फैसला नहीं सुनाया।
क्योंकि यह मामला
अब पंचायत का नहीं था—
यह एक औरत की गवाही थी।
गाँव में
पहली बार
किसी विधवा को
सुना गया था।
शाम तक
खबर फैल चुकी थी।
लोगों की बातें बदलीं—
कुछ शर्मिंदा थे,
कुछ अब भी असहज।
लेकिन सृष्टि को
उनकी मंज़ूरी नहीं चाहिए थी।
उसने
बस अपने नाम से
एक बोझ उतार दिया था।
रात को
अंकित ने पूछा—
“अब कैसा लग रहा है?”
सृष्टि ने
आँखें बंद कीं।
“हल्का,”
उसने कहा,
“जैसे सालों बाद
साँस ली हो।”
लेकिन एक सवाल
अब भी बाकी था।
अब जब
अतीत साफ़ हो गया,
तो भविष्य क्या होगा?
शादी?
या
एक ऐसी ज़िंदगी
जो किसी दबाव से नहीं,
खुद की शर्तों पर चले?
सृष्टि ने
आकाश की तरफ़ देखा।
अब वह
डर से नहीं,
खुली आँखों से
आगे देख पा रही थी।
लेकिन असली फैसला
अब सामने था।
गाँव से लौटते समय
बस की खिड़की से बाहर देखते हुए
सृष्टि को पहली बार
रास्ते लंबे नहीं लगे।
शायद इसलिए
क्योंकि अब
वह भाग नहीं रही थी।
उसने सच कह दिया था।
और सच कहने के बाद
जो सन्नाटा मिलता है,
वह डरावना नहीं—
शांत होता है।
अंकित उसके पास बैठा था।
पूरे रास्ते
उसने कुछ नहीं पूछा।
क्योंकि कुछ सवाल
अब ज़रूरी नहीं रह जाते।
शहर लौटते ही
सृष्टि अपने काम में
और डूब गई।
सिलाई मशीन की आवाज़
अब सिर्फ़ रोज़गार नहीं,
उसकी पहचान बन चुकी थी।
एक दिन
स्थानीय महिला संगठन की
दो औरतें आईं।
“हमने आपके बारे में सुना है,”
उन्होंने कहा,
“आप चाहें तो
हम आपके काम को
आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।”
सृष्टि चौंक गई।
पहली बार
किसी ने उसे
दया से नहीं,
सम्मान से देखा था।
उधर
अंकित को भी
ऑफिस में
एक ट्रांसफर का प्रस्ताव मिला।
“दूसरे शहर में,”
उसने सृष्टि को बताया,
“बेहतर पद…
ज़्यादा पैसा मिलेगा।”
सृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा।
पहले वाली सृष्टि होती,
तो डर जाती।
लेकिन अब
उसने सवाल किया—
“तुम क्या चाहते हो?”
अंकित मुस्कुराया।
“मैं तुम्हारे साथ
एक ज़िंदगी चाहता हूँ,”
उसने कहा,
“शहर कोई भी हो।”
उस रात
वे दोनों छत पर बैठे।
हवा में
अब सवाल कम थे,
संभावनाएँ ज़्यादा।
सृष्टि ने कहा,
“अगर हम शादी करें,”
“तो शर्तों के साथ।”
अंकित चौंका नहीं।
“मैं तुम्हारी पत्नी बनूँगी,”
वह आगे बोली,
“लेकिन अपनी पहचान के साथ।
मेरा काम,
मेरे फैसले,
मेरी आवाज़—
सब मेरे रहेंगे।”
अंकित ने बिना रुके कहा—
“और मैं तुम्हारा पति बनूँगा,
लेकिन तुम्हारा मालिक नहीं।”
सृष्टि की आँखें भर आईं।
“और अगर
कभी मुझे लगे
कि मैं फिर से
खुद को खो रही हूँ,”
उसने कहा,
“तो मैं रुक जाऊँगी।”
अंकित ने उसका हाथ थाम लिया।
“और मैं रुकने दूँगा,”
उसने कहा।
यह कोई फिल्मी प्रस्ताव नहीं था।
न घुटनों पर बैठना,
न शोर।
बस
दो इंसानों का
एक सच।
🔚 भाग – 13 (फाइनल पार्ट)
अंतिम भाग में कहानी पहुँचेगी
उस मोड़ पर जहाँ
शादी सिर्फ़ रस्म नहीं,
एक विचार बनेगी।
भाग–13 में सामने आएगा—
शादी का अनोखा फैसला
समाज की अंतिम प्रतिक्रिया
और वह अंत
जो बताएगा—
क्या सृष्टि और अंकित की कहानी
एक प्रेम-कथा बनकर खत्म होगी,
या
एक मिसाल बनकर शुरू होगी?
कहानी का अंत जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए ।
BY.................Vikram kori..