अंधकार लोक के विनाश के बाद, जब समस्त लोकों में संतुलन लौट आया, तब आकाश के द्वार एक बार फिर खुल गए। स्वर्णिम प्रकाश के मध्य, अधिराज अपने वास्तविक स्वरूप में लौट रहा था—
पक्षीराज अधिराज।
उसके पंख अब युद्ध की ज्वाला से नहीं, शांति के तेज से दमक रहे थे।
और उसकी बाहों में थी एकांक्षी—अब केवल मानव नहीं,
बल्कि लोकों को जोड़ने वाली सेतु।
जैसे ही वे पक्षीलोक की सीमा में पहुंचे, पूरा आकाश पुष्पवर्षा से भर गया। देवपक्षियों की मधुर ध्वनि गूंज उठी। वर्षों बाद पक्षीलोक ने अपने युवराज को नहीं,
अपने राजा को लौटते देखा।
महल के द्वार खुले थे।
स्वर्ण सिंहासन के समक्ष खड़ी थीं—
रानी रत्नावली।
उनकी आंखों में आंसू थे,
लेकिन मुख पर अपार गर्व।
अधिराज ने भूमि को स्पर्श कर प्रणाम किया। “मां…
मैं लौट आया हूं।”
रानी रत्नावली आगे बढ़ीं,
अपने पुत्र को हृदय से लगा लिया। “तुम लौटे नहीं, पुत्र…
तुमने पक्षीलोक को पुनः जीवन दिया है।”
उनकी दृष्टि एकांक्षी पर पड़ी।
रानी रत्नावली ने एकांक्षी का हाथ थामा। “मैं तुम्हें पहचानती हूं,”
उनका स्वर गंभीर था,
“तुम वैदेही हो…
और आज, एकांक्षी भी।
जिसने मेरे पुत्र को दो बार जीवन दिया।”
एकांक्षी की आंखें नम हो गईं। “मां…
मैंने केवल वही किया,
जो प्रेम ने मुझसे कहा।”
पूरा पक्षीलोक विवाह के उत्सव में डूब गया।
स्वर्ण आकाश के नीचे,
चंद्रपक्षियों के साक्ष्य में,
अधिराज और एकांक्षी का दिव्य विवाह संपन्न हुआ।
अधिराज ने प्रतिज्ञा ली— “मैं शक्ति से नहीं,
संतुलन से शासन करूंगा।”
एकांक्षी ने वरमाला पहनाते हुए कहा— “और मैं तुम्हारे साथ,
हर लोक की पीड़ा को अपना मानूंगी।”
विवाह के पश्चात रानी रत्नावली ने स्वयं
एकांक्षी के मस्तक पर राजमुकुट रखा। “आज से तुम केवल मेरी पुत्रवधू नहीं,
पक्षीलोक की महारानी हो।”
आकाश में प्रकाश फैल गया।
महल की बालकनी से अधिराज ने अपने लोक को देखा।
एकांक्षी उसके साथ खड़ी थी।
“कभी लगा था,” अधिराज बोला,
“कि युद्ध ही मेरा भाग्य है।”
एकांक्षी मुस्कराई। “और अब शांति।”
दूर कहीं, जिवंत मणि की अंतिम किरण
दोनों के हृदयों में स्थिर हो गई।
अब वह शक्ति नहीं—
आशीर्वाद थी।
विवाह के पश्चात, जब पक्षीलोक में शांति स्थिर हो चुकी थी, तब रानी रत्नावली अधिराज और एकांक्षी को
काल-स्तंभ के समीप ले गईं—
वह स्थान जहां भविष्य स्वयं अपना स्वर प्रकट करता था।
काल-स्तंभ सदियों से मौन था।
पर उस दिन…
वह जाग उठा।
जैसे ही एकांक्षी ने उस पर हाथ रखा,
जिवंत मणि की शेष चेतना स्पंदित हुई।
आकाश गहराया,
और समय की परतें खुलने लगीं।
एक दिव्य स्वर गूंजा—
“सुनो, पक्षीलोक के राजाओं…
अब जो जन्म लेगा,
वह केवल वारिस नहीं होगा—
वह निर्णायक होगा।”
भविष्यवाणी प्रकट हुई—
“अधिराज और एकांक्षी की संतान
तीन लोकों का रक्त वहन करेगी—
पक्षीलोक की चेतना,
मानव लोक का हृदय,
और जिवंत मणि का संतुलन।”
आकाश में तीन प्रतीक उभरे—
🜂 स्वर्ण पंख –
जो उसे आकाश से जोड़े रखेंगे।
🜄 उपचार चिह्न –
जो वैदेही की विरासत होगी।
🜃 खंडित मणि –
जिसमें सृजन और विनाश दोनों समाहित होंगे।
दिव्य स्वर आगे बोला—
“उस संतान का जन्म
शांति के युग में होगा,
पर उसका भाग्य
तूफानों में लिखा होगा।”
अधिराज ने आगे बढ़कर पूछा— “क्या वह विनाश लाएगा?”
काल-स्तंभ का उत्तर आया—
“नहीं…
वह निर्णय लाएगा।”
फिर एक और दृश्य उभरा—
एक युवा,
जिसकी आंखों में आकाश की गहराई थी,
और हथेलियों में प्रकाश नहीं—
चयन था।
“जब तीन द्वार खुलेंगे—
नागलोक, पक्षीलोक और मानव लोक—
तब वही संतान तय करेगी
कि लोक जुड़े रहेंगे
या सदा के लिए अलग हो जाएंगे।”
एकांक्षी का स्वर कांप उठा— “क्या उसे भी युद्ध करना होगा…?”
काल-स्तंभ मौन रहा।
फिर धीरे से बोला—
“युद्ध बाहरी नहीं होगा,
सबसे बड़ा युद्ध
उसके भीतर होगा।”
अंतिम पंक्तियां स्वर्ण अक्षरों में उभरीं—
“जब प्रेम और कर्तव्य टकराएंगे,
तभी अगली पीढ़ी का सत्य जन्म लेगा।
और उसी क्षण तय होगा—
क्या देवता बने रहेंगे,
या मनुष्य बनेंगे।”
काल-स्तंभ शांत हो गया।
रानी रत्नावली ने गंभीर स्वर में कहा— “यह भविष्यवाणी शाप नहीं है…
यह अवसर है।”
अधिराज ने एकांक्षी का हाथ थाम लिया। “जो भी जन्म लेगा,
वह अकेला नहीं होगा।”
एकांक्षी ने मुस्कराकर कहा— “क्योंकि इस बार…
इतिहास प्रेम से लिखा जाएगा।”
✨ भविष्य अभी बाकी है… ✨