सौदे की ढाल, स्वाभिमान की तलवार
हृदय का वह पेचीदा सच
तभी डॉक्टर राउंड पर आए और कमरे का भारीपन भांपते हुए माहौल को थोड़ा हल्का किया।
"सुमित्रा जी, आप वाकई खुशकिस्मत हैं। सही वक्त पर सही इलाज मिल गया, वरना देरी जानलेवा हो सकती थी।"
फिर डॉक्टर आर्यन की तरफ मुड़े, "मिस्टर राठौर, अगर आपके पास वक्त हो तो मैं आपको सर्जरी की बारीकियां और आगे बरती जाने वाली सावधानियां समझा देता हूँ।"
आर्यन ने सहमति से सिर हिलाया। डॉक्टर ने अपनी फाइल खोलते हुए समझाना शुरू किया, "देखिये, इनके दिल का वाल्व काफी हद तक डैमेज हो चुका था। आसान शब्दों में कहें तो, वाल्व उस दरवाज़े की तरह होता है जो खून को सही दिशा में बहने देता है।"
उन्होंने डायग्राम की ओर इशारा करते हुए कहा, "आमतौर पर यह वाल्व पूरी तरह बंद होता है ताकि खून उल्टा न बहे। लेकिन सुमित्रा जी के मामले में यह 'लीक' कर रहा था, जिसकी वजह से उनके फेफड़ों में पानी भर गया था। हमने इसे हटाकर अब एक 'मैकेनिकल वाल्व' लगा दिया है। अब सब ठीक रहेगा, बस इन्हें ज़िंदगी भर खून पतला करने की दवा लेनी होगी और सबसे ज़रूरी बात—इन्हें हर तरह के तनाव से कोसों दूर रखना होगा।"
आर्यन किसी माहिर छात्र की तरह बड़े ध्यान से सब सुन रहा था। उसने बीच-बीच में कुछ ऐसे बारीक तकनीकी सवाल पूछे कि डॉक्टर भी उसके ज्ञान के कायल हो गए। सान्वी कोने में खड़ी यह सब देख रही थी और उसके मन में सवालों का बवंडर उठ रहा था। जो इंसान उसकी मजबूरी का सौदा कर सकता है, वह उसकी माँ की सेहत को लेकर इतना फिक्रमंद कैसे हो सकता है? क्या यह वाकई परवाह थी या उसकी अदाकारी का कोई नया हिस्सा?
या फिर वह सिर्फ अपने 'इन्वेस्टमेंट' की हिफाज़त कर रहा था?
कुछ देर बाद नर्स ने आकर याद दिलाया कि अब मरीज़ को आराम करने देना चाहिए। विदा लेने की घड़ी आ गई थी। सुमित्रा ने सान्वी का हाथ कसकर थाम लिया और नम आँखों से बोलीं, "जा बेटी, अब अपने घर जा। आज से तू पराई हो गई है। वहाँ जाकर सबका मान-सम्मान रखना और ऐसा कोई काम मत करना जिससे तेरे माता-पिता की पगड़ी पर दाग आए। बड़ों का आदर करना और अब अपने ससुराल वालों की इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझना। पति की बात मानना और उनका ख्याल रखना... अब से वो घर ही तेरा अपना असली घर है।"
'ससुराल ही असली घर है'—ये शब्द सान्वी के कलेजे को चीरते हुए निकल गए। उसे लगा जैसे किसी ने घाव पर नमक छिड़क दिया हो। उसका तो अब कोई घर ही नहीं बचा था। वह तो बस एक ऐसी सराय में वक्त काट रही थी, जिसका किराया वह अपनी आज़ादी बेचकर चुका रही थी।
सुमित्रा जी बिस्तर पर लेटी अपनी धुंधली आँखों से सान्वी को जाते हुए एकटक देख रही थीं। उनके मन में सवालों का एक सैलाब उमड़ रहा था—जी तो बहुत कर रहा था कि सान्वी का हाथ पकड़कर पूछ लें कि आखिर इतने पैसों का इंतजाम रातों-रात हुआ कैसे? वह लड़का आखिर करता क्या है और उसका खानदान कैसा है?
वो पूछना चाहती थीं कि 'बेटी, तू वहाँ खुश तो है न? वो लोग तेरे साथ कैसा बर्ताव करते हैं?' पर उन्होंने अपने होंठ सी लिए। उन्हें लगा कि कहीं उनके सवाल सान्वी की मुश्किलों को और न बढ़ा दें। उनकी उन बूढ़ी आँखों में हज़ारों सवाल साफ़ तैर रहे थे, पर वक़्त कम था और शरीर में जान नहीं। वो बस बेबसी से अपनी बिटिया को ओझल होते हुए देखती रहीं, जैसे आँखों ही आँखों में उसकी खुशियों की दुआ मांग रही हों।
गाड़ी में बैठते ही सान्वी ने चेहरा खिड़की की तरफ घुमा लिया। वह नहीं चाहती थी कि आर्यन उसकी आँखों में उमड़ आए उन आँसुओं को देखे, जो अब लाख कोशिशों के बाद भी रुकने को तैयार नहीं थे।
गाड़ी थोड़ी दूर चली थी कि आर्यन ने डैशबोर्ड से पानी की बोतल निकाली और सान्वी की तरफ बढ़ा दी।
"पी लो। अगर डिहाइड्रेशन की वजह से बेहोश हो गई, तो दादी सारा दोष मेरे सिर मढ़ देंगी।"
सान्वी ने बोतल पकड़ तो ली, पर पानी नहीं पिया।
"आपने... आपने माँ के पैर क्यों छुए?" सान्वी ने बिना उसकी ओर मुड़े, धीमी आवाज़ में पूछा। "वह हमारी डील का हिस्सा तो नहीं था।"
आर्यन ने गियर बदलते हुए अपनी नज़रें सड़क पर टिका दीं। उसके चेहरे की नसें तन गईं और जबड़ा सख़्त हो गया।
"संस्कार, सान्वी," आर्यन ने रूखेपन से कहा। "मैं बिज़नेसमैन हूँ, राक्षस नहीं। और वैसे भी, बड़ों का सम्मान करना राठौर खानदान के खून में है, चाहे वह रिश्ता असली हो या नकली।"
"लेकिन आपने उनसे झूठ बोला," सान्वी ने पलटकर कहा, उसकी आवाज़ में अब डर की जगह एक अजीब सी हिम्मत थी। "आपने उनकी आँखों में धूल झोंकी।"
अचानक आर्यन ने गाड़ी को ज़ोरदार ब्रेक लगाकर सड़क के किनारे रोक दिया। पीछे से आ रही गाड़ियों के हॉर्न गूंज उठे।
आर्यन ने एक झटके में अपनी सीटबेल्ट खोली और सान्वी की तरफ झुका। उसकी आँखों में वही गुस्सा दिख रहा था
"झूठ? सच जानना चाहती हो तुम?" आर्यन की आवाज़ में एक भारीपन था। "सच तो यह है सान्वी, कि अगर मैं वह 20 लाख नहीं देता, तो तुम्हारी माँ आज उस बिस्तर पर नहीं, श्मशान में लकड़ियों के ढेर पर लेटी होतीं। सच यह है कि दुनिया सिर्फ 'नतीजा' देखती है, यह नहीं कि उसे पाने के लिए रास्ता कौन सा चुना गया। मैंने उनकी जान बचाई है। अब चाहे वह सच से बची हो या झूठ से— बात तो यही है कि उनकी सांसें चल रही हैं, है ना?"
सान्वी अंदर तक सिहर गई, पर इस बार उसकी आँखों ने हार मानने से इनकार कर दिया।
"सांसें तो चल रही हैं, आर्यन सर," सान्वी ने पहली बार उसका नाम लिया, भले ही पीछे 'सर' का सहारा लिया हो। "लेकिन जिस नींव पर आपने यह झूठ खड़ा किया है, वह अंदर से खोखली है। और मिट्टी की नींव पर खड़े महल... कभी लंबी उम्र नहीं पाते।"
दोनों के बीच एक गहरी और दम घोंटने वाली खामोशी छा गई। कार के अंदर की हवा जैसे बोझिल हो गई थी।
आर्यन उसे टकटकी लगाए घूरता रहा, जैसे इस मामूली सी लड़की के अंदर दबी इस चिंगारी को वह पहली बार देख रहा हो। अब तक उसे लगा था कि वह महज़ एक मजबूर और लाचार मोहरा है। पर आज उसे अहसास हुआ कि सान्वी वर्मा के पास भले ही दौलत न हो, पर उसका ज़मीर और उसकी रीढ़ की हड्डी आज भी सलामत है।
आर्यन ने बिना एक शब्द कहे गाड़ी स्टार्ट की और एक्सीलेटर पर पैर जमा दिया। रफ्तार ऐसी थी मानो वह सड़क पर नहीं, हवा में दौड़ रहे हों।
राठौर मेंशन पहुँचने तक सन्नाटा बना रहा, लेकिन उस खामोशी के मायने बदल चुके थे। अब वे सिर्फ एक 'मालिक और नौकर' नहीं रह गए थे; सान्वी ने अपनी चुप्पी से अपने स्वाभिमान की एक अमिट लकीर खींच दी थी।
जैसे ही वे अंदर दाखिल हुए, हॉल में शीतल चाची अपनी सहेलियों के साथ किटी पार्टी में मशगूल थीं। सान्वी को देखते ही चाची के चेहरे पर एक ज़हरीली मुस्कान उभर आई।
"लो, आ गईं हमारी छोटी महारानी! अरे सुनैना," चाची ने अपनी सहेली की कोहनी मारते हुए कहा, "यही है हमारे आर्यन की पसंद। ज़रा देखो तो, साड़ी ऐसे लपेट रखी है जैसे किसी ने बस कपड़ा लपेट दिया हो।"
हॉल ठहाकों से गूंज उठा। सान्वी का हाथ अनजाने में ही अपने पल्लू पर कस गया। वह अभी एक जज्बाती तूफ़ान झेलकर आई थी और अब इन तीखे तंजों का सामना करना उसके बस के बाहर था।
इससे पहले कि सान्वी की हिम्मत टूटती या वह शर्म से नज़रें झुकाकर वहां से भागती, आर्यन एक चट्टान की तरह उसके पीछे आकर खड़ा हो गया।
"चाची," आर्यन की भारी आवाज़ हॉल में गूंजी, और पल भर में सन्नाटा छा गया।
"सान्वी थकी हुई है। और मुझे नहीं लगता कि घर की बहू का तमाशा बनाना, वो भी मेहमानों के सामने, हमारे खानदान की रवायत है। है क्या?"
आर्यन का लहजा इतना सपाट और खतरनाक था कि चाची के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।
"चलो सान्वी," आर्यन ने उसे इशारा किया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
सान्वी उसके पीछे चल तो दी, पर इस बार उसके कदमों में वो डर और हिचक नहीं थी। वह बुरी तरह उलझी हुई थी यह कैसा इंसान है? जो बंद कमरे में उसे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ता, वही दुनिया के सामने उसकी ढाल बनकर खड़ा हो जाता है।
आखिर यह आर्यन राठौर है क्या चीज़? एक पत्थर दिल सौदागर, या अपनी ही बनाई परिस्थितियों की कैद में फंसा कोई और?
सीढ़ियां चढ़ते हुए सान्वी के जहन में बस माँ का वो थरथराता, बेजान सा स्पर्श बार-बार कौंध रहा था। वो हाथ, जो कभी उसकी एक सिसकी पर पूरी दुनिया सिर पर उठा लेते थे, आज खुद ज़िंदगी की भीख मांग रहे थे। अस्पताल की उस तीखी फिनाइल वाली गंध और माँ की उखड़ती सांसों ने सान्वी के अंदर चल रहे द्वंद्व को राख कर दिया था। अब कोई डर नहीं था, कोई हिचकिचाहट नहीं थी।
जैसे कोई औरत हार मानकर नहीं, बल्कि लड़ने के लिए अपने दुपट्टे का पल्लू कमर में खोंस लेती है, ठीक वैसे ही सान्वी ने अपने मन में पत्थर का संकल्प पाल लिया था। पीछे मुड़ने के सारे पुल उसने खुद ही जला दिए थे।
आखिर आर्यन राठौर को किसी की मजबूरी की कीमत लगाना सिखाया किसने? क्या उसे माँ की ममता और एक बेटी की तड़प का मोल भी चंद रुपयों में ही दिखता है? सान्वी के दिल ने बस एक ही जिद्दी गूंज सुनाई— "अब जो होगा, सो देखा जाएगा "
जैसे ही वे कमरे में दाखिल हुए, आर्यन ने अपनी खीझ निकालते हुए कोट सोफे पर दे मारा। गर्दन की टाई उसे अब फाँस जैसी लग रही थी, जिसे उसने एक झटके में ढीला किया। सान्वी खामोश खड़ी उसे देख रही थी।
"सुनो," आर्यन ने बिना नजरें मिलाए अपनी भारी आवाज में कहा। "कल घर में बड़ी पूजा है। दादी ने जिद पकड़ ली है कि चूंकि शादी में कोई सगा-संबंधी नहीं था, तो अब कुल-देवता के सामने मत्था टेककर खानदान के सामने बहू का मुंह दिखाई हो जाए। शहर के नामी लोग और हमारे पुराने रिश्तेदार, सब जुटेंगे।"
उसने सान्वी की तरफ एक तिरछी नजर डाली और लहजा थोड़ा और सख्त कर लिया, "देखो, यह सादगी और लाचारी का चोला उतार देना कल। वहां दूर-दराज की चाचियां और बुआ आएंगी, जिनकी नजरें बाज जैसी होती हैं। एक भी चूक हुई, तो वे बाल की खाल निकाल लेंगी। तुम्हें मिसेज आर्यन राठौर की तरह सजना है—वैसे ही दबदबे के साथ, वैसे ही रसूख के साथ। हजारों सवाल होंगे, पर तुम्हारी मुस्कान में एक भी दरार नहीं दिखनी चाहिए। दादी की साख का सवाल है, इसलिए मैं चाहकर भी मना नहीं कर पाया।"
सान्वी ने आईने में खुद को देखा। भारी कंगन, सूजी हुई आँखें और होंठों पर जमी एक अनकही कड़वाहट। उसे पता था कि कल उसकी रूह की नहीं, बल्कि उसके 'किरदार' की प्रदर्शनी लगने वाली थी।
"मैं तैयार रहूंगी," सान्वी ने अपनी ठुड्डी थोड़ी ऊपर उठाकर कहा। उसकी आवाज में इस बार वो थरथराहट नहीं थी जिसने आर्यन को हमेशा सुकून दिया था।
आर्यन के हाथ शर्ट के बटन खोलते हुए अचानक रुक गए। उसने मुड़कर सान्वी को देखा। उसकी उन पत्थर जैसी आँखों में एक पल के लिए अचंभा उभरा—जैसे किसी ने शांत तालाब में कंकड़ फेंक दिया हो। उसे सान्वी में आज वो पुरानी 'बेचारी' लड़की नहीं दिखी। उसने बस एक छोटा सा "ठीक है" कहा और भारी कदमों से बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
बाहर आसमान फिर से काला पड़ने लगा था। बादलों की गड़गड़ाहट बता रही थी कि कल की पूजा सिर्फ मंत्रों वाली नहीं होगी, बल्कि एक नई जंग की शुरुआत होगी।
लेखक की टिप्पणी
इस अध्याय में सान्वी का एक नया रूप उभरता है—अब वह सिर्फ एक पीड़ित नहीं, बल्कि एक जुझारू व्यक्तित्व है। आर्यन की 'ढाल' और 'तलवार' वाला दोहरा बर्ताव कहानी को रहस्यमयी बनाता है। आगे देखना रोमांचक होगा कि यह 'दिखावे की पूजा' उनके बनावटी रिश्ते में क्या नया मोड़ लेकर आती है।
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