Ubhara Ishq - 1 in Hindi Love Stories by Sonali Rawat books and stories PDF | उभरा इश्क - 1

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उभरा इश्क - 1


कुकर की दूसरी सीटी बज रही है और मेरे हाथों की रफ़्तार तेज हो गयी है ब्रश करते करते। आनन फानन में मुँह पर पानी के कुछ छींटे मारकर अपने ही दुपट्टे से पोंछकर किचन की ओर भागती मैं, अभी दस मिनट हैं बच्चों और इन्हें उठाने में ऐसा इशारा किया घड़ी ने मुझे। अरे लो – अपना परिचय तो कराना भूल ही गयी मैं। मैं इला– अर्थात इला सुशान्त वर्मा। उम्र यही कोई ३६-३७ वर्ष और पहचान १३ और ११ वर्ष के दो प्यारे बच्चों की माँ। हाँ हाँ समझती हूँ के पहले मैं पत्नी हुई फिर माँ पर जीवन की इस आपा धापी में पत्नी होना कुछ ख़ास महसूस ही नहीं हुआ। सभी के आशीर्वाद से विवाह हुआ मेरा एक कुलीन आकर्षक युवक से और सभी नव विवाहितों की तरह घूमने, फिल्म देखने भी जाते थे न हम ! पर साड़ी और ऊँची हील पहने मैं कभी इनके कदम से कदम नहीं मिला पाई और धीमा चलना शायद इन्हें आता ही न था। तीसरी सीटी ने वापस धरातल पर ला दिया मुझे। चाय चढ़ाकर कदम बढ़ चले सुशान्त को उठाने -पानी, टॉवेल और अख़बार रख कर चाय का बुलावा दे दिया उन्हें रोज़ की तरह। 



और ये सुलभ और अंशिता भी न ? रोज़ इतना परेशान करते हैं न उठने में-अभी बस निकल जाएगी तो सुशान्त को इन्हें स्कूल छोड़ने जाना पड़ेगा और सुबह सुबह ही मूड खराब हो जायेगा उनका। “ उठो बेटे चलो जल्दी करो “ “एक मिनट मम्मी बस एक मिनट “ अलसाया सा सुलभ बोला और सुर में सुर मिलाती अनमनी सी अंशिता भी “नहीं जाना स्कूल बस”। घड़ी की ओर घूरती मान मनुहार से दोनों को उठाया और भेजा तैयार होने। फटाफट सबका टिफिन पैक किया और लग गयी बेतरतीब से कमरों को सँवारने। काश जिंदगी भी ऐसे ही संवर जाती। न न ये मत सोचना की उदास हूँ मैं – या असंतुष्ट ? या हूँ? क्या पता ? बाहर से देखने पर तो सब ठीक ही लगता है पर भीतर रोज़ कुछ दरकता सा है – बेआवाज़। कहीं कुछ टूटता है फिर जुड़ जाता है – अपने आप। और फिर चल पड़ती है जिंदगी अपनी ही रफ़्तार से।


साढ़े सात बज गए हैं- सुबह का भूचाल शांत हो गया है इन सब के जाने से। आज सुशान्त को भी जल्दी जाना था किसी काम से – क्या पता क्या काम, शायद बताना भूल गए होंगे। हाथ में चाय का मग पकड़े मैं चल पड़ी अपनी तैयारी पर – बस बाई समय पर आकर सब काम कर दे तो सब संभला है। मुझे भी तो निकलना है कुछ देर में। लो आ गयी लक्ष्मी गुहार लगाती “ बीबीजी सर दर्द हो रहा है चाय पिला दो आज पहले “| समझ गयी आज फिर पति के क्रोध का निशाना बन कर आई है ये पर कुछ कह सुन कर भी तो कोई फायदा नहीं। हमारे समाज में बहुत कुछ बस घटता है -बिना कारण बिना किसी हल। अपने हाथ का मग उसे पकड़ाया, एक डिस्प्रिन दी और नहाने चल दी मैं। समय जैसे भाग रहा है – दिन महीने साल सब तो गुज़र गए !!

आइने के सामने खड़ी होती हूँ तो दिखती है बालों में चमकती चांदी -समय ही नहीं मिल पा रहा पार्लर जाने का। अलमारी खोल कर बरबस ही हाथ आ गयी ये गुलाबी साड़ी – कम ही पहन पाती हूँ साड़ी आजकल। इतनी अफरा तफरी में बस किसी तरह तैयार होकर निकलना भी किसी युद्ध से कम नहीं। पर आज कुछ मिनट है मेरे पास – क्या अपने लिए ? तैयार होकर आज बाल क्लच में नहीं बांधे मैंने बल्कि एक ढीली सी छोटी करके छोड़ दी। और ये क्या ? ये चांदी का ब्रेसलेट – इसे तो जैसे भूल गयी थी मैं- आज इसे ही पहन लेती हूँ। फटाफट बिंदी सिन्दूर घड़ी पहन कर जब बाहर निकली तो लक्ष्मी बोल पड़ी “ आज क्या है बीबीजी – अच्छी लग रहीं हैं आप !” तब एहसास हुआ कि जिम्मेदारियों को निभाते निभाते खुद को कहीं भूल गयी हूँ मैं। आज अचानक दस मिनट खुद को दिए तो.... ? मुस्कुराकर वापस कमरे में गयी और लगायी गुलाबी लिपस्टिक और अपना पसंदीदा इत्र।

ये नहीं के रोज़ यहाँ से ट्रेन नहीं पकड़ती मैं – पर आज लोग कुछ अलग हैं क्या – वो गेट के पास वाला गार्ड कुछ मुस्कुराया क्या ? और अखबार बेचने वाले लड़के की आँखें कुछ चमकीली हैं क्या आज ? चलो छोड़ो। अपनी निर्धारित ट्रेन के रोज़ वाले कोच में चढ़ चुकी मैं और हलकी सी गर्दन हिलाकर कुछ लोगों का अभिवादन करती कुछ अलग हूँ मैं क्या आज ? तो फिर ये लोग अलग से क्यों लग रहें हैं मुझे आज ? क्या बदल गया है ? क्या मैं ? ये सामने वाली सीट पर बैठ कर हमेशा अपनी किताब में खोये रहने वाले ये सज्जन आज इतने चमत्कृत क्यों हैं ? इनकी आँखों में आज कुछ प्रशंसा का भाव है क्या ? एक मौन का संवाद रहा है हमारे दरमियान जाने क्यों ? नाम नहीं जानती मैं इनका – कभी पूछा ही नहीं – आवश्यकता ही नहीं थी कोई। पर ये बैठते रोज़ यहीं हैं। शायद किसी बैंक में काम करते है या किसी इन्वेस्टमेंट कंपनी में। जो किताबें ये पढ़ते रहते हैं न उन्हें देख कर तो कुछ ऐसा ही लगता है। आ गया मेरा स्टेशन और बढ़ चले कदम ऑफिस की ओर।