सिया ने घबराती हुई आवाज़ में जवाब दिया—“क… कुछ नहीं पापा। बस थक गई हूँ, आप परेशान मत होइए…”“बेटा, तू थकी नहीं बल्कि परेशान लग रही है। क्या बात है? अपने बाप को नहीं बताएगी?”— सिया के पापा ने चिंता भरी आवाज़ में कहा।यह सुनकर सिया खुद को रोक नहीं पाई और उसने अपने पापा को सब कुछ बता दिया। तब उसके पापा ने उसे समझाते हुए कहा—“बेटा, तेरी दोस्त बिल्कुल सही कह रही है। तू यहाँ बर्बाद हो जाएगी। जीवन भर तुझे यह सब सहना पड़ेगा और मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा, क्योंकि जब तक तू यहाँ रहेगी, मेरा मुँह नहीं खुलेगा। जितना मैं बोलूँगा, उतना ही तेरी माँ तुझे परेशान करेगी। आज तुझे इस नरक से बाहर निकलने का मौका मिला है, इसे मत छोड़। यहाँ से चली जा। यहाँ की और अपनी माँ के बारे में मत सोच।”सिया ने रोते हुए अपने पापा को गले लगा लिया।अगली सुबह वह ऑफिस गई और अर्शित के केबिन में पहुँची।“सर, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?” — सिया ने पूछा।इस बार सिया डरी हुई नहीं थी, बल्कि आत्मविश्वास और खुशी के साथ अर्शित से बात कर रही थी। उसने कहा—“सर, मैं जयपुर जाने के लिए तैयार हूँ।”सिया का जवाब सुनकर अर्शित मन ही मन चौंक गया। वह खुद को रोक नहीं पाया और आखिरकार पूछ ही लिया—“क्या बात है, मिस शर्मा? आज आपके चेहरे पर अलग ही चमक है। रातों-रात आपके अंदर इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया?”सिया ने पूछा—“क्यों सर? क्या मेरे अंदर यह बदलाव नहीं आना चाहिए था?”अर्शित ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—“आपको आज शाम तक जयपुर के लिए निकलना होगा और जल्द से जल्द वहाँ के ऑफिस पहुँचना होगा। क्या आप तैयार हैं?”सिया ने हल्की मुस्कान दी और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा—“हाँ सर, मैं तैयार हूँ।”अर्शित ने मुस्कुराते हुए कहा—“आपकी नई, खुशहाल ज़िंदगी के लिए ढेर सारी बधाईयां, मुझे उम्मीद है आप अपनी जिंदगी में बहुत आगे तक जायेंगी” सिया ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया— " मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगी"इतना कहकर सिया वहां से वापस चली गई.......सिया के केबिन से बाहर जाते ही अर्शित ने गहरी साँस ली और कुर्सी पर बैठ गया। वह मन ही मन सोचने लगा—उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि एक ही रात में सिया का फैसला बदल गया। कल तक जो सिया जयपुर जाने से डर रही थी, आज वही खुशी-खुशी जयपुर जाना चाहती है…जयपुर पहुँचना सिया के लिए सिर्फ़ शहर बदलना नहीं था, बल्कि ज़िंदगी को दोबारा साँस देना था। नया ऑफिस, नए लोग और एक अनजानी आज़ादी—सब कुछ अजीब-सा मगर सुकून देने वाला था।जैसे ही सिया जयपुर पहुंची उसके पीछे से अर्शित भी जयपुर पहुंचा। अर्शित ने अपने पी . ए से कहा— मिस शर्मा के लिए जल्दी से जल्दी रूम का इंतेज़ाम करो और उनके जरूरत की हर सामान वहां मौजूद होनी चाहिए, उन्हें किसी चीज की कमी नहीं होनी चाहिए.......उसके पी. ए ने जैसा अर्शित ने कहा वैसे ही सारे इंतेज़ाम कर दिए और सिया को कॉल करके जगह और रूम की सारी जानकारी दी जिसके बाद सिया रूम पहुंची और थोड़ा आराम किया फिर अगले दिन वो जल्दी से तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल गई, अर्शित की दूसरी कंपनी, नए लोग और पहले से सीनियर पोजिशन वजह से सिया थोड़ी घबराई हुई थी उसे डर था कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी वो ठीक से कर पाएगी या नहीं ?.... वो मन ही मन खुद से बातें कर रही थी— " कुछ भी हो जाए मै सर का भरोसा नहीं टूटने दूंगी, उन्होंने मुझ पर भरोसा किया मेरा इतना साथ दिया मैं भी उनका भरोसा बनाए रखूंगी".......तभी अर्शित की नजर सिया पर पड़ी सिया को देखते ही उसने सिया की घबराहट महसूस कर लिया और सिया के पास जाकर बोला— "मिस शर्मा आपको घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है, हां मैं जनता हूं ये आपके लिए नया जगह है लेकिन हम सब आपके साथ है, आइए मै आपको हमारी कंपनी दिखाता हूँ.....पहले ही दिन अर्शित ने उसे खुद ऑफिस का टूर कराया।“अगर किसी भी चीज़ में दिक्कत हो तो बिना झिझक बताइएगा,” उसने सहज लहजे में कहा।सिया ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।उसे हैरानी हो रही थी—यह वही अर्शित था, जो पहले सख़्त और प्रोफेशनल लगता था, लेकिन यहाँ उसकी आवाज़ में अपनापन था।इधर सिया की सौतेली माँ को जैसे ही पता चला कि सिया घर में नहीं है, वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी। पूरे मोहल्ले में शोर मचाकर कहने लगी—“देखो ज़रा! कैसी औलाद पाली है मैंने! बिना बताए घर छोड़कर भाग गई। अब इज़्ज़त बची ही कहाँ है हमारी!”मोहल्ले की औरतें इकट्ठा होने लगीं। कोई सहानुभूति दिखा रही थी, तो कोई चुपचाप तमाशा देख रही थी।लेकिन सिया के पापा एक कोने में चुपचाप खड़े थे। उनकी आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर एक अजीब-सा सुकून भी—जैसे उनकी बेटी आख़िरकार उस कैद से बाहर निकल गई हो।इतने से जी नहीं भरा तो वो सिया के ऑफिस गई वह शोर मचाने लगी — "अरे कहा है यहां का मालिक ? देख लिया न क्या हुआ मैने कहा था मेरी बेटी बदचलन है अरे वो अपने घरवालों की सगी नहीं है तुम्हारी क्या होगी? भाग गई वो घर से न जाने किसके साथ.. इतने दिनों से में आस्तीन का सांप पाल रही थी मुझे भनक भी नहीं लगा कि वो क्या करना चाहती है नौकरी के बहाने" ऑफिस में सब लोग उसकी मां को देख रहे थे सिक्योरिटी ने जैसे तैसे करके उसे बाहर निकाला ये बात जैसे ही अर्शित तक पहुंची उसने सिया की मां का ऑफिस आने पर सख्त पाबंदी लगा दिया और सबसे मना कर दिया कि वो किसी को भी सिया के बारे में कुछ न बताए......लेकिन सिया की मां हार मानने वालों में से नहीं थी वो सिया दोस्त नंदिनी के पास गई उसको खड़ी खोटी सुनाया— " तू .. तेरी ही संगत में रहकर वो इतना ढीठ बनी है, तूने ही कुछ न कुछ कान भरे होंगे और वो उड़ रही है।" लेकिन सिया की दोस्त को उसकी मां बिल्कुल पसंद नहीं थी उसने भी सिया की मां के साथ झगड़ना शुरू कर दिया— " हां उड़ रही है वो मैने ही सिखाया है उसके क्योंकि तू उसकी मां बनने के लायक नहीं है, तुने तो उसे नौकरानी बना रखा था, अच्छा हुआ वो चली गई यहां से वरना उसकी बची हुई जिंदगी को भी तू नर्क बना देती, और सुन मैं तेरी बेटी नहीं हूं इसलिए मुझ पर शिकंजा कसने की कोशिश मत कर और दुबारा मेरे पास मत आना।उधर जयपुर में सिया की ज़िंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आ रही थी।ऑफिस का माहौल प्रोफेशनल होने के साथ-साथ सहयोगी भी था। सीनियर पोज़िशन की ज़िम्मेदारी आसान नहीं थी, मगर सिया हर काम को पूरी ईमानदारी से सीखने की कोशिश कर रही थी।कुछ ही दिनों में अर्शित को एहसास होने लगा कि सिया सिर्फ़ मेहनती ही नहीं, बल्कि समझदार और सुलझी हुई भी है।मीटिंग्स में उसके सुझाव सटीक होते, और मुश्किल हालात में भी वह घबराती नहीं।
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