Ubhara Ishq - 2 in Hindi Love Stories by Sonali Rawat books and stories PDF | उभरा इश्क - 2

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उभरा इश्क - 2

समय पर हूँ मैं- असल में हमेशा ही रहती हूँ। पसंद ही नहीं देर से आना और किसी की कोई ऊँची नीची बात सुनना। अक्सर सुशांत कह उठते हैं कि क्यों इतनी जल्दी में रहती हो, अगली ट्रेन भी पकड़ो तो पहुँच जाओगी ? क्या बोलू उन्हें ? खैर लिफ्ट का बटन दबाया और अपनी फ्लोर पर पहुंचकर फिर चौंकी मैं क्योंकि भोलाजी बोले “ हैप्पी बर्थडे मैडमजी।“ ये भोलाजी कहने को तो चपरासी हैं हमारे यहाँ पर इनकी उम्र का लिहाज़ करके मैं इन्हें दादा या भोलाजी ही कहती हूँ।

“अरे नहीं दादा आज कोई जन्मदिन नहीं है मेरा “ मेरे ऐसा कहते ही कुछ अविश्वास से देख दिया उन्होंने मुझे जैसे अपने मिठाई के पैसे बचाना चाहती हूँ मैं औरों की तरह। हँसकर अन्दर पहुँची तो सभी की नज़रों में एक “लक्ष्मी”, अरे मेरा मतलब एक “अच्छी लग रही हो” का भाव दिखा मुझे। रीता औए महक तो पीछे ही पड़ गयी के बता बात क्या है। लो अब तो ठीक से तैयार होकर आना भी गुनाह हो गया यहाँ ! पूरे दिन एक नसों में एक अलग ही स्फूर्ति रही आज- थकान और गर्मी कुछ कम है न आज? 


वापसी ट्रेन में फिर वही रोज़ का सा हाल। कोई संगीत सुनकर तो कोई मोबाइल में गेम खेलकर अपनी थकान मिटा रहा था और मैं रोज़ की तरह खिड़की से बाहर गुजरती हुई जिंदगी को देखती न जाने किस शून्य में खोयी हुई थी। तभी एक अपरिचित किन्तु भला सा स्पंदन हुआ जब कोई बोला “मुझे नहीं पहचानती हो न इला ?” मुड़कर देखा तो आश्चर्य करने की बारी मेरी थी। वही सज्जन मुझे संबोधित कर रहे थे जो मेरे रोज़ के मूक सहयात्री थे। मेरे विस्मय पर शालीनता से बोले वो “ मैं अश्विन ? कॉलेज में तुम्हारा सीनियर और रचनात्मक एवं सृजनात्मक कार्यों को संचालित करने में तुम्हारा सहभागी ?” जैसे अचानक अतीत का कोई झरोखा सा खुल गया और याद आ गया मुझे मेरा वो रूप जहाँ किताबें थी, लेखन था, साहित्यिक चर्चाएँ थीं, और समाज को सही दिशा देने के युवा इरादे थे। सहसा मेरे मुँह से निकला “ कितना बदल गए हो तुम – सॉरी आप ?” मेरा इशारा शायद उनकी फ्रेंच कट दाढ़ी, बड़े चश्मे और चांदी भरे बालों की तरफ था। पर जो नहीं बदली थी वो थी उनकी वो उन्मुक्त हंसी जो संभवतः मैं डेढ़ दशक बाद सुन रही थी और इतने दिनों के मूक सफ़र में कभी नहीं देखी थी। संकोच में सिमट सी गयी मैं। 

आज गुनगुनाते हुए घर में घुसी मैं और रोज़मर्रा के कामों में जुट गयी। समय की चक्की फिर अपनी सधी सधाई रफ़्तार से घूम रही थी। सबके सो जाने के बाद आज पुराने एल्बम लेकर बैठ गयी मैं। शादी की सभी रस्मों को फिर से जीती हुई मैं पापा मम्मी के उन शब्दों को गुन रही थी कि इतना अच्छा लड़का है- सामने से रिश्ता आया है और कोई मांग भी नहीं है उनकी। तू सबसे बड़ी है- एक जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी और शादी के बाद तेरे पढाई जारी रखने से भी ऐतराज़ नहीं है उन्हें। रिया, मेरी छोटी बहन तो जैसे दीवानी हो गयी सुशान्त की फोटो देख कर पर भाई के छोटे से माथे पर चिंता की लकीरें थी कि सब सही तो होगा न ? सगाई बड़ी सादगी से हुई और समय पंख लगा कर उड़ चला और लो विवाह भी हो गया देखते देखते। 

नए जीवन के नए सपने संजोती मैं कुछ विस्मित कुछ चमत्कृत बढ़ चली एक नई डगर पर, उनके साथ कदम से कदम मिलाने की चाह में। पर बहुत जल्दी सीख लिया कि साथ नहीं चल सकूंगी मैं क्योंकि हमारी चाल ही कुछ अलग है एक दुसरे से। क्षोभ, कुंठा और दर्द को हावी नहीं होने दिया अपने ऊपर मैंने और समझा जीवन का सार कि जो जैसा है, जितना है- अच्छा है। यही नियति है। इसी में गति है। पंख लगे समय की उड़ान में संग उड़ चली मैं दोनो बाहें फैलाये स्वागत करती सुलभ और अंशिता का। इस सबके बीच पढना जारी रखा और शिक्षा विभाग में नौकरी भी। बस जो पीछे छूट गया वो था -मेरा स्वयं – मेरे अंतर का वो व्यक्ति जो इला था – श्रीमति इला वर्मा नहीं। “ आज सोना नहीं है क्या” आँखें मलते सुशान्त ने पीछे से आकर पूछा। वर्त्तमान में प्रवेश करती उठ खड़ी हुई मैं। इन्हें पानी का गिलास दिया और उसके बचे हुए घूँट को अपने हलक में उतारते समय ठिठकी मैं – सभी पत्नियाँ ऐसी ही होती हैं न ? मैं कोई अलग थोड़ी न हूँ ! 

अब बहुत सी बातें होती हैं अश्विन के साथ – अतीत की, वर्त्तमान की और फिर से देश के भविष्य की। उसने भी अपने आदर्श समाज के सपने को अपने कुर्ते के साथ उतार कर जिम्मेदारियों की पैंट शर्ट पहन ली- यही जीवन है, यही संसार है। पर रोज़ के इस सफ़र में बहुत कुछ जीने लगे थे हम दोनों। अपने इला होने का फिर से एहसास करा रहा था वो मुझे और मैं इस सुखद एहसास में उसके साथ खुश थी। आने वाले तूफ़ान से पूरी तरह अनभिज्ञ। जब भी गुनगुनाती या मुस्कुराते हुए कुछ काम करती तो सहसा ही सुशान्त की नज़रें उठ जाती मेरी तरफ – एक विस्मय एक प्रश्नचिन्ह के साथ। और मैं सकपका जाती जैसे कोई चोरी पकड़ी गयी हो – बेमतलब ही उनको संदेह के सापों ने घेरना शुरू कर दिया था और मैं थी इस सब से नितांत अनजान। अब मेरे तैयार होते समय टीवी या अखबार में नहीं घिरते सुशांत बल्कि खामोश से देखा करते हैं। कभी कपड़ों कभी घड़ी तो कभी श्रृंगार पर बोल उठते हैं “ बड़े दिनों बाद पहना तुमने ये- कोई ख़ास बात ?” मैं हलकी सी गर्दन हिला कर नकार देती और वो बस देखते रहते न जाने कितने संशय दिल में लिए।