A new ray of hope in Hindi Short Stories by Jeetendra books and stories PDF | उम्मीद की एक नई किरण

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उम्मीद की एक नई किरण

शहर की भीड़भाड़ से दूर, एक पुराने जर्जर मकान की बालकनी में बैठे अविनाश के चेहरे पर गहरी चिंता की लकीरें खिंची हुई थीं। उसके हाथ में एक लिफाफा था, जिसे वह बार-बार खोलता और फिर बंद कर देता। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कोई समुद्र अपनी लहरों को बांधने की कोशिश कर रहा हो। तभी अंदर से उसकी पत्नी ममता की आवाज़ आई।
ममता: "अविनाश, चाय ठंडी हो रही है। कब तक वहाँ बैठे रहोगे? क्या सोच रहे हो?"

अविनाश ने एक लंबी सांस ली और अंदर आते हुए बोला, "कुछ नहीं ममता, बस सोच रहा था कि वक्त कितनी जल्दी बदल जाता है। कल तक हम सब साथ थे, और आज..."

ममता ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसकी आँखों में करुणा और थोड़ी लाचारी थी। उसने धीमे स्वर में कहा, "मैं जानती हूँ तुम उस जमीन के सौदे को लेकर परेशान हो। लेकिन क्या सच में उसे बेचना ही एकमात्र रास्ता है? हमारे पुरखों की निशानी है वह।"

अविनाश चिढ़कर बोला, "तो और क्या करूँ ममता? बिटिया की शादी है, बेटे की पढ़ाई का कर्ज है। क्या ये पुरानी दीवारें हमें खाना खिलाएंगी? भावनाओं से पेट नहीं भरता।"

इसी बीच उनका बेटा साहिल कमरे में दाखिल हुआ। साहिल के चेहरे पर एक अलग ही तेज था, लेकिन आज वह थोड़ा गंभीर लग रहा था। उसने अपने पिता की बात सुन ली थी।

साहिल: "पापा, आप उस जमीन को बेचने की बात कर रहे हैं जिसे दादाजी ने अपने पसीने से सींचा था? क्या आपको लगता है कि पैसा ही सब कुछ सुलझा देगा?"
अविनाश ने गुस्से में साहिल की तरफ देखा, "तुम अभी छोटे हो साहिल। दुनिया की हकीकत नहीं जानते। जब कर्ज का बोझ सिर पर आता है, तब आदर्शों की बातें अच्छी नहीं लगतीं।"

साहिल शांत रहा, पर उसके मन में एक द्वंद्व चल रहा था। उसे पता था कि उसके पिता गलत नहीं हैं, लेकिन वह जमीन सिर्फ एक जमीन का टुकड़ा नहीं थी, वह उनकी जड़ों का हिस्सा थी। वह चुपचाप वहाँ से निकलकर अपने कमरे में चला गया और अपनी छोटी बहन सुहानी को फोन लगाया, जो दूसरे शहर में नौकरी कर रही थी।

सुहानी: "हाँ भाई, क्या हुआ? तुम्हारी आवाज़ कुछ बदली हुई लग रही है।"

साहिल: "सुहानी, पापा जमीन बेचने का मन बना चुके हैं। वे बहुत टूटे हुए महसूस कर रहे हैं। कर्ज का दबाव उन्हें अंदर ही अंदर खा रहा है।"

सुहानी की आवाज़ में एक सिसकी सुनाई दी, "भाई, पापा को समझाओ। मैं अपनी पूरी सैलरी भेज दूंगी, हम कुछ और रास्ता निकालेंगे। पर वह बाग मत बेचने देना, वहाँ मेरी बचपन की यादें बसी हैं।"

साहिल ने फोन रखा और खिड़की के बाहर देखने लगा। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। तभी उनके घर के पुराने नौकर, काका, हाथ में छाता लिए अंदर आए। काका पिछले चालीस सालों से इसी परिवार का हिस्सा थे।

काका: "बेटा, अविनाश बाबू से कहना कि कल शहर से कुछ लोग आने वाले हैं जमीन देखने। क्या सच में सब खत्म हो जाएगा?"

साहिल ने काका के हाथ पकड़ लिए, "नहीं काका, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। बस मुझे थोड़ा समय चाहिए।"
रात के खाने पर मेज पर सन्नाटा पसरा हुआ था। सिर्फ बर्तनों की खनक सुनाई दे रही थी। अविनाश का मन कचोट रहा था। वह ममता की तरफ देख रहा था, जो चुपचाप खाना परोस रही थी। अचानक अविनाश ने चुप्पी तोड़ी।

अविनाश: "ममता, कल सुबह दस बजे डीलर आ रहा है। मैंने कागजात तैयार कर लिए हैं।"

ममता की आँखों से एक आंसू टपक कर दाल में गिर गया। उसने बिना सिर उठाए कहा, "जैसी आपकी मर्जी। पर याद रखना, जिस दिन वह जमीन जाएगी, उस दिन हमारे घर की रौनक भी चली जाएगी।"

अविनाश को अपनी पत्नी की बात सुनकर एक तीखा कटाक्ष महसूस हुआ। वह झल्लाकर उठ गया और बिना खाना खाए बाहर बरामदे में चला गया। वहाँ अंधेरे में उसे अपने पिता की धुंधली सी तस्वीर दीवार पर टंगी दिखाई दी। उसे महसूस हुआ जैसे उसके पिता की आँखें उससे सवाल कर रही हों।

अगली सुबह, घर का माहौल किसी मातम जैसा था। तभी दरवाजे पर एक महंगी गाड़ी रुकी। डीलर खन्ना साहब अपने दो आदमियों के साथ उतरे। उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी, जैसे वे कोई बड़ी जीत हासिल करने आए हों।

खन्ना: "नमस्कार अविनाश जी! उम्मीद है कागजात तैयार होंगे। देखिए, मैं आपको बाजार भाव से थोड़ा ज्यादा ही दे रहा हूँ, आखिर पुराना रिश्ता है हमारा।"
अविनाश के हाथ कांप रहे थे। उसने पेन उठाया और साइन करने ही वाला था कि तभी साहिल तेजी से कमरे में आया। उसके साथ एक वृद्ध व्यक्ति भी थे, जिन्हें देखकर अविनाश चौंक गया। वे गाँव के मुखिया जी थे।

साहिल: "रुकिए पापा! साइन मत कीजिए।"
अविनाश: "साहिल, यह क्या बदतमीजी है? मुखिया जी आप यहाँ इस वक्त?"

मुखिया जी मुस्कुराए और अविनाश के पास आकर बैठे। उन्होंने कहा, "अविनाश, बेटा, तुम जिस जमीन को बंजर समझकर बेच रहे हो, साहिल ने कल रात मुझे उसकी मिट्टी की जांच रिपोर्ट दिखाई। तुम्हें पता है, उस जमीन के नीचे पानी का एक ऐसा सोता है जो पूरे गाँव की प्यास बुझा सकता है, और वहाँ की मिट्टी औषधीय पौधों के लिए सबसे उत्तम है।"

खन्ना का चेहरा उतर गया। वह हकलाते हुए बोला, "अरे, यह सब तो बेकार की बातें हैं। आप साइन कीजिए अविनाश जी।"

साहिल ने एक फाइल मेज पर रखी, "पापा, मैंने एक स्टार्टअप प्रोजेक्ट तैयार किया है। सरकार इस जमीन पर हर्बल फार्मिंग के लिए भारी सब्सिडी दे रही है। हमें जमीन बेचने की जरूरत नहीं है, बल्कि हम खुद वहाँ काम शुरू कर सकते हैं। सुहानी ने भी अपनी बचत के पैसे इस काम के लिए देने का वादा किया है।"

अविनाश के हाथ से पेन गिर गया। उसने साहिल की आँखों में देखा, जहाँ आत्मविश्वास की एक नई चमक थी। उसे अपनी संकीर्ण सोच पर पछतावा होने लगा। उसने डीलर की तरफ देखा और सख्ती से कहा।

अविनाश: "खन्ना साहब, माफ कीजिएगा। यह जमीन बिकाऊ नहीं है। मेरी जड़ें अब यहीं फलेंगी-फूलेंगी।"
खन्ना बड़बड़ाते हुए अपने आदमियों के साथ बाहर निकल गया। ममता जो दरवाजे के पीछे खड़ी सब सुन रही थी, दौड़कर आई और अविनाश के गले लग गई। उसकी आँखों में खुशी के आंसू थे।

काका कोने में खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, "आज सच में सूरज उगा है।"
अविनाश ने साहिल को गले से लगा लिया। उसका गला भर आया था। उसने कहा, "बेटा, तूने आज मुझे एक बहुत बड़े पाप से बचा लिया। मुझे माफ कर दे, मैं हार मान चुका था।"

साहिल हँसते हुए बोला, "पापा, परिवार की ताकत ही यही है कि जब एक हारने लगे, तो दूसरा उसे संभाल ले। अब चलिए, बहुत काम बाकी है। हमें उस जमीन को फिर से सोना बनाना है।"

उस दिन घर में पहली बार दिल खोलकर हंसी-मजाक हुआ। सुहानी का वीडियो कॉल आया और सबने मिलकर भविष्य की योजनाएं बनाईं। शाम को जब अविनाश बालकनी में बैठा, तो उसे हवाओं में एक अलग ही ताजगी महसूस हुई। वह जमीन जिसे वह बोझ समझ रहा था, अब उसकी सबसे बड़ी उम्मीद बन गई थी।

अविनाश ने सोचा कि इंसान अक्सर मुश्किलों में इतना घिर जाता है कि उसे अपने आस-पास के समाधान दिखाई नहीं देते। पर अगर परिवार का साथ हो और युवा पीढ़ी में कुछ कर गुजरने का जज्बा, तो हर अंधेरी रात के बाद एक सुनहरी सुबह जरूर आती है।

अविनाश ने ममता की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "ममता, आज की चाय सच में बहुत मीठी है।"
ममता ने जवाब दिया, "मीठी तो होगी ही, आज मन जो हल्का हो गया है।"

सूरज ढल रहा था, पर उनके जीवन में एक नई उम्मीद की किरण पूरी तरह फैल चुकी थी। गाँव के उस पुराने घर में अब फिर से खुशियों की गूँज सुनाई देने वाली थी।

                              समाप्त