inteqam, chapter- 37 in Hindi Love Stories by Mamta Meena books and stories PDF | इंतेक़ाम - भाग 37

Featured Books
Categories
Share

इंतेक़ाम - भाग 37

धीरे-धीरे दिन को जाने लगे और अब निशा की मेहनत रंग लाने लगी,,,,

विजय की हालत में अब धीरे-धीरे सुधार होने लगा और आखिर एक दिन में आ गया जब विजय पूरी तरह स्वस्थ हो गया,,,,

उसे स्वस्थ देखकर उसकी मां और निशा भी खुश थी,निशा उसकी मां और विजय से बहुत ही कम बातें कर दी थी , वह अधिक तरह अपने बच्चों और अपने काम में बिजी रहती थी,,,,

विजय की पूरी तरह ठीक हो जाने पर एक दिन निशा ने विजय से कहा कि अब तुम बिल्कुल ठीक हो अब तुम और तुम्हारी मां वापस अपने घर जा सकते हो,,,,, 

यह सुनकर विजय ने हाथ जोड़कर कहा निशा मैं तुम्हारा गुनहगार हूं तुम चाहे जो मुझे सजा दे सकती हो लेकिन इस तरह तुम्हारा मुझे देख कर अनदेखा करना मुझसे बर्दाश्त नहीं होता, मैं मानता हूं कि मेरे गुनाहों की ऐसी कोई सजा नहीं है जिससे मेरे गुना धूल सके लेकिन एक बार तुम मुझे मौका दे कर देखो मैं अपनी सारी गलतियों को सुधार लूंगा, एक बार मुझे मौका दे कर देखो निशा,,,,,,

लेकिन निशा पर विजय की बातों का कोई असर नहीं हुआ और वह बोली कि मैं अब पिछली भूल चुकी बातों को फिर से याद नहीं करना चाहती बेहतर यही होगा कि आप और आपकी मां यहां से चले जाइए,,,,,

यह सुनकर विजय बोला लेकिन निशा मेरी बात तो सुनो,,,,,

उसकी बात बीच में काटते हुए ही निशा हाथ जोड़कर गुस्से में बोली आप लोगों की बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप यहां से चले जाइए अगर आप  चाहते हो ना कि मैं और मेरे बच्चे खुश रहे तो भगवान के लिए आप यहां से चले जाओ,,,,,

तब विजय की मां बोली लेकिन बेटी,,,,,

तब निशा बोली की मुझे अब कुछ नहीं सुनना यह कह वह अपने ऑफिस निकल गई,,,,,

तब विजय की मां बोली बेटा हमने निशा बेटी के साथ इतना बुरा किया है कि चाह कर भी हमें माफ नहीं कर सकती,,,, 

तब विजय बोला मां निशा चाहे मुझे जो सजा दे मैं खुशी-खुशी उसे सहन कर लूंगा लेकिन अभी हमें निशा की खुशी के लिए वापस अपने घर जाना होगा,,,,,,

यह सुनकर विजय की मां बोली लेकिन बेटा,,,,

तभी विजय उदास होकर अपने आंसूओं को काबू करते हुए बोला हां मां हम से जो गलती हुई है उसकी सजा मात्र निशा से माफी मांग लेने से तो नहीं होगी ना, मां मुझे अपने प्यार पर भरोसा है देखना एक ना एक दिन मुझे मेरी निशा मेरे बच्चे वापस मिल जाएंगे, फिर मैं हम सब हंसी-खुशी एक ही छत के नीचे एक साथ रहेंगे,,,,,,

यह कहते हुए विजय की आंखों में आंसू छलक आए और बह अपनी मां को लेकर वापस अपने घर आ गया,,,,,

विजय के अपने घर से चले जाने से निशा को विजय के बगैर घर सूना सूना लग रहा था, उसे विजय की बहुत याद आ रही थी लेकिन जो कुछ विजय ने उसके और उसके बच्चों के साथ किया था वह भी तो भूलने लायक नहीं था,,,,,,

इसलिए वह धीरे-धीरे अपना मन अपने काम में लगाने लगी, वही विजय के बच्चे भी विजय से रोज फोन पर बातें कर लिया करते,,,,

निशा अपने बच्चों से चाह कर भी मना नहीं कर पाती वह नहीं चाहती थी कि उसके बच्चे उसके पापा से दूर रहे जैसा भी है लेकिन विजय उनका पिता है इसलिए वह भी अपने बच्चों से मना नहीं कर पाती थी,,,,