Incomplete love is another crime - 5 in Hindi Moral Stories by archana books and stories PDF | अधूरा इश्क़ एक और गुनाह - 5

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अधूरा इश्क़ एक और गुनाह - 5

एपिसोड 3— “निधि का पहला दिन”
ससुराल के बड़े-से आँगन में आज गहमा-गहमी थी। रिश्तेदारों की भीड़, हंसी-ठिठोली, गहनों की खनक और पकवानों की खुशबू… सब मिलकर एक नया घर-परिवार बसने की ख़ुशी का ऐलान कर रहे थे।
निधि, जो अभी कुछ घंटों पहले ही इस घर की नई बहू बनी थी, अपने पति सुधांशु के साथ पहली बार दहलीज़ लांघ चुकी थी। चेहरे पर लाली, आँखों में हल्की-सी झिझक, और होंठों पर आधी-अधूरी मुस्कान—वह अपने आप में ही सिमटी बैठी थी।
मुंह दिखाई की रस्म चल रही थी।
सास के कमरे को हस्बैंड-वाइफ का बेडरूम कहा जाता था, और वहीं एक ओर पलंग पर उसे बैठाया गया था। कमरे में रंग-बिरंगे गद्दे, फूलों से सजा हेडबोर्ड और कोने में रखी मिठाइयों की थाल—सब कुछ शादी के ताजेपन की गवाही दे रहे थे।
रिश्तेदार आते, चेहरे से घूँघट उठाकर देखते, तारीफ करते और कभी-कभी तुलना भी करने लगते।
एक आंटी बोलीं—
“अरे वाह! बहुत अच्छी बहू लेकर आए हो… लंबी है, गोरी है, चेहरे पर तो चाँद उतर आया हो जैसे।”
दूसरी ने हँसते हुए कहा—
“भाई, सुधांशु की किस्मत चमक गई।”
निधि हल्के से मुस्कुराई, पर निगाहें झुकी रहीं।
दोपहर से शाम का समय हो चला था। घर में महिलाएँ आपस में बतिया रही थीं, बच्चे इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहे थे। तभी सास ने एक थाली उठाई, जिसमें चाभियों का गुच्छा और कुछ गहने रखे थे। वह थाली धीरे से एक ओर रख दी गई और असली चर्चा शुरू हो गई—बहू के मायके से आए सामान की।
“अरे, बक्से में क्या-क्या है?”
“कितनी साड़ियां लाई है बहू?”
सास ने बिना रुके कहा—
“अरे मेरी तो विदाई हुई थी तो हर दिन दस-दस बार साड़ी बदलती थी मैं… और इनकी तो बस चार साड़ियां हैं।”
फिर एक खिंचाई भरी हँसी—
“हमारे यहाँ तो बहू को इतना देते थे कि हमारी लड़कियों को सालों पहनना पड़ता था। अब देखो, इनके यहाँ तो…”
सुनते-सुनते निधि का गला सूख गया। उसे पता था कि मायके वालों ने अपनी हैसियत के अनुसार सब दिया है—दस साड़ियां, कुछ गहने, चादरें, बर्तन… मगर यहाँ के कुछ लोगों के लिए यह ‘कम’ था।
उसने चुपचाप सिर झुका लिया। कोई सफाई देने की न हिम्मत थी, न ज़रूरत।
तभी सुधांशु कमरे में आया। हाथ में एक कप चाय थी, पर आते ही माँ की बातें सुनकर ठिठक गया।
“अरे, देखो न, कुछ नहीं है इनके पास,” सास ने बेटे को देखते हुए कहा।
सुधांशु के चेहरे पर हल्की-सी झुंझलाहट आई, पर उसने कुछ कहा नहीं। बस एक नज़र निधि पर डाली—जैसे कह रहा हो, ‘फिक्र मत करो, मैं हूँ।’
रस्में खत्म होते-होते शाम ढल चुकी थी। अब अगली रस्म थी—पति-पत्नी का पहली बार अपने कमरे में जाना।
कमरे के दरवाज़े पर देवर और उसके दोस्तों ने अड़ंगा लगा रखा था।
“अंदर जाना है तो टोल लगेगा,” देवर ने हँसते हुए कहा।
“टोल?” सुधांशु ने चौंककर पूछा।
“हाँ भैया… कम से कम ₹2000 तो देने पड़ेंगे।”
निधि ने सोचा—ये भी कोई रस्म है? पर चेहरे पर मुस्कान बनाए रखी। सुधांशु ने जेब से पैसे निकाले और हँसते हुए देवर की हथेली पर रख दिए।
“लो भई, अब रास्ता दो।”
जैसे ही दरवाज़ा खुला, निधि की नज़र अपने नए घर के पहले कमरे पर पड़ी।
कमरा गुलाब और गेंदा के फूलों से महक रहा था। दीवारों पर लाइटें टिमटिमा रही थीं, और पलंग पर लाल रंग की चादर के बीच गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं। कोने में एक छोटी-सी टेबल पर मिठाइयों और फलों की सजावट थी।
अंदर जाते ही जैसे सारी थकान, सारे ताने, सारे दिनभर के बोझ पल भर को हल्के हो गए।
निधि पलंग पर बैठ गई। सुधांशु उसके सामने कुर्सी खींचकर बैठा।
उसने जेब से एक छोटा-सा पैकेट निकाला—जिसमें एक लाल गुलाब और चॉकलेट थी।
“ये तुम्हारे लिए,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
निधि ने गुलाब लिया, होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई, पर नज़रे झुकी रहीं।
“तो… कैसा रहा आज का दिन?” सुधांशु ने पूछा।
“ठीक था,” निधि ने धीमे से कहा।
सुधांशु ने उसकी झिझक तोड़ने की कोशिश की। वह पास आया, उसके हाथ पकड़ लिए और बोला—
“निधि, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ… आई लव यू।”
उसकी आवाज़ में सच्चाई थी, आँखों में अपनापन।
निधि के दिल में जैसे कोई दीपक जल गया। दिनभर की थकान, रिश्तेदारों के ताने, सामान की गिनती… सब कुछ जैसे इस एक पल में मिट गया।
उसने मन ही मन सोचा—
“शायद मैं दुनिया की सबसे खुशनसीब लड़की हूँ, जिसे इतना प्यार करने वाला पति मिला है।”
बाहर आँगन में अभी भी हँसी-ठिठोली जारी थी, लेकिन कमरे के अंदर, फूलों और खुशबुओं के बीच, निधि और सुधांशु के लिए एक नया जीवन चुपचाप शुरू हो चुका था…