Draupadi and Shri Krishna's dialogue before the peace proposal in Hindi Short Stories by Prithvi Nokwal books and stories PDF | शांति प्रस्ताव से पहले द्रोपदी और श्री कृष्ण संवाद

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शांति प्रस्ताव से पहले द्रोपदी और श्री कृष्ण संवाद

शांति प्रस्ताव से पहले द्रौपदी और श्रीकृष्ण संवाद
(महाभारत प्रसंग पर आधारित विस्तृत संवाद)
उपप्लव्य नगरी में पांडवों का शिविर लगा हुआ था। वनवास और अज्ञातवास की कठिन परीक्षाओं के बाद अब समय आ गया था कि पांडव अपने अधिकार की पुनः प्राप्ति के लिए कोई निर्णय लें। युद्ध की आशंका वातावरण में तैर रही थी। उसी समय श्रीकृष्ण वहाँ पधारे थे, ताकि हस्तिनापुर जाकर शांति प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकें।
रात्रि का समय था। चंद्रमा की शीतल चाँदनी धरती पर बिखरी हुई थी, परंतु द्रौपदी के हृदय में शांति नहीं थी। उसके नेत्रों में अपमान की ज्वाला अभी भी धधक रही थी। वह अपने कक्ष में चिंतित बैठी थीं। तभी श्रीकृष्ण वहाँ आए।
द्रौपदी ने उन्हें देखते ही उठकर प्रणाम किया, परंतु उनके मुख पर पीड़ा स्पष्ट थी।
द्रौपदी (व्यथित स्वर में): “केशव! आप शांति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर जाने का विचार कर रहे हैं?”
श्रीकृष्ण (मधुर किंतु गंभीर स्वर में): “हाँ सखी। यदि संभव हो तो मैं इस महाविनाश को टालना चाहता हूँ। युद्ध में केवल शत्रु ही नहीं मरते, असंख्य निर्दोषों का रक्त भी बहता है।”
द्रौपदी की आँखों में आँसू भर आए।
द्रौपदी: “माधव! क्या आपको उस सभा का स्मरण नहीं जहाँ मुझे बालों से घसीटकर लाया गया था? जहाँ दुःशासन ने मेरे वस्त्रहरण का प्रयास किया? जहाँ भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र मौन बैठे रहे? क्या उस अपमान का कोई मूल्य नहीं?”
श्रीकृष्ण शांत भाव से द्रौपदी को देखते रहे।
श्रीकृष्ण: “मुझे सब स्मरण है, सखी। उस दिन तुम्हारी पुकार पर ही मैं आया था और तुम्हारी लाज बचाई थी। तुम्हारा अपमान केवल तुम्हारा नहीं, सम्पूर्ण स्त्रीजाति का अपमान था। परंतु क्रोध में लिया गया निर्णय प्रायः विनाश का कारण बनता है।”
द्रौपदी (कंपित स्वर में): “तो क्या मैं अपना अपमान भूल जाऊँ? क्या धर्म यही है कि स्त्री की अस्मिता रौंदी जाए और वह मौन रहे? यदि आज हम शांति के नाम पर सब सह लें, तो अधर्म और भी बढ़ेगा।”
श्रीकृष्ण ने गंभीर होकर कहा—
“धर्म केवल प्रतिशोध नहीं सिखाता, वह धैर्य और न्याय भी सिखाता है। मैं हस्तिनापुर इसलिए जा रहा हूँ कि संसार यह देख सके—पांडवों ने पहले शांति का मार्ग चुना था। यदि दुर्योधन शांति स्वीकार कर ले, तो अनगिनत प्राण बच सकते हैं।”
द्रौपदी ने अपने केशों को स्पर्श किया। वे खुले हुए थे, जिन्हें उन्होंने दुःशासन के रक्त से धोने की प्रतिज्ञा की थी।
द्रौपदी: “गोविंद! मैंने प्रतिज्ञा की है कि जब तक दुःशासन के रक्त से अपने केश नहीं धोऊँगी, इन्हें नहीं बाँधूँगी। भीम ने भी प्रतिज्ञा की है कि वह दुर्योधन की जंघा तोड़ेगा। क्या इन प्रतिज्ञाओं का कोई अर्थ नहीं?”
श्रीकृष्ण: “प्रतिज्ञाएँ धर्म की रक्षा के लिए होती हैं, न कि अंधे क्रोध के लिए। परंतु सखी, तुम्हारी वेदना उचित है। अधर्म का दंड अवश्य होना चाहिए। मैं शांति का प्रस्ताव इसलिए रख रहा हूँ कि कौरवों को अंतिम अवसर मिल सके। यदि वे नहीं मानेंगे, तो न्याय का मार्ग युद्ध से होकर ही जाएगा।”
द्रौपदी कुछ शांत हुईं, परंतु उनके भीतर का ज्वालामुखी अभी भी प्रज्वलित था।
द्रौपदी: “माधव, जब मुझे सभा में अपमानित किया जा रहा था, तब मेरे पतियों के हाथ बँधे हुए थे। धर्मराज ने धर्म के नाम पर सब कुछ सह लिया। परंतु क्या धर्म का अर्थ कायरता है?”
श्रीकृष्ण (मुस्कुराते हुए): “धर्मराज कायर नहीं हैं, द्रौपदी। उनका धैर्य ही उनकी शक्ति है। समय आने पर वही धैर्य सिंहनाद करेगा। याद रखो, वृक्ष जितना विशाल होता है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी होती हैं। पांडवों की जड़ें धर्म में हैं, इसलिए उनकी विजय सुनिश्चित है।”
द्रौपदी: “परंतु मेरे हृदय की पीड़ा का क्या? क्या आप मुझे यह आश्वासन दे सकते हैं कि मेरे अपमान का प्रतिकार होगा?”
श्रीकृष्ण ने दृढ़ स्वर में कहा—
“मैं तुम्हें वचन देता हूँ, सखी। अधर्म का अंत अवश्य होगा। दुर्योधन, दुःशासन और उनके सहायक अपने कर्मों का फल पाएँगे। यह मेरा वचन है।”
द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की ओर देखा। उनके नेत्रों में करुणा और अटल विश्वास था।
द्रौपदी: “यदि वे शांति स्वीकार कर लें तो?”
श्रीकृष्ण: “यदि वे न्यायपूर्वक पांडवों को उनका अधिकार दे दें, तो युद्ध की आवश्यकता नहीं रहेगी। परंतु ध्यान रहे—शांति का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। शांति तभी संभव है जब उसमें न्याय हो।”
द्रौपदी: “मुझे भय है कि दुर्योधन कभी नहीं मानेगा। उसका अहंकार ही उसका शत्रु है।”
श्रीकृष्ण: “तुम सत्य कहती हो। परंतु संसार को यह ज्ञात होना चाहिए कि पांडवों ने युद्ध से पहले हर संभव प्रयास किया। जब मैं हस्तिनापुर जाऊँगा और पाँच ग्राम का प्रस्ताव रखूँगा, तब यदि दुर्योधन उसे भी अस्वीकार करेगा, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि युद्ध की जड़ उसका अहंकार है।”
द्रौपदी ने गहरी साँस ली।
द्रौपदी: “माधव, मैं आपके निर्णय का सम्मान करती हूँ। परंतु एक स्त्री होने के नाते मैं यह नहीं भूल सकती कि मेरे साथ क्या हुआ। आप ही मेरे सखा हैं, आप ही मेरे रक्षक हैं।”
श्रीकृष्ण (स्नेहपूर्वक): “सखी, तुम्हारी पीड़ा मेरे हृदय में भी है। परंतु विश्वास रखो—काल का चक्र घूम रहा है। जब अधर्म सीमा पार करता है, तब उसका विनाश निश्चित हो जाता है। मैं केवल उस प्रक्रिया का माध्यम हूँ।”
कुछ क्षण मौन रहा। चंद्रमा की शीतल किरणें दोनों पर पड़ रही थीं।
द्रौपदी: “यदि युद्ध हुआ, तो कितना रक्त बहेगा! कितनी स्त्रियाँ विधवा होंगी, कितने बच्चे अनाथ होंगे। क्या यही नियति है?”
श्रीकृष्ण: “युद्ध कभी वांछनीय नहीं होता, परंतु कभी-कभी वह अनिवार्य हो जाता है। जब अन्याय की जड़ें बहुत गहरी हो जाती हैं, तब उन्हें उखाड़ने के लिए कठोर उपाय करने पड़ते हैं। यह युद्ध केवल राज्य के लिए नहीं होगा, यह धर्म की पुनः स्थापना के लिए होगा।”
द्रौपदी के नेत्रों में अब संतुलन था।
द्रौपदी: “तो जाइए, माधव। शांति का प्रस्ताव रखिए। परंतु यदि वे उसे अस्वीकार करें, तो यह स्मरण रखिए कि द्रौपदी का अपमान अभी भी अधूरा न्याय माँग रहा है।”
श्रीकृष्ण (दृढ़ स्वर में): “मैं स्मरण रखूँगा। और तुम भी धैर्य रखो। समय आने पर तुम्हारे केश बँधेंगे, और वह दिन अधर्म के अंत का संकेत होगा।”
द्रौपदी ने folded hands से कहा—
“मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है, केशव।”
श्रीकृष्ण ने आशीर्वाद देते हुए कहा—
“सत्य और धर्म का साथ मत छोड़ना। विजय अंततः उसी की होती है।”
यह कहकर श्रीकृष्ण वहाँ से चले गए। द्रौपदी उन्हें जाते हुए देखती रहीं। उनके हृदय में अब भी वेदना थी, परंतु उसके साथ आशा और विश्वास भी था।
अगले दिन श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान करने वाले थे। यह केवल एक दूत का प्रस्थान नहीं था, यह धर्म और अधर्म के मध्य अंतिम संवाद का आरंभ था।
इस संवाद से यह स्पष्ट होता है कि द्रौपदी केवल प्रतिशोध की प्रतीक नहीं थीं, बल्कि न्याय की पुकार थीं। और श्रीकृष्ण केवल एक मित्र नहीं, बल्कि धर्म के मार्गदर्शक थे। शांति का प्रयास इसलिए आवश्यक था कि इतिहास साक्षी बने—पांडवों ने पहले न्यायपूर्ण समाधान चाहा था।
परंतु जब शांति अस्वीकार होती है और अधर्म हठपूर्वक अड़ा रहता है, तब युद्ध ही धर्म की स्थापना का माध्यम बनता है। यही उस रात्रि के संवाद का सार था—धैर्य, न्याय और समय पर विश्वास।