Tere Mere Darmiyaan - 69 in Hindi Love Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | तेरे मेरे दरमियान - 69

Featured Books
  • મારા અનુભવો - ભાગ 63

    ધારાવાહિક:- મારા અનુભવોભાગ:- 63શિર્ષક:- ભૂતપ્રેત છે ખરાં?લેખ...

  • ચક્રવ્યૂહ - સત્તાનો ખેલ - 10

    નાસિક સેન્ટ્રલ જેલની હવા અત્યારે બારુદ અને લોહીની ગંધથી ભારે...

  • એકત્વ

    એકત્વ   "स एकाकी न रमते, स द्वितीयमैच्छत्।" બૃહદારણ્યકોપનિષદ...

  • એક સ્ત્રીની વેદના

    એક અબળા,નિરાધાર, લાચાર સ્ત્રીને સમજવાવાળું કોઈ નથી હોતું. એક...

  • Icecream by IMTB

    આ રહી આઈસ્ક્રીમનો ઇતિહાસ + ભારતની ત્રણ દિગ્ગજ બ્રાન્ડ્સ (Hav...

Categories
Share

तेरे मेरे दरमियान - 69

“मोनिका की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि कृतिका ने बीच में ही काटते हुए कहा—”

कृतिका :- बस ! अब मेरी बात सुनो -- आदित्य के लाइफ मे अब तुम्हारे लिए कोई जगह नही है , उसे अब सांती से रहने दो और फिर कभी भी आ आदित्य की और मत दैखना ।

तभी जानवी मुश्किल से मैन गेट तक पहूँचा ही थी के जानवी के मुह से फिर से दर्द भरी आवाज आती है और जानवी दर्द के कारण वही पर बैठ जाती है , आदित्य भागते हूँ जानवी के पास जाता है और जानवी को संभालते हूए कहता है --

आदित्य: - क्यों जिद्द कर रही हो ? क्या बात है बोलो ना , मैं हूँ ना।

“आदित्य के इन शब्दों ने जानवी को पल भर में रोक दिया… वो बस चुपचाप उसे देखती रही, मानो उसकी आँखें ही पूछ रही हों— ‘क्या सच में ऐसा है?’”

“जानवी आदित्य को ऐसे देख रही थी जैसे पहली बार देख रही हो… उसकी आँखों में एक नरमी थी, एक सवाल, और थोड़ा सा खोया हुआ प्यार।”

आदित्य फिर कहता है --

आदित्य :- अगर तुम नही बताना चाहती तो मत बताओ , पर ऐसे अपने आपको चोट तो मत पहूँचाओ । 

जानवी अब भी स्तब्ध थी , आदित्य वहां से उठता है और मुड़कर लौटने लगता है तब जानवी झट से कहती है --

जानवी :- मुझे ऑफिस जाना है ...

जानवी के इस शब्दो ने आदित्य के मुड़े हूए कदमो को रोक देता है , ऐसा उन दोनो के साथ पहली बार हो रहा था , जब दोनो एक एक दुसरे से बात करना चाहते थे । आदित्य अब भी वही पर ठहरा था तभी जानवी अपने शब्दो के पुरा करते फिर कहती है ---

जानवी :- क्या तुम मुझे वहां पर ले कर चलोगे ।

जानवी के इन शब्दो ने मानो आदित्य के कदमो को अपने आप वापिस जानवी की और बड़ा देता है , आदित्य जानवी के पास जाता है और जानवी की तरफ अपना हाथ बड़ाता है , जानवी आदित्य की और देखती है और आदित्य के हाथ को थाम लेती है ।

आदित्य और जानवी को ऐसे दैखकर वहां पर मौजूद सभी बहोत खुश हो रहे थे सिवाय मोनिका के , मोनिका को ये दैखकर बहोत गुस्सा आने लगा था , क्योंकी मोनिका जानती थी के आदित्य का जानवी की और लगाव और उसके सारे सपने तबाह ।

आदित्य जानवी को पकड़कर उसे चलने मे सहारा देने लगा , आदित्य जानवी का हाथ पकड़कर उसे अपने कंधे पर रख देता है जिससे जानवी को एक अपना पन सा एहसास होता है , आदित्य जानवी को संभल कर कार की और ले जा रहा था और जानवी बेफिक्र होकर आदित्य को दैखकर चल रही थी , आदित्य उसे कार बिठाया है और वहां से ऑफिस की और रवाना हो जाता है ।

बारिश की हल्की बूँदें अभी भी जमीन पर गिर रही थीं।
जानवी और आदित्य ऑफिस पहूँच चुका था , जानवी कार से निकल कर अकेली चलने की कोशिश की पर ऑफिस के बाहर फिर से हल्की सी फिसल गई थी, उसके टखने में तेज़ दर्द होने लगा , चलना मुश्किल हो रहा था।

तभी आदित्य भागकर आता है और जानवी का हाथ थाम लेता है , उसने बिना एक शब्द कहे जानवी को पकड़ा, और उसके कंधे के पास धीरे से हाथ रखकर कहा—

आदित्य :- “चलो… मैं हूँ। गिरने नहीं दूँगा।”

जानवी ने कुछ कहने की कोशिश की, पर दर्द और एहसास दोनों ने उसकी आवाज़ रोक दी। वो बस चुपचाप आदित्य पर थोड़ा-सा झुक गई। आदित्य के इतने करिब जानवी कभी वही गई थी , और वो एहसास जानवी को हो रहा था , एक अपने पन का एहसास , एक भरोसा , जिसपर जानवी अब करने लगी थी ।

आदित्य धीरे-धीरे कदम बढ़ाता, उसे सहारा देकर अंदर ऑफिस की ओर ले जा रहा था— मानो दुनिया में उनका बस वही दोनों हों।

हर कदम पर जानवी का दिल धड़क रहा था…और आदित्य की पकड़ में वो पुराना अपनापन महसूस हो रहा था, जो दोनों ने कभी खो दिया था—और शायद आज फिर मिल रहा था।

अंदर प्रवेश करते ही सामने रिसेप्शन के पास जानवी के पापा अशोक खड़े थे। वो वहां पर फाइलें लेने आए थे।

उनकी नजर जैसे ही दरवाज़े पर पड़ी—उनके कदम वहीं थम गए।

आदित्य जानवी को थामे हुए थी …इतनी कोमलता से, जैसे कहीं उसे चोट न लगे। और जानवी उस पर पूरी तरह भरोसा करके आदित्य की और ही वदरे करके चल रही थी।

अशोक की आँखों में एक पल को हैरानी चमकी—

उन्होंने सोचा, “ये तो अब एक-दूसरे से अलग हैं… फिर आदित्य इस तरह?”

लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे पर एक हल्की-सी खुशी फैल गई—
वो खुशी जिसे कोई पिता ही समझ सकता है।
जिसमें राहत भी थी…और उम्मीद भी।

आदित्य ने उन्हें देखकर आदर से सिर झुकाते हूए कहा —

आदित्य :- “नमस्ते, अंकल… वो जानवी को चोट लग गई थी, इसलिए मैं जानवी को लेकर आया हूँ।”

अशोक ने जानवी की चिंतित नजरों से ओर देखा, फिर आदित्य की तरफ—

और उनके दिल में कहीं गहराई से एक आवाज़ उठी—

> “ये लड़का आज भी मेरी बेटी का ऐसे ही ख्याल रखता है… जैसे हमेशा रखता था।”

अशोक ने धीमे से मुस्कुराकर कहा—

अशोक :- “अच्छा किया, बेटा… बहुत अच्छा किया।” आओ ना बेठो , आओ बेटा जानवी , मैने तो तुमसे कहा भी था के मैं आ जाता हूँ , इतनी तकलीफ मे तुम्हें आने की क्या जरुरत थी ।

जानवी कहती है --

जानवी :- वो पापा मैने सोचा के बहोत दिनो से ऑफिस नही गई तो आज आ जाती हूँ । 

आदित्य जानवी की तरफ दैखकर नाराजगी से कहता है --

आदित्य :- ये क्या जानवी, जब मैने पुछा तो तुमने कहा के तुम्हें जाना बहोत जरुरी है , ऐसे करोगी तो अपना ख्याल कैसे रखोगी , बताई ना पापा , कैसी लड़की है ये इतनी बड़ी हो गई फिर भी झुट बोलती है ।

आदित्य के इस तरह से जानवी से नाराज होकर कहने पर जानवी और अशोक दोनो ही हैरान थे , अशोक जानवी की और दैखता है तो जानवी अपनी नजरे निचे कर लेती है , अशोक आदित्य के ऐसा कहने पर बहोत खुश था क्योकी आदित्य के इस गुस्से मे जानवी के लिए केयर और प्यार साफ दिख रहा था । 

जानवी भी आदित्य की बात को सुनकर चुप रहती है । आदित्य फिर अशोक से कहता है --

आदित्य :- बोलिए ना पापा , क्या ये उम्र है झुट बोलने का ?

अशोक हल्की मुस्कान के साथ कहता है --..

अशोक :- नही , बिल्कुल भी नही , जानवी ये बहोत गलत है , कुम अब बच्ची नही हो , झुट कैसे बोल लेती है ।

जानवी अशोक के इतना पर हैरान थी , जानवी अशोक की और दैखती है तो अशोक अपनी नजरे जानवी से चुराने लगता है । जानवी समझ जाती है के अशोक भी आदित्य के बात को लेकर उसे चिड़ा रहा था , जानवी अशोक की और दैखकर मुह बनाती है और कहती है --
.
जानवी:- क्या पापा , अब आप तो चुप हो जाओ ।

जानवी ने पापा की आँखों में वो चमक देखी, मन ही मन सिर्फ एक बात महसूस हुई—

कुछ रिश्ते टूटते नहीं… बस थोड़े समय के लिए सो जाते हैं।

और आज…आदित्य का सहारा उस सोए हुए रिश्ते को फिर जगाने लगा था।

अशोक आदित्य से कहता है --

अशोक :- बेटा इसे डॉक्टर के पास ले जाना होगा । वरना ये चोट और बड़ जाएगा ।

आदित्य :- हां पापा , वो मैं लेकर जाता हूँ , जानवी ने कहा के कुछ Important काम है , तो इसिलिए मैं जानवी को पहले यहां लेकर आ गया ।

जानवी कहती है --

जानवी :- मैं अभी ठिक हूँ पापा , पहले काम को कर लूँ , फिर डॉक्टर के पास भी चली जाउगीं , मामुली सा चोट है , ठिक हो जाएगा ।

अशोक :- पर बेटा ...

अशोक अपनी बात पुरा करता के उससे पहले जानवी कहती है --

जानवी :- पापा आप टेंशन क्यो ले रहे हो , मैं ठिक हूँ ना ।

अशोक एक गहरी सांस लेता है और कहता है ---

अशोक :- ठिक है बेटा, जैसा तुम ठिक समझो ।

इतना बोलतर अशोक कुछ फाईल मंगाता है , तभी एक लड़का अशोक को फाइल ला देता है , फाईल को दैखकर जानवी आगे बड़ने की कोशिश करती है पर लड़खड़ा जाती है तब फिर आदित्य उसे पकड़ लेता है और कहता है --

आदित्य :- जानवी संभल कर ।

जानवी को आदित्य सहारा देकर ऑफिस के अंदर लाता है।
उसका पैर अब भी दर्द से काँप रहा है।

अंदर आते ही आदित्य हल्के से कहता है—
आदित्य :- “ यहां पर बैठो… पहले पैर देखना पड़ेगा।”

जानवी सदमे में है—
आदित्य की आवाज़ में कोई गुस्सा, कोई दूरी नहीं…
बस चिंता। जानवी कहती है --

जानवी :- नही मैं ठिक हूँ ।

आदित्य नाराजगी से कहता है --

आदित्य :- चुप चाप बैठो यहां पर ।

आदित्य की बात पर जानवी बैठ जाती है , जो जानवी पहले आदित्य की कोई बात नही मानती थी , वो आज ना जाने क्यों आदित्य की हर बात को मानने लगी थी , आदित्य जानवी के पैर के पास बैठ जाता है और जानवी के पैर को दैखने लगता है ।

आदित्य जानवी के पैर को जैसे ही छुता है जानवी को पैर के जिस हिस्से मे दर्द था उस जगह को आदित्य छुता है तो जानवी के मुह से दर्द से सिसकी निकल जाती है --

जानवी :- स्सस...! आह्ह ।

आदित्य :- ओह सॉरी , यही पर लगी है तुम्हें ।

आदित्य कहता है --

आदित्य : - थोड़ी वर्फ मिलेगी क्या ?

अशोक वही पर खड़ा स्तब्ध होकर ये सब दैख रहा था , अशोक जानवी के लिए आदित्य का प्यार दैखर मन ही मन बहोत खुश था ।

अशोक कहता है --

अशोक :- ह....हां है ।

अशोक अपने स्टाफ से वर्फ लाने कहता है , वो स्टाफ वर्फ लेकर आता है ।

ऑफिस मे मौजूद सभी लोग आदित्य और जानवी को खड़े होकर दैख रहा था ।

आदित्य घुटनों के बल बैठकर जानवी के पैर को बहुत हल्के हाथों से उठाता है। उसकी उंगलियाँ जैसे ही जानवी की त्वचा को छूती हैं,
जानवी की साँस अनायास रुक जाती है।

उसकी उंगलियाँ काँपती नहीं… पर जानवी का दिल ज़रूर काँप जाता है।

आदित्य बर्फ दबाकर कहता है—

आदित्य :- “दर्द हो रहा है?”

जानवी बोल तो कुछ नहीं पाती, बस धीरे से “हूँ…” कह देती है।
लेकिन उसके मन में तूफ़ान चल रहा है।

जैसे ही आदित्य घुटनों के बल बैठकर धीरे से जानवी के पैर को पकड़ता है, तो जानवी के पूरे शरीर में एक हल्की-सी कंपकंपी दौड़ जाती है।

दर्द तो था…लेकिन उससे ज़्यादा अहसास था। उसका दिल एक पल को थम-सा जाता है , सांसें धीरे हो जाती हैं और आँखें अनायास नम हो जाती हैं।

आदित्य तुरंत रिसेप्शन की तरफ मुड़ा और तेज़ आवाज़ में बोला—

आदित्य : - “फर्स्ट-एड भेजिए… और पेनकिलर भी। आइबुप्रोफेन रखना।”

कुछ ही मिनटों में दवा और स्प्रे आ गए। आदित्य वापस जानवी के पास आया। उसने बहुत धीरे से कहा—

आदित्य :- “बैठो… मैं देखता हूँ।”

जानवी हल्का-सा हिचकी, लेकिन दर्द के मारे कुछ कह नहीं पाई।
आदित्य घुटनों के बल नीचे बैठा और बड़ी सावधानी से उसका पैर अपनी हथेलियों में लिया।
स्प्रे करने से पहले उसने फुसफुसाकर कहा—

आदित्य :- “थोड़ा ठंडा लगेगा… डरना मत।”

जैसे ही उसकी उँगलियाँ जानवी की त्वचा को छूतीं, एक नर्म-सी सिहरन जानवी के दिल तक उतर जाती। वह अपनी साँसों को रोककर बस आदित्य को देखती रही।

आदित्य के चेहरे पर फिक्र साफ झलक रही थी—इतनी सच्ची फिक्र कि जानवी का दर्द आधा तो उसी पल कम हो गया।

उसी समय ऑफिस के कैबिन से बाहर आते हुए अशोक ने यह पूरा दृश्य देखा। उनके कदम अनायास रुक गए।
पहले तो हैरानी हुई—आदित्य… और उनकी बेटी… इतने करीब?
फिर होठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई।

“इतनी सच्ची देखभाल… हर किसी में नहीं होती,”
अशोक ने मन ही मन कहा और चुपचाप वापस मुड़ गए, दोनों की केमिस्ट्री को बिना बाधा दिए।

उधर, आदित्य स्प्रे करने के बाद धीरे से जानवी का पैर पकड़कर बोला—

आदित्य :- “अब ठीक लग रहा है?”

जानवी की आँखें उसकी आँखों से मिलीं, और वह बस धीमे से कह पाई—
जानवी :- “हाँ… अब ठिक है ।

फिर जानवी धिरे से कहती है --

जानवी :- तुमने छुआ तो… दर्द कम हो गया।”

रिसेप्शन, कॉरिडोर, केबिन्स—हर जगह लोग हैरानी से देख रहे थे।
किसी की नजरें आदित्य पर, किसी की जानवी पर टिक गईं।

कुछ लोग फुसफुसा रहे थे—


लोग :- “ आदित्य सर कैसे जानवी मेम के पीछे इस तरह भाग रहे हैं!”

कुछ लोग मुस्कुरा रहे थे—

“लगता है आदित्य सर का सॉफ्ट साइड भी है।”


जानवी यह सब देख सुन रही थी, लेकिन आज उसे फर्क नहीं पड़ रहा था। उसके लिए आज बस आदित्य का हाथ और उसकी केयर मायने रखती थी।

To be continue.....553